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पं. दीनदयाल उपाध्याय:एक व्यक्तित्व, एक संपूर्ण विचार

न तो ‘मील के पत्थर’ को चुनिए, न ‘सड़क के खम्भे’ को। वे आपका प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते। यदि वे सदन में पहुंच गये तो वे विवेकपूर्वक विचार करने और निर्णय करने की आपकी अक्षमता को ही प्रतिभासित करेंगे। इसलिए आप अपना स्वयं का प्रतिनिधि चुनिए।
गांधीजी की हत्या के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर 1948 में पहला प्रतिबंध लगा, सरकार ने हिंसा के आरोप में संघ को अवैध संगठन घोषित कर, संघ की गतिविधियों पर प्रतिबंध लगा दिया। 4 फरवरी 1948 से 13 जुलाई 1949 तक के इस प्रतिबंध काल में संघ के सरसंघचालक परम पूजनीय श्री गुरूजी को बंदी बनाने के साथ-साथ संघ के लगभग 20 हजार कार्यकर्ताओं को जेलों में डाला गया। महाराष्ट्र सहित देश भर में अनेक स्थानों पर संघ के कार्यकर्ताओं के घर जला दिए गए। अनेक अमानवीय अत्याचार संघ के कार्यकर्ताओं पर हुए। इस सारे दौर में परमपूज्य गुरूजी ने जेल से कार्यकर्ताओं को शांति बनाए रखने का जो संदेश दिया, उसी के परिणामस्वरूप यह कालखण्ड संघ के व्यक्तिगत नुकसान से गुजर गया और देश का नुकसान नहीं हुआ। इस पूरे कालखण्ड के गुजर जाने के बाद एक बात सभी के ध्यान में आई कि इतने बड़े संगठन के बारे में राजनीतिक मंच अर्थात विधानसभा या लोक सभा में कोई बात कहने वाला नहीं है। देश भर में संघ पर प्रतिबंध व संघ कार्यकर्ताओं पर अत्याचार के विरूद्ध कोई आवाज उठाने वाला है। परमपूज्य गुरूजी ने यह बात महसूस की कि संघ की बात कहने वाला कोई होना चाहिए। प्रतिबंध हटने के बाद संघ को राजनीति में जाना चाहिए, यह स्थान-स्थान पर बैठकों व चर्चा में विचार आया। इस पर गुरूजी ने व्यवस्था दी कि संघ राजनीति में नहीं जाएगा, लेकिन राजनीति में हमारे स्वयंसेवक हों, इस दिशा में हमें सेाचना चाहिए। इस विचार मंथन के बाद राजनीति सहित अनेक क्षेत्रों में संघ के कार्यकर्ता जाएं, यह निर्णय लिया गया। राजनीति में भारतीय जनसंघ, मजदूर के लिए भारतीय मजदूर संघ, विद्यार्थी वर्ग के लिए अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद एवं धार्मिक क्षेत्र में विश्व हिन्दू परिषद जैसी संस्थाओं का गठन उसी विचार-मंथन की देन है। सर्वप्रथम परमपूज्य गुरूजी ने पं. दीनदयाल उपाध्याय एवं श्री दंतोंपंत जी ठेगड़ी, दोनों कार्यकर्ताओं में से एक को राजनीति एवं एक को मजदूर संघ में जाने को कहा। आज हम सभी जानते हैं कि मजदूर क्षेत्र में माननीय ठेगड़ी जी ने भारतीय मजदूर संघ को विश्व का सबसे बड़ा व अनुशासित संगठन बनाया। वहीं पं. दीनदयाल उपाध्याय ने भारतीय जनसंघ की देश की राजनीति में एक नई पहचान दी। आज पं. दीनदयाल जी की जयंती पर उन्हें याद करना स्वाभाविक है। लेकिन आवश्यकता है उनके राजनीति, आर्थिक, सामाजिक और एकात्म मानववाद पर दिया गया एक सम्पूर्ण विचार, जो न केवल आज प्रासंगिक है, बल्कि उन पर देश को चलने की आवश्यकता है ।

