ब्रेकिंग न्यूज़ 

नमो सरदार कितना असरदार

मोदी की लोकप्रियता को लेकर भाजपा में किसी को शक नहीं कि वह आज पार्टी के सबसे लोकप्रिय नेता हैं, लेकिन अहम सवाल यह है कि क्या वह सर्वमान्य नेता हैं? यानी मोदी को बाहर ही नहीं, पार्टी के अंदर भी कड़ी चुनौतियों से पार पाना है। संसदीय सीटों का गणित और दूसरे दलों से सहयोग की संभावनाएं फिलहाल ज्यादा उम्मीद नहीं जगाती है। लेकिन मोदी समर्थकों का गणित शायद यह है कि मोदी लहर भाजपा को इतनी सीटें दिला देगी कि वह ऐसा राजनीतिक चुंबक बन जाएगी कि अन्य दल उसकी ओर खिंचे चले आएंगे। यह संभव है। मोदी को इन्हीं अनुकूल-प्रतिकूल स्थितियों के सुगम-दुर्गम राहों से गुजरना होगा।

कई दिनों बाद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के राष्ट्रीय कार्यालय में जश्न का माहौल देखने को मिला। हिंदी भाषी राज्यों में, जिसे ‘काउ बेल्ट’ कहा जाता है, वहां के शहरों में भाजपा के कार्यकर्ता ढोल बजाकर नाचते हुए दिखाई दिए। पटाखों की आवाज ने दिवाली की याद दिला दी। यह जश्न था-भाजपा द्वारा पार्टी के तेजतर्रार नेता गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को एनडीए के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में घोषित करने का।

भाजपा के नेताओं और कार्यकर्ताओं के उत्साह को देख कर तो लगा था कि मानो जश्न मोदी के प्रधानमंत्री बनने का हो। लेकिन मोदी की उम्मीदवारी के घोषणा के समय भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की बॉडी लैंग्वेज बता रही थी कि पार्टी ने यह फैसला बड़े दबाव में लिया है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह हों, साथ में बैठे नरेंद्र मोदी हों, उनके बगल में बैठीं लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज हों या फिर साथ खड़े नितिन गडकरी हों, सब के माथे पर चिंता की लकीरें दिख रही थीं। मोदी का स्वागत तो सब कर रहे थे, लेकिन मानो एक औपचारकता हो।

इस दौरान मोदी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनने की चर्चा कम और अडवाणी का गाड़ी से उतरकर वापस जाना और बैठक का बहिष्कार करना ज्यादा छाया रहा।

जहां तक नरेंद्र मोदी का सवाल है, यह बात साफ है कि उनकी लोकप्रियता को लेकर भाजपा में किसी को शक नहीं कि वह आज पार्टी के सबसे लोकप्रिय नेता हैं, लेकिन अहम सवाल यह है कि क्या वह सर्वमान्य नेता हैं? और

