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‘नमो शाइनिंग’ की चुनौतियां

तमाम संशयों के बावजूद नमो को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने से देश भर में एक नया उत्साह दिख रहा है। तभी तो मोदी विरोधी राजनीतिक पंडित देश में मोदी का हौवा खड़ा करने में दो बार सोचने को मजबूर हो गए हैं। ऐसे ही समय पर संघ और भाजपा प्रमुख राजनाथ सिंह ने ‘नमो शाइनिंग’ को पूरी शिद्दत से पहचान लिया है। देश के सर्वोच्च पद की उम्मीदवारी के लिए गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम की घोषणा को लेकर पार्टी के भीतर और बाहर भारी हो-हल्ला मचा। इसकी वजहें भी हैं। मोदी गुजरात में समग्र विकास का उदाहरण पेश कर चुके हैं, वह राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बेहद लोकप्रिय हैं, साथ ही उन पर गुजरात दंगों के कारण विभाजनकारी नेता का दाग भी चस्पा है। लेकिन, विवाद से चुनौती पैदा होती है, चुनौती परिवर्तन ला सकती है और परिवर्तन राष्ट्र की जीवनधारा बदल सकता है, यही है ‘मोदी मंत्र’। इसी मंत्र ने भाजपा और उसके कार्यकर्ताओं को ‘यही है राइट च्वॉइस’ कहने पर मजबूर कर दिया। हालांकि मोदी की इस राजनीतिक यात्रा में कई अड़चनें भी आ सकती है, क्योंकि उन्हें धृतराष्ट्र जैसे अनेक पात्रों का सामना करना पड़ सकता है। फिलहाल ऐसा लगता है कि 2014 के लोकसभा चुनावों की महाभारत में मोदी ‘अर्जुन’ की भूमिका में होंगे, तो राजनाथ सिंह ‘कृष्ण’ और आडवाणी ‘भीष्म पितामह’ की भूमिका में होंगे।

पिछले कुछ दिनों की घटनाएं 1968 का वह मंजर याद दिला देती हैं, जब दीनदयाल उपाध्याय की असमय मृत्यु के बाद भारतीय जनसंघ में वाजपेयी, आडवाणी और नानाजी देशमुख की त्रिमूर्ति ने अपना वर्चस्व कायम किया और बलराज मधोक को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।

नरेंद्र मोदी के उत्थान का मार्ग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा के कार्यकर्ताओं के समर्थन की वजह से आसान रहा है। लेकिन उन्हें कांटों का ताज मिला है और सिर पर मानो तलवार लटक रही है। यह हनीमून हमेशा जारी नहीं रहेगा। उनके लिए राष्ट्रीय नेतृत्व हासिल करने का अगला चरण और अधिक चुनौतीपूर्ण होगा। मोदी के सामने लक्ष्य स्पष्ट है और 2014 के चुनावों में उन्हें बेहतर प्रदर्शन कर दिखाना है।

भाजपा के मत प्रतिशत में लगातार 1998 के बाद से ही गिरावट दिख रही है। इसके अलावा मनमौजी और अस्थिर प्रकृति के सहयोगियों की वजह से उनका काम और मुश्किल हो जाएगा। भाजपा का जनाधार कई राज्यों – पूर्वोत्तर से लेकर तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और केरल में काफी कमजोर है। पश्चिम बंगाल और ओडिशा में भी वह बड़ी ताकत नहीं है। उत्तर प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण राजनीतिक राज्य में वह अपना जनाधार जमाने की कोशिश में लगी हुई है। मोदी की लोकप्रियता से वोट प्रतिशत बढ़ सकता है, लेकिन इससे लोकसभा की सीटों में इजाफा होगा, इसमें संदेह है। इसलिए चुनाव के बाद मोल-तोल की बेहतर स्थिति में रहने के लिए, मोदी को भाजपा के मत प्रतिशत में उल्लेखनीय बढ़ोत्तरी करने की कोशिश करनी होगी। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) अपने पुराने दौर की छाया मात्र रह गया है। उसके घटक दलों की संख्या नगण्य रह गई है। मोदी को संभावित सहयोगियों की तलाश करनी होगी और उन्हें साथ बनाए रखने की हर संभव कोशिश करनी होगी। भाजपा को 230 के आसपास सीटें हासिल करने के लिए अपने वोट में 9 प्रतिशत का इजाफा करना होगा और सरकार बनाने के लिए जरूरी 272 सीटें प्राप्त करने के लिए और 3 प्रतिशत मत हासिल करने होंगे। यह दिवास्वप्र जैसा लगता है। हालांकि भाजपा में बहुत सारे लोग मोदी लहर के सहारे पार लग जाने की उम्मीद पाले हुए हैं।

