ब्रेकिंग न्यूज़ 

वोटबैंक के लिए देशहित से खिलवाड़

दो साल बाद राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक बुलाई गई तो आतंकवाद और माओवादी हिंसा जैसे गंभीर मुद्दे एजेंडे से गायब थे। मुजफ्फरनगर और किश्तवाड़ के दंगों पर भी चर्चा ऐसे की गई मानो २०१४ के चुनाव की तैयारी चल रही हो। यही नहीं, यूपीए सरकार देश की सुरक्षा के साथ भी खुफिया एजेंसियों के राज को उजागर करके खतरनाक खेल में लगी हुई है।
करीब दो साल बाद 23 सितंबर को राष्ट्रीय एकता परिषद की केंद्र सरकार ने बैठक तो बुलाई मगर अफसोस आज के ज्वलंत मुद्दे आतंकवाद, माओवादी हिंसा और देशविरोधी गतिविधियों में सक्रिय विभिन्न गुट इसके एजेंडे में नहीं थे। चर्चा के लिए मुजफ्फरनगर के दंगों के बाद उभरे सांप्रदायिक स्थितियां, महिलाओं और एससी-एसटी के खिलाफ हिंसा की बढ़ती घटनाएं ही एजेंडे में थीं। ये मुद्दे भी महत्वपूर्ण हैं लेकिन महिला और एससी-एसटी अत्याचारों के मामले में प्रस्ताव के अंतिम मजमून पर कोई विवाद नहीं था और पहले ही सर्वानुमति बन चुकी थी।

जहां तक सांप्रदायिक तनाव बढऩे का मामला है तो उस पर चर्चा नाकाफी थी। मुजफ्फनगर दंगों पर काफी जल्दीबाजी में विचार हुआ। इसी तरह जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ की एकतरफा हिंसा की भी पर्याप्त समीक्षा नहीं की गई। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री की रुचि सिर्फ दंगों के लिए दूसरों पर दोष मढऩे में थी जबकि जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री को आबादी के एक बड़े वर्ग की कोई परवाह नहीं थी जिसका उनकी सरकार से भरोसा उठ गया है। वे दंगों की समीक्षा करने के बदले आरोप लगाने में ही जुटे रहे। दोनों मुख्यमंत्री दंगों पर काबू पाने के लिए अपनी पीठ थप-थपाने में ही व्यस्त रहे।

मुजफ्फरनगर और किश्तवाड़ दोनों घटनाओं से हमें महत्वपूर्ण सबक मिलते हैं। किश्तवाड़ की घटना दिन में शुरू हुई थी। वहां एक मंत्री डेरा डाले हुए थे। देशविरोधी नारे लगाती भीड़ ने एक समुदाय के घरों-दुकानों पर हमला बोल दिया था। शाम को सेना ने स्थिति पर काबू पाया। अभी भी इस सवाल का जवाब नहीं मिला है कि वहां ऐसी स्थिति कैसी बनी।

मुजफ्फरनगर से हमें बड़ा सबक मिलता है। वहां दो समुदायों की अलग सभाएं क्यों होने दी गईं। उनमें भड़काऊ भाषण दिए गए। उत्तर प्रदेश सरकार को साजिश का आरोप लगाने के बदले आत्मावलोकन करना चाहिए कि उससे कहां क्या गड़बड़ी हुई।

इसलिए राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक का मकसद किश्तवाड़ या मुजफ्फरनगर की समीक्षा करना और गलतियों को सुधारना नहीं, बल्कि कुछ और लगता है। यह 2014 के आम चुनावों की तैयारी का हिस्सा लगता है। यह इससे भी स्पष्ट है कि किश्तवाड़ और मुजफ्फरनगर से मोदी को जोडऩे की कोशिश की गई जबकि उनका कहीं कोई लेनादेना नहीं था।

इसी तरह दो मुद्दे और विचारणीय हैं। ये तो यूपीए सरकार के और खतरनाक इरादों को जाहिर करते हैं। मैंने 4 जून को ही एक लेख लिखा था कि ‘क्या सीबीआई को खुफिया ब्यूरो का रहस्य खोल देना चाहिए।’ उसके बाद काफी कुछ हो चुका है। भारतीय सेना की कुछ गतिविधियों के रहस्योद्घाटन से अब इस मामले और बड़े सवाल खड़े हो गए हैं कि ‘क्या सरकार को गोपनीय गतिविधियों की जानकारी लीक करके इसे सार्वजनिक बहस का मुद्दा बनाना चाहिए।’

सुरक्षा परिदृश्य
भारत में सुरक्षा का परिदृश्य काफी संवेदनशील है। पिछले दो दशकों से हम सीमा पार से आतंकवाद के शिकार बने हुए हैं और किसी पारंपरिक युद्ध से अधिक हमारे निर्दोष नागरिकों का खून बह चुका है। शुरुआत में यह आतंकी गतिविधियां सीमा पार से संचालित हो रही थीं। अब देश में ही कई स्थानीय मॉड्यूल सक्रिय हैं। मध्य भारत का एक बड़ा हिस्सा माओवादी हिंसा की चपेट में है। प्रधानमंत्री खुद इसे देश की सबसे बड़ी चुनौती बता चुके हैं। पूर्वोत्तर के कई राज्यों में अलगाववादी गुट सक्रिय हैं। पूर्वोत्तर की कई सरकारों ने अशांति दूर करने के लिए इनसे समझौते किए या सुरक्षा तंत्र का विस्तार किया है। इन अलगाववादी गतिविधियों पर अंकुश लगाने में सेना और पुलिस के मिलेजुले प्रयास कुछ हद तक सफल रहे हैं। ऐसे में हमारी खुफिया एजेंसियों को मजबूत बनाने की दरकार है ताकि वे आतंक और बगावत फैलाने वाले इन गुटों की गतिविधियों से परदा उठा सकें। यह कहने की दरकार नहीं है कि हमारी खुफिया एजेंसियों ने आतंकवाद से लड़ाई में काफी सफलता हासिल की है और कई देशी-विदेशी मॉड्यूलों को पकड़ा है।

