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भारत के तरकश में सबसे घातक तीर

भारत की अग्नि-2 मिसाइल पाकिस्तान को डराने के लिए काफी साबित हो सकती है, लेकिन चीन को काबू करने के लिए अग्नि-5 की जरूरत थी। मिसाइलों के मामले में भारत चीन से काफी पीछे है, क्योंकि उसके पास 4 सौ से अधिक आईसीबीएम हैं और भारत ने तो अभी पहली अग्नि-5 आईसीबीएम का ही विकास किया है फिर भी करीब एक दर्जन अग्नि-5 मिसाइल, जो परमाणु बम से लैस होगी, चीन में यह आतंक पैदा करने के लिए काफी होगी कि वह भारत पर कोई मिसाइली हमला करने की जुर्रत नहीं करे।
अग्नि-5 मिसाइल भारत के तरकश में सबसे घातक तीर है, जो दुश्मन में इतना खौफ पैदा करेगी कि वह भारत पर कभी हमला करने की नहीं सोचेगा। पांच हजार किलोमीटर दूर तक मार करने में सक्षम अग्नि-5 मिसाइल का भारत ने गत 15 सितंबर का दूसरी बार सफल परीक्षण कर दुनिया को दिखा दिया है कि वह अब मिसाइलों के मामले में बड़ी ताकतों से होड़ करने लगा है। पहली बार इस मिसाइल का सफल परीक्षण पिछले साल 19 अप्रैल को किया गया था। उस समय ही भारत दुनिया का छठा चुनिंदा देश बन गया था, जिसके पास इस तरह की मारक दूरी वाली अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल यानी आईसीबीएम है। अब तक अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन के पास इस क्षमता वाली मिसाइलें हैं।

हालांकि अमेरिका, रूस, चीन जैसे देशों के पास 10-12 हजार किलोमीटर दूर तक मार करने वाली आईसीबीएम हैं और भारतीय रक्षा वैज्ञानिकों का दावा है कि भारत भी इतनी मारक दूरी वाली बैलिस्टिक मिसाइलों का विकास कर सकता है, लेकिन फिलहाल भारत की रक्षा जरूरतों के लिए इतना ही काफी है। वैज्ञानिकों का कहना है कि जब जरूरत पड़ेगी हम 10 हजार किलोमीटर वाली मिसाइल भी बना लेंगे।

भारत ने 80 के दशक में जब मिसाइलों के विकास का काम शुरू किया था तब अमेरिका, यूरोप जैसे देश काफी चिंतित हो गए थे और भारत को मिसाइलों की दुनिया में प्रवेश करने से रोकने के लिये कई हथकंडे अपनाए थे। भारत पर तकनीक निर्यात की बंदिशें लगाईं गईं। 1983 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भारत में बैलिस्टिक मिसाइलों के विकास की बुनियाद रखी और इसकी जिम्मेदारी तब के अंतरिक्ष वैज्ञानिक ए. पी. जे. अब्दुल कलाम को सौंपी। ‘एकीकृत मिसाइल विकास कार्यक्रम’ नाम की यह परियोजना अब तीन दशकों बाद पूरी तरह फल देने लगा है। इस कार्यक्रम के तहत भारतीय वैज्ञानिकों ने न केवल 7 सौ कि.मी. दूर तक मार करने वाली अग्नि-1 का विकास कर सेना को सौंपा, बल्कि 15 सौ से 2 हजार किलोमीटर दूर तक मार करने वाली अग्नि-2, तीन हजार कि.मी. की मारक क्षमता वाली अग्नि-3 का विकास किया। इसके बाद की कड़ी अग्नि-4 की मारक दूरी 4 हजार कि.मी. की होगी, लेकिन भारत ने फिलहाल इस नाम से मिसाइल का विकास नहीं किया है। कुछ उन्नत तकनीक से लैस अग्नि-4 के विकास पर अभी काम चल रहा है।

अग्नि मिसाइलों के अलावा भारतीय मिसाइल वैज्ञानिकों ने 250 किलोमीटर दूर तक मार करने वाली पृथ्वी और इसकी नौसैनिक किस्म ‘धनुष’ का विकास किया है। 150 कि.मी. की मारक क्षमता वाली ‘प्रहार’ मिसाइल भी सेना को सौंपी जा चुकी है, जो दुश्मन के किसी सैन्य जमावड़े को पारंपरिक बम से पूरी तरह नष्ट करने में सक्षम होगी।