मोदी को केंद्र में सरकार बनाने के लिए सहयोगियों की तलाश भी हिमालय जैसी चुनौती साबित हो सकती है। अगर मोदी भाजपा की सीटें 170-180 से ऊपर नहीं ला पाते हैं तो सहयोगियों की तलाश बेहद कठिन होगी। हालांकि भारतीय राजनीति में अवसरवाद विचारधारा से बड़ी भूमिका निभाता है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि थोड़े समय के लिए ही सही, सत्ता की संभावना दिखने पर तमाम गैर-कांग्रेसी ताकतें मोदी के पीछे खड़ी दिख सकती हैं। हर कोई गौरव के मामूली क्षणों की तलाश में रहता है। इसलिए अगर भाजपा की चुनावी संभावनाएं उम्मीद के अनुसार बढ़ती हैं तो अभी मोदी को सांप्रदायिक बताकर निशाना साधने वाली पार्टियां कलाबाजी दिखाकर कतार में खड़ी दिख सकती हैं। मोदी प्रचूर संभावना वाले नेता हैं। हाल के वर्षों में उन्होंने अपना जनाधार काफी व्यापक किया है। उन्होंने खुद को विकास के प्रति जुनूनी व्यक्ति की तरह पेश किया है। इससे क्षेत्रीय पार्टियों में उनके प्रति अनुकूल भावनाएं पैदा हो सकती हैं।

मोदी की प्रबंधन क्षमता जगजाहिर है। वह वाजपेयी से सीख लेकर जर्जर गठजोड़ को भी एकजुट कर सकते हैं, ताकि कोई पराजय का मौका आए तो मध्यावधि चुनाव की नौबत टाली जा सके। बेशक, यह आसान नहीं होगा, लेकिन मोदी एक मंझे हुए नेता हैं जो एकदम निचले स्तर से ऊपर उठे हैं। उनकी अगली यात्रा को उनकी पार्टी और देश के साथ देखना अब दिलचस्प होगा।

मोदी के सामने कई चुनौतियां हैं। इनमें एक है पार्टी के भीतर का अंतद्र्वंद्व, जो रातोंरात खत्म नहीं होगा। उनकी ताजपोशी को विरोध करने वाला भाजपा का तबका उन्हें नौसिखिया मानता है। आडवाणी भले प्रधानमंत्री पद की दावेदारी से बाहर हो गए हो सकते हैं, लेकिन मोदी को सर्वोच्च पद के लिए खुले मन से न स्वीकार करने वाले नेता उन्हें बड़ी चुनौती दे सकते हैं। अगर वह भविष्य में प्रधानमंत्री भी बन जाते हैं तो भी आगे चलकर ये नाराज नेता सरकार में उनके लिए संकट पैदा कर सकते हैं।

कांग्रेस भी मोदी के खिलाफ अपना आक्रमण तेज करेगी और उनके दामन पर दाग लगाने के लिए वंजारा जैसे कुछ और प्रकरण सामने आ सकते हैं। मनमोहन सरकार के खिलाफ लोगों में काफी गुस्सा है। अर्थव्यवस्था खस्ताहाल है, महंगाई बर्दाश्त के बाहर हो गई है और कई राज्यों में सांप्रदायिक तनाव बढ़ रहा है। इन सभी समस्याओं से ध्यान बंटाने के लिए कांग्रेस गोधरा के जिन्न को वापस बोतल में जाने नहीं देगी। यह नहीं भूलना चाहिए कि 2009 में कांग्रेस को भाजपा से 3 करोड़ अधिक वोट मिले थे।

मोदी के लिए कई अनुकूल स्थितियां भी हैं। युवा वोटरों की तदाद काफी बढ़ी है। शहरीकरण से लोगों में आकांक्षाएं भी बढ़ी हैं। मोदी इन स्थितियों को अपने पक्ष में कैसे ला पाते हैं, यह उनके चुनाव प्रचार के तरीके से स्पष्ट होगा। भाजपा इस बार अगर सत्ता में नहीं आ पाती है, तो उसे अपने समूचे तंत्र पर पुनर्विचार करना होगा। इससे उसकी नई पीढ़ी के नेताओं और उनके असर पर भी गंभीर प्रश्नचिन्ह लग जाएगा।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

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