खुफिया एजेंसियों की भूमिका अपनी क्षमताएं विकसित करने के साथ-साथ रणनीतिक स्थितियां माकूल करने की भी है। उन्हें उन समुदायों में दोस्त बनाने की दरकार हो सकती है जिसमें आतंकी माड्यूल तैयार किए जाते हैं। इन एजेसियों को आतंकियों की बातचीत भेदने के लिए तकनीकी तंत्रों के इस्तेमाल की जरूरत होती है। उन्हें देश के बाहर आतंकी या उग्र हिंसक गुटों में भेदिए बनाने और विदेशी सरकारों में अपने संपर्क सूत्र बनाने की दरकार पड़ती है।

कड़वी सच्चाई यह है कि सुरक्षा के मामले में गंभीर खतरे के परिदृश्य में खुफिया एजेंसियों की गतिविधियों को मजबूत करने की दरकार है। खुफिया एजेंसियों को कई तरह की गोपनीय गतिविधियां चलानी पड़ती हैं मगर हमें इन्हें सार्वजनिक रूप से स्वीकार करने में सचेत रहने की भी दरकार है। व्यापक जनहित में हम ऐसी गतिविधियों की बात नहीं करते। अब मेरा यूपीए सरकार पर आरोप है कि उसने अपने संकीर्ण स्वार्थों के लिए कम से कम दो मामलों में गोपनीय गतिविधियों की जानकारी जानबूझकर लीक की, जिसके गंभीर नतीजे हो सकते हैं।

इशरत जहां मामला
मैं इशरत जहां मामले की यहां विस्तार से चर्चा नहीं करूंगा क्योंकि मैं अपने 4 जून के लेख में कर चुका हूं। अब यह स्पष्ट हो गया है कि यह एक केंद्रीय खुफिया एजेंसी की आतंक विरोधी कार्रवाई का हिस्सा था। यूपीए सरकार को इस पर गंभीर आत्ममंथन करना चाहिए कि गुजरात हाईकोर्ट के सामने अपने हलफनामे को बदलकर क्या देशहित में काम किया। इस तरह उसने अपनी ही एजेंसी के कथित तौर पर किए को बेमानी बता दिया। उसने गुजरात के कुछ पुलिस अधिकारियों और भाजपा नेताओं को निशाना बनाने के लिए सीबीआई का इस्तेमाल किया जबकि असलियत यह है कि वह केंद्र सरकार की कार्रवाई थी, न कि गुजरात सरकार की। लेकिन इस प्रक्रिया में केंद्र सरकार ने खुफिया एजेंसी की तमाम गतिविधियों को नंगा कर दिया। जम्मू-कश्मीर में सेना द्वारा पैसा देने का आरोप मुझे इसकी कोई जानकारी नहीं थी। एक अखबार में छपे सरकारी लीक से पता चला कि जम्मू-कश्मीर में कुछ नेताओं को राज्य सरकार को अस्थिर करने के लिए रकम दी गई। पूर्व सेना प्रमुख ने कहा है कि अलगाववाद ग्रस्त राज्यों में सेना स्थितियों को काबू में रखने के लिए कुछ गोपनीय भुगतान करती है। वह विभिन्न समुदायों में हमदर्दी पैदा करने के लिए कई गतिविधियां करती है, ताकि स्थिति काबू में रहे। हममे कोई भी ऐसी गतिविधियों को नही जानता, न जानने की ईच्छा रखता है। ये गतिविधियां
सूचना के अधिकार के तहत नहीं आतीं। सीबीआई अपने जांच के अधिकार को रॉ, खुफिया ब्यूरो या सैन्य खुफिया अथवा किसी ऐसी एजेंसी के मामले में पैसे के लेनदेन में कथित गड़बडिय़ों की जांच के लिए इस्तेमाल नहीं कर सकती। ये गतिविधयां न संसद के प्रति जवाबदेह हैं, न न्यायिक समीक्षा के दायरे में आती हैं। इन गतिविधियों को मौजूदा सरकार को जरूरी साबित करना पड़ता है। प्रधानमंत्री, गृह मंत्री, रक्षा मंत्री, सेना प्रमुख, खुफिया ब्यूरो तथा रॉ के प्रमुख और कई सरकारी विभागों के प्रमुख के पास ऐसी अनेक जानकारियां होती हैं, जो उन्हीं के साथ दफन हो जानी चाहिए। ये उनके संस्मरणों का हिस्सा भी नहीं बन सकतीं।

तो, क्या कोई सत्तारूढ़ पार्टी इसलिए ये सूचनाएं उजागर कर सकती है कि उसके पूर्व सेना प्रमुख से रिश्ते ठीक नहीं रहे? क्या मुश्किल में फंसे सेना प्रमुख को यह स्वीकार करना चाहिए था कि भुगतान हुए थे? दरअसल यूपीए सरकार राज करने का गुर खो बैठी है। उसे बस चिंता अपने चुनावी लाभ की है, उसे देशहित की कोई चिंता नहीं है।

(लेखक राज्यसभा में विपक्ष के नेता हैं)

 

 

अरुण जेटली

детские сайтысамый лучший процессор

Leave a Reply

Your email address will not be published.