यदि वह सर्वमान्य नहीं हैं तो फिर उन्हें प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में घोषित करने की इतनी जल्दबाजी क्यों?
मोदी का सफरनामा
मोदी को लेकर जल्दबाजी
भाजपा की गोवा की राष्ट्रीय कार्यकारणी में 10 जून को तमाम विरोधों के बावजूद राजनाथ सिंह ने मोदी को केंद्रीय चुनाव प्रचार समिति का अध्यक्ष बना दिया। उन्होंने घोषणा की कि देश को युवा नेतृत्व की जरूरत है और 2014 के युद्ध के सेनापति नरेंद्र मोदी होंगे। गोवा के तट से उठी इस सुनामी का असर दिल्ली में दिखा। मोदी के विरोध में पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने संगठन के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया। तीन दिन तक यह नाटक चला और अंत में इस बात पर समझौता हुआ कि आगे सारे फैसले सर्वानुमति से होंगे। आडवाणी के विचारों का सम्मान होगा और भाजपा पर नजर रखने वाले संघ के वरिष्ठ नेता सुरेश सोनी की जगह किसी और को भेजा जाएगा। जिस भाजपा को आडवाणी ने अपने विचारों से भटकी हुई पार्टी कहा था, मात्र चार दिन में उन्हें उसी भाजपा में सब ठीक होता दिखाई देने लगा और आडवाणी का इस्तीफा वापस हो गया। नरेंद्र मोदी को इस बात का अहसास हो गया कि दिल्ली अभी दूर है। वह जान गए थे कि आडवाणी उन्हें प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में घोषित नहीं होने देंगे। इसी बीच ‘वंजारा बंम’ का विस्फोट हुआ। जेल में बंद फर्जी एनकाउंटर के आरोपी गुजरात के वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी डीजी वंजारा ने पत्र लिखकर सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया। पत्र में वंजारा ने मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन गृह मंत्री अमित शाह पर कई गंभीर आरोप लगाते हुए मोदी और शाह को कटघरे में खड़ा कर दिया। सीबीआई ने भले ही उस पत्र को तवज्जो न दिया हो, लेकिन आने वाले समय में न्यायालय उस पत्र पर गौर कर सकता है। इससे मोदी की छवि भी धूमिल हो सकती है। खबरें ये भी हैं कि चुनाव के समय दो और आरोपी भी ऐसे ही पत्र लिख कर मोदी की परेशानी बढ़ा सकते हैं। इन सबसे बचने का एक अच्छा उपाय यह लगा कि मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया जाए, ताकि बाद में यदि कोई उन पर वंजारा जैसे आरोप लगाता भी है तो उसे विपक्ष का षड्यंत्र कह कर बचा जा सकता है। आडवाणी चाहते थे कि पांच राज्यों के चुनाव के बाद ही पार्टी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा करें। मोदी को एक डर यह भी था कि कहीं मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान तीसरी बार मुख्यमंत्री बनते हैं तो शिवराज का कद मोदी से बड़ा होगा क्योंकि वे बीमारू राज्य को विकसित कर तीसरी बार मुख्यमंत्री बनेंगे। गुजरात हमेशा ही विकसित प्रदेश रहा है। मध्य प्रदेश गुजरात से बड़ा राज्य है और शिवराज की छवि भी बेदाग है। इन तमाम बातों के चलते मोदी की प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी पर कई तरह के शक-शुबहे थे।
आडवाणी का विरोध
मोदी को लेकर आज भाजपा बंटी हुई है। नए और पुरानों का झगड़ा है। युवा और बुजुर्गों की लड़ाई है। भाजपा के बुजुर्ग नेता लालकृष्ण आडवाणी, डॉ. मुरली मनोहर जोशी, सुषमा स्वराज, जसवंत सिंह आदि जो आज भी राजनीति में सक्रिय हैं, इस बात को स्वीकारने को तैयार नहीं कि उनके होते हुए किसी और की ताजपोशी हो। मोदी समर्थक इन नेताओं की बढ़ती उम्र का हवाला देकर उन्हें मागर्दशन के किरदार में रहने का आग्रह करते हैं।

भारतीय राजनीति में उम्र की कोई सीमा नहीं होती। 1984 में 40 वर्षीय स्व. राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद जरूर लग रहा था कि देश में युवाओं का राज आया है। उस वक्त लगा था कि कांग्रेस ने देश को एक नई सोच दी है, लेकिन वह अपवाद बनकर रह गए। उनके बाद 1991 में कांग्रेस के बुजुर्ग 70 वर्षीय नरसिंह राव ने सत्ता संभाली और

उनके बाद 2004 से देश का नेतृत्व उम्रदराज 81 वर्षीय मनमोहन सिंह कर रहे हैं। जनसंघ के नेताओं ने जब पहली बार 1977 में केंद्र में सत्ता का स्वाद चखा, तब देश के प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई की उम्र 81 वर्ष थी। भाजपा के नेतृत्व में 1998 में जब पहली बार एनडीए की सरकार बनी तब प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की उम्र 74 वर्ष थी। इसलिए उम्र का कारण दे कर बुजूर्गों को दरकिनार करना हजम नहीं होता। तो फिर यह लड़ाई क्यों?