आज राजनीति की चर्चा सर्वत्र हो रही है। उनकी राजनीति डायरी के कुछ अंश यहां रखूं उससे पहले में यह याद दिलाना चाहूंगा कि स्वर्गीय श्री भैरोंसिंह शेखावत जब पहली बार राजस्थान के मुख्यमंत्री बने थे, तो उन्होंने अन्त्योदय योजना लागू की थी, अर्थात गांव के अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति तक सरकारी योजना का लाभ पहुंचाना। यह योजना पं. दीनदयाल जी की आर्थिक सोच में से निकाल कर लागू की गई, जिसकी देश में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी प्रशंसा हुई। राजनीति में दीनदयाल जी का सोच आज भी प्रासंगिक है। उसी के कुछ अंश यहां प्रस्तुत करने का प्रयास है। उन्होंने राजनीतिक दल व प्रत्याशी कैसा हो, उनके कार्यक्रम कैसे हों, इस पर संपूर्ण विचार समाज को दिया है। उनका कहना था कि – कोई बुरा प्रत्याशी केवल इसलिए आपका मत पाने का दावा नहीं कर सकता कि वह किसी अच्छे दल की ओर से खड़ा है। बुरा, बुरा ही है और दुष्ट वायु की कहावत की भांति वह कहीं भी और किसी का भी हित नहीं कर सकता। दल के ‘हाई कमान’ ने ऐसे व्यक्ति को पक्षपाती होकर या नेकनियती से, निर्णय में भूलकर टिकट दे दिया होगा, ऐसा सोचना व्यर्थ है। ऐसी गलती को सुधारना मतदाता का कत्र्तव्य है।

दीनदयाल जी का कहना था कि एक समय ऐसा था कि कांग्रेस के टिकट पर खड़े होने पर सड़क के बत्ती के खम्भे (लैम्प पोस्ट) को भी जनता मत दे सकती थी। प्रथम आम चुनाव में आचार्य नरेन्द्रदेव और आचार्य कृपलानी जैसे दिग्गज नेता ऐसे कांग्रेसी प्रत्याशियों के हाथों पराजित हो गये, जिनकी इनकी तुलना में कोई हस्ती नहीं थी। अब सड़क के खंभे वाला युग बीत गया है। किन्तु ऐसी संभावना भी है कि घड़ी का दोलक (पेण्डुलम) दूसरी दिशा में झुक जाय। एक सज्जन ने हाल ही में यह उद्गार व्यक्त किया कि वे कांग्रेसी प्रत्याशी के बदलने ‘मील के पत्थर’ के लिए मतदान करना पसंद करेंगे। चाहे आप कांग्रेस में अपने विश्वास के कारण ‘सड़क के खम्भे’ का चुनाव करें या कांग्रेस के प्रति अपनी घोर घृणा के कारण ‘मील के पत्थर का’, आप समान रूप से गलत है। यह मस्तिष्क के रोगी होने एवं मार्गच्युत होने का द्योतक है।

न तो ‘मील के पत्थर’ को चुनिए, न ‘सड़क के खम्भे’ को। वे आपका प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते। यदि वे सदन में पहुंच गये तो वे विवेकपूर्वक विचार करने और निर्णय करने की आपकी अक्षमता को ही प्रतिभासित करेंगे। इसलिए आप अपना स्वयं का प्रतिनिधि चुनिए। आपको एक अच्छा मनुष्य चाहिए। किन्तु अच्छा मानव भी किसी बुरे दल में रहकर प्रभावकारी नहीं सिद्ध होगा। बड़े से बड़ा वीर भी टूटे या भोंथरे हथियार के सहारे सफल नहीं होगा।