लेकिन इसी साल एक बड़ी कामयाबी भारतीय वैज्ञानिकों ने हासिल की जब किसी पनडुब्बी के भीतर से छोड़ी जाने वाली ‘के-15’ नाम की मिसाइल के भी सफल परीक्षण के बाद इसे भारत की पहली परमाणु पनडुब्बी ‘अरिहंत’ में लगाने की तैयारी चल रही है। अरिहंत में लगी के-15 यानी ‘सागरिका’ नाम की यह मिसाइल भारत की त्रिआयामी परमाणु क्षमता का तीसरा आयाम साबित होगी। यह मिसाइल दुश्मन के किसी परमाणु हमले के जवाब में छोड़े जाने के लिए बनाई गई है। इस मिसाइल को किसी पनडुब्बी से छोड़ी जा सकेगी। यह पनडुब्बी समुद्र के भीतर छुपी रह कर दुश्मन पर अपनी मिसाइल से हमला बोल सकती है।

अग्नि-5 मिसाइल की विशेषताएं कुछ और ही हैं। इस मिसाइल की कैनिस्टर में रखी जाने वाली किस्म का विकास किया जाएगा, जो कहीं भी छुपा कर रखी जा सकती है और दुश्मन के किसी मिसाइली हमले के कुछ मिनटों के भीतर ही इसे छोडऩे लायक बनाया जा सकता है। यानी अब भारत को दुश्मन पर परमाणु हमले के लिए अपनी मिसाइलों को तैनात करने के लिए लंबी-चौड़ी तैयारी नहीं करनी होगी। अग्नि-5 ने भारत को वह क्षमता प्रदान की है, जिससे भारत दुश्मन के धौंस में आने से खुद को बचा सकेगा। दूसरी ओर दुश्मन भी भारत को धौंस देने के पहले कई बार सोचेगा।

अग्नि-5 के आगे की जो किस्में विकसित की जा रही हैं, वह विध्वंस पैदा करने वाली होगी। अग्नि-5 की अगली कड़ी अग्नि-6 के विस्फोटक शीर्ष यानी वारहेड में एक विस्फोटक नहीं, बल्कि तीन या चार बम रखे होंगे जो एक साथ दुश्मन के तीन या चार ठिकानों पर सटीक निशाने के साथ हमला करने में सक्षम होंगे। कई दिशाओं में एक साथ मार करने वाली ‘एमआईआरवी’ यानी ‘मल्टीपल इंडिपेंडेंटली टारगेटेबल मिसाइल’ बनाना भारतीय मिसाइल वैज्ञानिकों का अगला लक्ष्य है, जिस पर काफी प्रगति हासिल की जा चुकी है। अग्नि-6 की जो अगली किस्म विकसित की जा रही है वह एक साथ तीन या चार शहरों को अपने विध्वंस का शिकार बना सकती है। चूंकि एक साथ तीन या चार मिसाइलें भिन्न-भिन्न दिशा में जा कर गिरेंगी इससे दुश्मन के पास बचाव का कोई कारगर उपाय नहीं होगा। अमेरिका, रूस जैसे देशों ने बैलिस्टिक मिसाइलों के हमलों से बचने के लिए ‘एंटी मिसाइल प्रणाली’ का विकास किया है, ताकि किसी हमलावर मिसाइल को बीच आसमान में ही रोक कर, हवा में ही उसे नष्ट कर दिया जा सके। लेकिन जब दुश्मन पर एमआईआरवी क्षमता वाली मिसाइलें गिरेंगी तब इससे बचने की काट दुनिया में किसी भी देश के पास नहीं होगी।

19 मीटर लंबी और 50 टन वजन वाली अग्नि-5 मिसाइल तीन स्टेज वाली है, जो दुश्मन के ठिकाने पर सौ मीटर के अचूक दायरे में गिरने के काबिल है। इसलिए अग्नि-5 मिसाइल में पारंपरिक बम भी लगा कर दुश्मन के इलाके में गिराया जाए तो दुश्मन के किसी महत्वपूर्ण राजनीतिक ठिकाने को तहस नहस किया जा सकता है। हालांकि पांच हजार किलोमीटर जैसी मारक दूरी वाली बैलिस्टिक मिसाइल का इस्तेमाल परमाणु बम गिराने के लिए ही किया जाता है। अग्नि-5 में करीब डेढ़ टन वजन के विस्फोटक रखे जा सकते हैं जो एक परमाणु बम रखने के लिये काफी है। लेकिन वारहेड में विस्फोटक का वजन घटा दिया जाए तो अग्नि-5 की मारक दूरी बढ़ाई भी जा सकती है।