दरअसल यह लड़ाई दिल्ली और नागपुर की है। यह जंग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा भाजपा पर वर्चस्व स्थापित करने की है। जैसा कि कहा जाता है कि प्यार और जंग में सब जायज होता है, इसलिए भाजपा में हो रहे इस महाभारत के हर निर्णय को संघ जायज ठहरा कर भाजपा के तथाकथित शुद्धीकरण के काम में लगा है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने 1951 में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को संघ की विचारधारा के चौखट में रह कर एक राजनीतिक दल स्थापित करने की अनुमति दी थी, जिससे भारतीय जनसंघ का जन्म हुआ था। जनसंघ के जन्म से 1977 में उसके जनता पार्टी में विलय तक जनसंघ संघ के निर्देशानुसार चल रहा था। जनता पार्टी के विफल प्रयोग के बाद जनसंघ के नेताओं ने 1998 में भारतीय जनता पार्टी के नाम से नए राजनीतिक दल का गठन किया और फिर नागपुर के इशारों पर काम होने लगा। समय के चलते संघ में नेतृत्व परिवर्तन होता रहा और भाजपा वही अटल-आडवाणी का राग अलापती रही। यदि आडवाणी और अटल संघ में ही रहते, तो दोनों सरसंघचालक बनने की काबिलियत रखते हैं और शायद राजेंद्र सिंह, जिन्हें रज्जू बाबू के नाम से जाना जाता था, उनसे भी पहले अटल-आडवाणी का नंबर आ जाता।
इकबाल और धमक दोनों कायम किया राजनाथ ने
निम्मी ठाकुर
आडवाणी के जबरदस्त विरोध के बावजूद नरेंद्र मोदी भाजपा के लिए प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार घोषित हो गए। पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने इस सारे क्रम में निर्णय लेने की अपनी क्षमता का लोहा मनवा लिया। यह काम कितना कठिन था, राजनाथ सिंह ने अपनी कार्यशैली से इसका अहसास तक नहीं होने दिया।

पार्टी अध्यक्ष के रूप में अपनी पहली पारी में राजनाथ सिंह पर तोहमत लगा था कि वह निर्णय नहीं ले पाते हैं। लेकिन दूसरी पारी संभालते ही राजनाथ सिंह अलग अंदाज में दिखे। नेतृत्व के इकबाल से ही पार्टी चलती है। राजनाथ ने इसे समझा और जीया भी। उन्होंने सटीक रणनीति के तहत मोदी को इस मुकाम तक पहुंचाया और मोदी के जरिए पार्टी काडर और लोगों में उत्साह भरने की सफल कोशिश की।

राजनाथ ने आनन-फानन मोदी को पीएम उम्मीदवार नहीं बनाया। इसके लिए राह आसान की। काडरों में वह धीरे-धीरे उत्साह बढ़ाते गए, मोदी के प्रति काडर की ललक की प्यास बढ़ाते गए। सबसे पहले उन्होंने नरेंद्र मोदी को सबसे लोकप्रिय नेता बता कर काडरों की उस उम्मीद को जगाया कि मोदी राष्ट्रीय राजनीति में लाए जा रहे हैं। फिर वह मोदी के अहम सिपहसालार अमित शाह को अपनी टीम में लाए और उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया। राजनाथ एक कदम और बढ़े और मोदी को संसदीय बोर्ड का सदस्य बना दिया।

पार्टी के अंदर राजनाथ सिंह के विरोधी मामले को यहीं समाप्त मान रहे थे। ऐसे में राजनाथ सिंह ने अत्यंत साहसिक कदम उठाया। गोवा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में नरेंद्र मोदी को चुनाव अभियान समिति की कमान सौंप दी। आडवाणी, सुषमा और जोशी ने अड़ंगा डालने की कोशिश की। यहां तक कि आडवाणी ने राजनाथ सिंह को दो-टूक कह दिया कि मोदी को यदि चुनाव अभियान समिति की कमान सौंपी जाती है, तो वह कठोर कदम उठा सकते हैं। परोक्ष रूप से आडवाणी ने इस्तीफे की धमकी दे दी।