किन्तु अच्छा दल कौन है? स्पष्ट ही वह, जो व्यक्तियों का केवल एक समुच्चय मात्र नहीं है, बल्कि सत्ता हस्तगत करने की इच्छा से अलग, एक विशिष्ट उद्देश्य से युक्त अस्तित्व वाली संस्था है। ऐसे दल के सदस्यों के लिए राजनीतिक सत्ता साध्य नहीं, साधन होनी चाहिए। दल के छोटे-बड़े सभी कार्यकर्ताओं में किसी उद्देश्य के प्रति निष्ठा होनी चाहिए। निष्ठा से स्वार्पण और अनुशासन की भावना आती है। अनुशासन का अर्थ केवल कतिपय कार्य करने या न करने की बाह्य एकरूपता नहीं है। उपर से आप जितना भी अनुशासन लादेंगे, दल की आंतरिक शक्ति उतनी ही कम होगी। राजनीतिक दल के लिए अनुशासन का वही स्थान है, जो समाज के लिए धर्म का।

यदि कार्यकर्ताओं में निष्ठा और अनुशासन की भावना रहेगी तो दल के अंदर कोई गुट या मतभेद नहीं होगा। जब दल का हित, स्वहित के आगे दब जाता है, तब गुटबाजी प्रारम्भ हो जाती है। यह अहंकारी एवं विकृत चिन्तन की सामाजिक अभिव्यक्ति है। मतभेदों से जर्जर दल, अप्रभावकारी बन जाता है और कार्य करने की सारी क्षमता खो देता है।

एक अच्छे दल का तीसरा गुण यह है कि उसे कतिपय आदर्शों से आबद्ध होना चाहिए और उसकी सारी नीतियां उन्हीं आदर्शों की उपलब्धि के दृष्टिकोण से तैयार की जानी चाहिए। स्वार्थसाधकता और अवसरवादिता को ‘यर्थाथवाद’ का स्थान नहीं मिलना चाहिए। आदर्शवादी, सिद्धांतवादी और प्रेरणासंपन्न व्यक्ति का यर्थाथवाद एक सद्गुण है। वह छिछली मनोवृत्ति वाले, अवसरवादी तथा दोलायमान व्यक्ति की विशेषता नहीं है। राजनीतिक दल और नेता अपने व्यवहार के द्वारा राजनीतिक जीवन के मूल्य निर्धारित करते हैं। वे मानदण्डों की स्थापना करते हैं। स्वाभाविकतया ही उनकी नीतियों को किसी भी स्थिति में जन-व्यवहार के इन मानकों का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। जनतंत्र का अर्थ मात्र चुनाव नहीं है। इसके लिए सुसंगठित जनता, सुगठित दलों तथा राजनीतिक व्यवहार की सुव्यवस्थित परंपराओं की आवश्यकता होती है।

एक अच्छे दल को एक अच्छे प्रत्याशी-समूह के साथ, अच्छे और यर्थाथवादी कार्यक्रम भी रखने चाहिए। अन्तत: कार्यक्रम का ही क्रियान्वयन होना है। अच्छे लोग भी बुरे कार्यक्रम या अव्यावहारिक कार्यक्रम के साथ, जनता के कष्टों को दूर करने में सहायक नहीं होंगे। इसके विपरीत वे और अधिक कठिनाइयां पैदा करेंगे।

इन तीनों बातों पर एकीकृत ढंग़ से विचार करना चाहिए। सभी पहलुओं से आदर्श की प्रस्थापना कठिन हो सकती है। किन्तु तीनों का यथासंभव अधिकाधिक संयोजन किया जा सकता है। अच्छे उद्देश्यवाले व्यक्ति, जो परोपकार की भावना से प्रेरित हों और अनुशासित हों, ऐसे कार्यक्रम की कमी, बहुत कुछ दूर कर सकते हैं, जो सर्वथा अस्वीकार्य (या अव्यवहार्य) सिद्धांतों पर आधारित न हो। यदि दल अनुचित दिशा में जा रहा हो, तो कितनी भी अच्छाई या कार्य-दक्षता, स्थिति में सुधार नहीं ला सकती। दिशा-निर्धारण के बाद स्थिति को सही एवं सुदक्ष ढंग़ से हाथ में लेकर गति को तीव्रता प्रदान की जा सकती है।

 

शंकर अग्रवाल

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