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जीवन के रंग अनेक

वरिष्ठï लेखक-पत्रकार सूर्यकांत नागर हिंदी के प्रमुख कथाकारों में शुमार किए जाते हैं। उनकी किताबों के मराठी तथा अन्य भाषाओं में अनुवाद छपे हैं और चुनी हुई ‘श्रेष्ठ कहानियां’ भी। अनेक पत्र-पत्रिकाओं के संपादक मंडल में रह चुके नागर में लिखने के साथ पढऩे की भूख भी गजब की है, मगर उतना और वैसा पढ़ नहीं पाते, जितना और जैसा पढऩा चाहते हैं। लंबे समय से कहानियां लिख रहे नागर के आठ संग्रह छपे तो दो उपन्यास और दो व्यंग्य संग्रह भी। हिंदी की छोटी-बड़ी प्राय: सभी पत्रिकाओं में छपी उनकी अब तेक की ‘श्रेष्ठï कहानियां’ हाल ही में छपी है। सूर्यकांत नागर की ‘न घर का न घाट का’, ‘मृगतृष्णा’, ‘तमाचा’, ‘तैरती मछली के आंसू’, ‘निशांत’, ‘मुक्ति पर्व’, कायर’, ‘बलि’, ‘फर्र्क’, ‘अंधेरे में उजास’, ‘जल्दी घर आ जाना’, ‘बूढ़ी चाची’, ‘बेटियां’, ‘दहशतजदा’, ‘जीने-मरने के बीच’, ‘शवयात्रा’, ‘चोर’, ‘तबादला’, ‘देश बचाओ’, ‘बिना चेहरे का पेट’, ‘त्रिशंकु’, ‘एक सच यह भी’, ‘अंतिम संस्कार’, ‘जरीवाला कोट’ तथा ‘देवी पूजा’ जैसी कहानियां विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इन कहानियों में समकालीन साहित्य की मुख्य धारा के प्राय: सभी विषय मौजूद हैं। यहां एक तरफ ग्रामीण जीवन के मुंह बोलते चित्र और यादगार चरित्र हैं तो दूसरी तरफ महानगरीय जीवन के अच्छे-बुरे वृत्तांत भी इन कहानियों में हैं। इनमें मजबूत और कमजोर ‘चरित्रों’ से लेकर अविस्मरणीय ‘चित्र’ तक सब हैं। साहित्य की मुख्यधारा में शामिल दलित और स्त्री केंद्रित कथाएं भी सूर्यकांत नागर के इस संग्रह में मौजूद हैं। लेखन की प्राय: सभी प्रवृत्तियों को यहां एक साथ पढ़ा जा सकता है।

सूर्यकांत नागर की कहानी ‘जल्दी घर आ जाना’ पति-पत्नी के प्रगाढ़ संबंधों पर आधारित महत्वपूर्ण रचना है, जिसमें पत्नी के अन्यत्र चले जाने पर कथानायक को लगता है कि अब उसके जैसा सुखी और स्वतंत्र इंसान दूसरा नहीं। अब तो वह पूरी तरह स्वच्छंद जीवन जीने के लिए आजाद है। कुछ दिन तक तो उसे यह सब अच्छा लगता है, लेकिन जल्दी ही दिन-प्रतिदिन की व्यावहारिक दिक्कतों से घबराकर उसकी सोचï बदल जाती है। उसे लगता है कि पत्नी के बिना जीना कितना कठिन है। अचानक उसे पत्नी की याद सताने लगती है और इस सत्य का भान भी हो जाता है कि उसकी वैसी स्वतंत्रता का कोई मतलब नहीं। ‘बलि’ कहानी में नाव में बैठी बच्ची का हाथ मगरमच्छ द्वारा पकड़ कर नदी में खींच ले जाने पर बाकी लोग अपनी जान बचाने के लिए घबराहट में उसे धक्का दे देते हैं, ताकि बच्ची को मगर पानी में खींच ले जाए और डगमगाती नाव डूबने से बच जाए, अन्यथा उसके साथ सब बेवजह मारे जाएंगे। इसी तरह ‘तमाचा’ का कथानायक सोचता है कि जो व्यक्ति उससे मिलना चाह रहा है, वह निश्चित रूप से कुछ मांगने के लिए आ रहा है। वह उसके आने के कारणों की अनेक कल्पनाएं कर डालता है। अंतत: एक दिन वह व्यक्ति कथानायक के सामने आकर जो प्रस्ताव रखता है, उससे उसकी आंखें खुल जाती हैं। आने के बाद अतिथि बताता है कि मुझे पता चला है कि आपके बेटे की किडनी खराब है। मैं उसे अपनी किडनी देना चाहता हूं। यहीं कथानायक को यह भी पता चलता है कि उस व्यक्ति के बेटे के लिए समय पर किडनी की व्यवस्था न होने से उसका देहांत हो गया, जिसकी टीस उसके भीतर अब तक मौजूद है, जिसकी भरपाई वह कथानायक के बेटे को अपनी किडनी देकर करना चाहता है। यह कहानी कथित अभिजात वर्ग और साधारण वर्ग की सोच के अंतर को रेखांकित करती है।

‘निशांत’ में अपना अपमान करने वाले छात्र से प्राध्यापक क्रूर ढंग से बदला लेना चाहता है, पर ऐन वक्त पर उसका इरादा बदल जाता है। सूर्यकांत नागर की कहानियों में इस तरह के हृदय परिवर्तन की अनेक कथाएं मौजूद हैं। ‘फर्क’ कहानी वैसे तो महानगरीय और कस्बाई बोध के द्वंद्व को प्रस्तुत करती है, पर उसके मूल में यही है कि अभी भी कुछ लोग हैं, जो अपनी संवेदना बचाए हुए हैं और जिनकी वजह से यह दुनिया रहने-जीने लायक बनी हुई है।

 

बलराम

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