आडवाणी के इस तेवर से राजनाथ कुछ विचलित हुए, लेकिन उन्होंने चुनाव अभियान समिति की कमान मोदी को सौंप दी। नाराज आडवाणी ने इस्तीफा दिया, लेकिन राजनाथ सिंह ने तुरंत ही संसदीय बोर्ड की बैठक बुलाकर उनके इस्तीफे को अस्वीकार करते हुए आडवाणी को मनाने का प्रस्ताव पारित कर दिया। आडवाणी मान गए।

पार्टी में मोदी का विरोध करने वाले अब मान चुके थे कि मोदी के पीएम उम्मीदवारी पर ग्रहण लग गया है। राजनाथ अब मोदी को लेकर कोई ठोस निर्णय करने की स्थिति में नहीं हैं। लेकिन यह भ्रम भी टूटा। 13 सितंबर को राजनाथ सिंह ने मोदी को पार्टी का पीएम उम्मीदवार घोषित कर दिया। आडवाणी को आखरी क्षणों तक मनाने की कोशिश हुई, लेकिन वह नहीं माने। खैर! राजनाथ सिंह ने यह सफलता जरूर हासिल कर ली कि आडवाणी के अलावा संसदीय बोर्ड की बैठक में सभी को लाने में कामयाब रहे।

पार्टी नेतृत्व के इकबाल से चलती है तभी तमाम विरोध के बावजूद फैसले लिए जाते हैं। फैसले भी ऐसे जो पार्टी काडर चाहता है, जो लोग चाहते हैं। इसका सबूत मोदी की रैलियों से मिल रहा है।