इतनी लंबी दूरी तक मार करने में सक्षम मिसाइल से चीन के किसी भी बड़े शहर को निशाना बनाया जा सकता है। इसलिए कहा जा सकता है कि भारत के लिए अग्नि-5 मिसाइल देश की सामरिक जरूरतों को पूरा करने में सक्षम होगी। दूसरी ओर पाकिस्तान के लिए सिर्फ भारत ही दुश्मन देश है, जिस पर वह निशाना साधने की कोशिश कर सकता है। इसलिए उसे 2 हजार कि.मी. से अधिक मारक दूरी वाली मिसाइलों की जरूरत नहीं है। इतनी मारक दूरी वाली मिसाइल से वह भारत की राजनीतिक राजधानी दिल्ली और आर्थिक राजधानी मुंबई को आसानी से निशाना बना सकता है। लेकिन भारत को अपना मिसाइल कार्यक्रम आगे बढ़ाने के लिए पाकिस्तान के साथ-साथ चीन को भी ध्यान में रखना होता है। भारत की अग्नि-2 मिसाइल पाकिस्तान को डराने के लिए काफी साबित हो सकती है, लेकिन चीन को काबू करने के लिए अग्नि-5 की जरूरत थी। हालांकि मिसाइलों के मामले में भारत चीन से काफी पीछे है, क्योंकि उसके पास 4 सौ से अधिक आईसीबीएम हैं और भारत ने तो अभी पहली अग्नि-5 आईसीबीएम का ही विकास किया है फिर भी करीब एक दर्जन अग्नि-5 मिसाइल, जो परमाणु बम से लैस होगी, चीन में यह आतंक पैदा करने के लिए काफी होगी कि वह भारत पर कोई मिसाइली हमला करने की जुर्रत नहीं करे।

पिछले कुछ सालों में भारत के इर्द-गिर्द बैलिस्टिक मिसाइलों का प्रसार काफी तेजी से हुआ है और इसमें चीन और रूस की भूमिका काफी महत्वपूर्ण रही है। जहां पाकिस्तान को चीन ने दो हजार किलोमीटर दूर तक मार करने वाली ‘शाहीन’ और ‘गोरी’ मिसाइलों की सप्लाई की है, वहीं रूस ने ईरान को भी अपनी स्कड मिसाइलें बेची हैं। सऊदी अरब को भी चीन ने ही 25 सौ किलोमीटर दूर तक मार करने वाली ‘तुंगफंग’ मिसाइल सप्लाई की है। इस्राइल भी लंबी मारक दूरी वाली मिसाइलों से लैस है। दूसरी ओर चीन ने तिब्बत में भारत की ओर निशाना कर बीसियों बैलिस्टिक मिसाइलें तैनात की गई हैं।

अपने आस-पास मिसाइलों से भरी इस दुनिया में भारत के लिए भी यह काफी जरूरी था कि वह ऐसी मिसाइलों से लैस हो, जो दुश्मन में खौफ पैदा करने की पूरी क्षमता रखता हो। भविष्य में जो भी युद्ध होंगे उसमें बैलिस्टिक मिसाइलों की अहम भूमिका होगी। इन मिसाइलों की बदौलत दुश्मन देश के किसी प्रमुख राजनीतिक ठिकाने जैसे प्रधानमंत्री निवास या कोई सरकारी इमारत को निशाना बना कर ध्वस्त किया जा सकता है। यदि इसमें कामयाबी मिली तो दुश्मन देश की सेना, सरकार और पूरी जनता का मनोबल काफी गिराया जा सकता है। इसके मद्देनजर अग्नि-5 की सामरिक भूमिका की अहमियत समझा जा सकता है। भविष्य की किसी लड़ाई में यदि शुरुआती दौर में दुश्मन देश को लगा कि वह काफी झटके खा रहा है, तब हताशा में वह अपनी बैलिस्टिक मिसाइलों जैसे घातक हथियार का इस्तमेाल करने से परहेज नहीं करेगा। तब इसका जवाब अग्नि- 5 जैसी मिसाइल से दिया जा सकता है। 15 सितंबर को ऐसी ही अग्नि-5 का दोबारा सफल परीक्षण करने के बाद डीआरडीओ के प्रमुख डा. अविनाश चंद्र ने कहा कि इसके परीक्षण के साथ-साथ इसके उत्पादन का भी काम शुरू किया जा चुका है। इसे 2015 के अंत तक भारतीय सेनाओं को सौंपे जाने की संभावना है।

 

रण जीत

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