यानी मधुकर दत्तात्रेय देवरस के बाद जितने सरसंघचालक हुए हैं, उन सबसे आडवाणी वरिष्ठ हैं। देवरस आडवाणी से एक वर्ष वरिष्ठ थे। वह 1946 में संघ के कार्यवाहक बने। आडवाणी 1947 में कराची क्षेत्र के संघ के कायर्वाहक बने। रज्जू बाबू 1966 में उत्तर प्रदेश के पं्रात प्रचारक बने, जबकि के. सुदर्शन वर्ष 1964 में मध्य भारत के प्रांत प्रचारक बने। मोहन भागवत 1977 में महाराष्ट्र के अकोला क्षेत्र के प्रचारक बने। देखा जाए तो आज के सरसंघचालक आडवाणी से 30 साल कनिष्ठ हैं। जब तक देवरस युग था, तब तक ‘दिल्ली’ यानी जहां भारतीय जनता पार्टी का केंद्रीय कार्यालय है और ‘नागपुर’ से, यानी जहां संघ का केंद्रीय कार्यालय है, निर्देश लेता था। रज्जू बाबू के आने के बाद दिल्ली को अपने वरिष्ठ होने का अहसास हुआ और भाजपा संघ की ओर लापरवाह हो गई। संघ अपने को ठगा महसूस करने लगा। आडवाणी और उनके दरबारियों की सहमति के बगैर संघ को भाजपा पर कोई भी निर्णय लादना मुश्किल हो गया। इसी के चलते संघ ने भाजपा की नकेल अपने हाथ में रखने के लिए भाजपा के वरिष्ठों को दरकिनार करने की योजना बनाई और मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाना उसी योजना का हिस्सा है। आडवाणी ने भी संघ से दो-दो हाथ करने की ठान ली। आडवाणी के दबाव के चलते ही संघ के चेहते नितिन गडकरी को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ा। यह बात और है कि आज आडवाणी इसे अपनी भयंकर भूल मानते हैं क्योंकि गडकरी के बाद हुए नेतृत्व परीवर्तन में ही आडवाणी युग के अंत के बीज पड़े थे। राजनाथ सिंह, जो आडवाणी का आशीर्वाद पाने के लिए संघर्ष कर रहे थे, अध्यक्ष बनते ही संघ और भाजपा का समन्वय देख रहे सुरेश सोनी, भाजपा के महासचिव अरुण जेटली और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथ के खिलौना बन गए। आडवाणी को दरकिनार कर पार्टी पर कब्जा कर लिया। आडवाणी जिन रीढ़ विहीन नेताओं को आगे लाए थे, वे ही उनका साथ छोड़ गए। वैसे भी बिना जनाधार वाले नेता एक पैरासाइट की तरह, जनाधार वाले नेताओं पर पलते हैं। जो कल तक आडवाणी पर पल रहे थे, आज मोदी पर पल रहे हैं। आडवाणी अलग-थलग पड़ गए। आम जनता में यह संदेश जाने लगा की आडवाणी आज भी प्रधानमंत्री पद के मोह से मुक्त नहीं हो पा रहे हैं। दरअसल उनका विरोध युवाओं से नहीं था, बल्कि उनका विरोध संघ के स्थापित हो रहे वर्चस्व से था। इसलिए वह मोदी का विरोध और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की प्रशंसा कर रहे थे।
मोदी इफेक्ट
भाजपा नेता मोदी को देश का सबसे लोकप्रिय नेता कहते नहीं थकते। मोदी भाजपा में सबसे लोकप्रिय नेता हो सकते हैं, देश के कैसे? यह समझ से परे है। एक नजर देश के राजनीतिक परिदृश्य पर डाल लें तो शायद इस नजरिए से पूरी तस्वीर समझने में आसानी हो सकती है। दक्षिण के केरल में लोकसभा की 20, तमिलनाडु में 39, आंध्र प्रदेश में 42 सीटें हैं। दक्षिण भारत के तीन राज्यों में कुल मिला कर 101 सीटें हैं, जहां भाजपा का अस्तित्व ही नहीं है। कनार्टक में लोकसभा की 28 सीटें हैं, जहां हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा का सुपड़ा साफ हो गया। पूर्व में ओडीशा में लोकसभा की 21 सीटें हैं, पश्चिम बंगाल में 42, असम में 14 और पूर्वोत्तर के सात प्रदेशों में 11 सीटें हैं। लेकिन इन दस राज्यों की 88 सीटों पर भी भाजपा की उपस्थिति नगण्य है। बिहार में 40 सीटें हैं, जहां इस बार बहुकोणीय संघर्ष के चलते भाजपा को ज्यादा उम्मीद करना सच्चाई से दूर आंखें मूंदने जैसा होगा। राजस्थान में 25 सीटें हैं, जहां वसुंधरा राजे का वजूद है, वहां मोदी इफेक्ट कोई ज्यादा असर नहीं कर पाएगा। वैसे भी वहां भाजपा के बढ़ते अंतरकलह ने कांग्रेस की स्थिति मजबूत ही की है। पंजाब में 13 सीटें हैं, जहां पूरी भाजपा अकालियों के भरोसे है। शिवराज सिंह चौहान की छवि मध्य प्रदेश में अधिक साफ है, जहां 29 सीटें हैं। चौहान खुद ही प्रधानमंत्री पद की दौड़ में दिखाई दे रहे थे,
तो उन्हें मोदी की वैसे भी कोई जरूरत दिखाई नहीं देती। भाजपा शासित दूसरे राज्य-छत्तीसगढ़ में 11 सीटें हैं, जहां कांग्रेस के अजीत जोगी ने रमण सिंह की वापसी सुनिश्चित की है। हिमाचल में 4, उत्तराखंड में 5 और दिल्ली में 7 सीटें हैं। इन छोटे राज्यों से देश के कुल राजनीतिक परिदृश्य पर अधिक फर्क नहीं पड़ता है। लेकिन महाराष्ट्र और गुजरात बड़े राज्य हैं। महाराष्ट्र में 48 और गुजरात में 26 सीटें है। महाराष्ट्र में स्थिति बदलती दिखाई नहीं देती लेकिन गुजरात में मोदी लहर से भाजपा की सीटें बढऩे में कोई संदेह नहीं है। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में लोकसभा की 80 सीटें हैं और आज की स्थिति में भाजपा को मोदी के नाम पर 30 से 35 के आसपास सीटें मिलने की उम्मीद है।
वर्तमान में लोकसभा में भाजपा की 117 सीटें हैं। मोदी के नाम पर हिंदू मतदाता एक होकर मतदान भी करता है और वसुंधरा, शिवराज और रमण सिंह के वजूद से वह 180 सीटों तक पंहुच भी जाते हैं तो भी दिल्ली मोदी की पंहुच से दूर ही होगी। दूसरी ओर जिस प्रकार से विश्व हिंदू परिषद के नेता मोदी को लेकर बयानबाजी कर रहे हैं उससे अल्पसंख्यक, जो भाजपा के विकास के मुद्दे को मानता है, भी दूरी बना कर रखेगा। मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार और उत्तर प्रदेश मं इसका फायदा अन्य दलों को होगा। भाजपा की कुछ सीटें, जहा अल्पसंख्यक मतदाताओं का प्रतिशत ज्यादा है, मोदी इफेक्ट के चलते भाजपा के हाथ से निकल सकती हैं। इसके बावजूद मोदी के नाम से
भाजपा की झोली में कुछ सीटें बढ़ भी गईं तो भी वह 276 के जादुई आकड़े को कैसे पार कर पाएगी, जो किसी दल को देश की सत्ता सौंपने के लिए जरूरी होता है। जब भाजपा के पास यह जादुई आंकड़ा नहीं होगा तो भाजपा कैसे मोदी की प्रधानमंत्री के रूप में ताजपोशी कर पाएगी।
मोदी का एनडीए
276 का आकड़ा पार करने के लिए भाजपा को एनडीए का कुनबा बड़ा करना होगा। जिस मोदी के नाम पर जनता दल युनाइटेड एनडीए छोड़कर चला गया, उस मोदी के नाम पर ममता, मुलायम, माया, पटनायक, जगन, चंद्राबाबू और वामपंथी साथ देंगे, कहना मुश्किल है। चुनावों में अल्पसंख्यक हर राजनीतिक दल की मजबूरी है। भाजपा भी अपवाद नहीं है। देश की सत्ता मोदी को सौंपनी है तो अल्पसंख्यकों को भाजपा कैसे नजरअंदाज कर सकती है। लेकिन गोधरा का भूत मोदी का साथ छोडऩे के लिए तैयार नहीं दिख रहा। ऐसे में जयललिता को छोड़ कर और कोई मोदी को अपना मित्र भी बताने से परहेज कर रहा है। वर्तमान में जो एनडीए है, उसे एक ‘राजनीतिक मजाक’ की संज्ञा दी जा सकती है। छह मित्र दलों को साथ लेकर बना
एनडीए भी भाजपा एकजुट नहीं रख सकी है। मोदी के नाम से ही भाजपा के अपने मित्र उससे बिदक गए हैं। जो साथ हैं, उनमें भी लोकसभा की 11 सीटों वाली शिवसेना मोदी को लेकर खुश नहीं है। शिवसेना मोदी और राज ठाकरे की दोस्ती से परेशान है और अपने मुखपत्र सामना से वह मोदी पर लगातार हमले करती रहती है। शिरोमणि अकाली दल जरूर मोदी के पक्ष में भाजपा के साथ डटा है, लेकिन लोकसभा में उसके मात्र चार सदस्य हैं। अगले चुनावों में स्थिति कितनी बदल सकती है और दोनों दल पंजाब में मिल कर 13 में से कितनी सीटें निकाल पाएंगे, यह देखना दिलचस्प हो सकता है। झारखंड मुक्ति मोर्चा के दो, तेलंगाना राष्ट्र समिति के दो, असम गण परिषद का एक और हरियाणा जनहित कांग्रेस का एक सदस्य लोकसभा में है। ये दल भविष्य में मोदी की नैया कितनी पार लगा पाएंगे, इसका अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है। इसलिए मोदी के बारे में विचार कोई मायने नहीं रखते। भाजपा भी जानती है कि इन छह के भरोसे वह यूपीए को चुनौती नहीं दे सकती। मोदी के सर्मथक 2014 में मोदी लहर से अपने नेता की प्रधानमंत्री पद पर ताजपोशी का सपना देख रहे हैं। उनका गणित शायद यह है कि मोदी लहर भाजपा को इतनी सीटें दिला देगी कि वह ऐसा राजनीतिक चुंबक बन जाएगी कि अन्य दल उसकी ओर खिंचे चले आएंगे और खुद ही मोदी का समर्थन करने भाजपा के साथ खड़े हो जाएंगे। मोदी विरोधी गुट चुनाव नतीजों तक इंतजार करने की रणनीति अपना सकता है। चुनावी नतीजों के बाद यदि एनडीए का कुनबा बढ़ाने की बात होगी तो वह अन्य दलों से मोदी का विरोध करवा कर मोदी की ताजपोशी रोकने का प्रयास कर सकता है।
भाजपा में एक गुट और भी है। वह गुट है-राजनाथ सिंह जैसे नेताओं का। यह गुट आज मोदी के साथ खड़ा दिखाई देता है, लेकिन समय आने पर स्वयं ही प्रधानमंत्री पद की दौड़ में आने से परहेज नहीं करेगा। इस गुट को मोदी-अडवाणी के झगड़े में अपनी लॉटरी लगती दिखाई दे रही है। यदि संघ की चली तो वह गडकरी को भी प्रधानमंत्री के रूप में मैदान में उतार सकता है। लेकिन इस संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि एनडीए का कुनबा बढ़ाने में खुद को बाधक महसूस करते हुए उस वक्त संघ नेपथ्य में ही चला जाए।
भारत जैसे विशाल देश की राजनीतिक गतिविधियों का विश्लेषण करना दिन-ब-दिन मुश्किल होता जा रहा है। सोशल मीडिया पर सक्रिय युवा अन्याय के खिलाफ आक्रोष दिखा कर सरकार के छक्के छुड़ा देते हैं लेकिन क्या वह मतदान के समय वह वही उत्साह दिखाएगा कहना मुश्किल है। न्याय मांगने के लिए कैंडल मार्च में सबसे ज्यादा लोग जिस तबके से निकलते हैं, वही सबसे कम मतदान करता है। मध्यमवर्गीय मतदाता सरकार पर टिप्पणी करने में और परिवर्तन की बातें करने में सबसे आगे रहता है लेकिन मतदान के समय वह छुट्टी मनाता है। मीडिया को पेड न्यूज का ग्रहण लगा है। सिविल सोसाइटी के नाम पर जनआंदोलन कर तथाकथित समाज सेवी राजनेता बन चुनाव लडऩे के लिए मैदान में उतरते हैं। आज भी चुनाव में पैसा और शराब चलती है। जाति, बिरादरी और धर्म के नाम पर मतदाताओं का ध्रुवीकरण
होता है। दबंग आज भी जेल में रहकर चुनाव जीतते हैं। चुनावी जंग में सब जायज है। ऐसे माहौल में 2014 के चुनावी जंग में कांग्रेस के राहुल गांधी क्या, जिसे जीतने की आदत लगी हो, ऐसे मोदी नाम के तुफान को रोक पाएंगे। बनारस के पास एक गांव में एक किसान से हमारे पत्रकार मित्र ने पुछा, ‘क्या मोदी जीतेगा?’ किसान का जवाब था, ‘अरे भाईया, अब तो हमारी गाय-भैंसे भी मोदी-मोदी कह रही हैं।’ दूसरी ओर असम के एक युवा से जवाब मिला, ‘हु मोदी?’ यानी ‘कौन मोदी?’

на заказ скульптурыкак увеличить глаза с помощью макияжа

Leave a Reply

Your email address will not be published.