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सिनेमा का अर्थशास्त्र

शाहरुख और सलमान जैसे बड़े सितारों की फिल्में निर्माता को रिलीज से पहले ही इतना पैसा दे देती हैं कि उन्हें फायदा हो जाता है। यानी सिनेमा का धंधा चोखा होता जा रहा है और जोखिम भी है सबसे कम। क्या है इसका गणित? कहां से, क्यों और कैसे होती है कमाई

आज जब हम सिनेमा के बॉक्स ऑफिस की बात करते हैं तो बात सौ करोड़ और दो सौ करोड़ की होने लगती है। पिछले तीन-चार साल में सिनेमा ने कमाई के इन आंकड़ों को कई बार छुआ है। सिनेमा ने यहां तक पहुंचने में एक लंबी यात्रा की है। इस यात्रा के पीछे कई उन लोगों का धैर्य और त्याग भी है, जिन्होंने इसके लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया और खुद भले ही कुछ हासिल न कर पाए हों, सिनेमा के रास्तों को विस्तार दिया।

अगर हम मूक युग की बात न भी करें तो सिनेमा को जबान मिले 80 साल से ज्यादा हो गए हैं। उस समय स्टूडियो प्रणाली होती थी। यानी कुछ स्टूडियो होते थे जो फिल्म बना रहे थे। इनमें से हिमांशु राय का बॉम्बे टॉकीज था, वी. शांताराम का प्रभात स्टूडियो था, कोलकता में बीरेंद्रनाथ सरकार का न्यू थिएटर्स था, सोहराब मोदी का मिनर्वा मूवीटोन था। फिल्में ये स्टूडियो ही बनाते थे। इनमें काम करने वाले, चाहे वे टेक्नीशियन हों या कलाकार, सभी तनख्वाह पर होते थे। स्टार तब भी होते थे। अशोक कुमार, देविका रानी, चंद्र मोहन, किशोर साहू, दुर्गा खोटे, शांता आप्टे आदि सब स्टार अभिनेता थे, लेकिन सभी अपने-अपने स्टूडियो के लिए तनख्वाह पर काम करते थे। सरस्वती देवी, रायचंद्र बोराल, के.सी. डे, पंकज मलिक आदि सभी संगीतकारों को स्टार का दर्जा हासिल था, लेकिन ये सभी मुलाजिम हुआ करते थे। आप जरा कल्पना की कीजिए कि बाम्बे
टॉकीज के लिए जिस निर्देशक ज्ञान मुखर्जी ने ‘किस्मत’ जैसी सुपर हिट फिल्म दी जो कोलकाता के एक सिनेमाघर में तीन साल आठ महीने लगातार चली थी (जिसे हम उस दौर की पहली ब्लॉक बस्टर मान सकते हैं), उन्हें केवल श्रेय मिला, अर्थलाभ तो स्टूडियो की मालकिन देविका रानी और उनके हिस्सेदारों को ही हुआ।

लेकिन धीरे-धीरे होने यह लगा कि ये स्टार, चाहे वे अभिनय के क्षेत्र के हों, संगीत के क्षेत्र के हों या फिर निर्देशन के, अपने लिए ज्यादा मांगें करनी शुरू कीं और उनकी तनख्वाहें बढऩे भी लगीं। इन्होंने अपने लिए ज्यादा आजादी की मांग भी की और अभिनेता त्रिमूर्ति – दिलीप कुमार, राज कपूर, देव आनंद के जमाने तक आते आते हम देखते हैं कि स्टार स्टूडियो का बंधन तोड़कर स्वतंत्र रूप से काम करने लगे थे। निर्माण के क्षेत्र में नए लोग, अपने नए विचारों के साथ आने लगे। बिमल रॉय, महबूब खान के साथ साथ राज कपूर और देव आनंद ने भी अपने अपनी फिल्म निर्माण कंपनियां बना दीं। इनकी कंपनियों में लोग तनख्वाह पर नहीं होते थे, बल्कि बाकायदा अनुबंध पत्र पर दस्तखत करके आते थे। राज कपूर ने शंकर जयकिशन की संगीतकार जोड़ी को पहला मौका दिया और लंबे समय तक उनके साथ काम किया लेकिन यह संगीत जोड़ी दूसरे निर्माताओं के लिए भी काम कर रही थी। सारे बंधन खत्म हो गए थे।

ऐसे बहुत से निर्माता आ गए जो फिल्मों से कमाई अपनी सारी जमा-पूंजी को फिल्मों में लगाते। सफलता मिलती तो ऐयाशी का जीवन बिताते और फिल्म न चल पाती तो सड़क पर आ जाते। फिल्म अभिनेता भगवान को भला कौन भूल सकता है। उस जमाने की स्टंट फिल्मों के नायक भगवान ने जब फिल्म ‘अलबेला’ बनाई तो फिल्म ने अपार सफलता हासिल की। यह एक कॉमेडी फिल्म थी और इस फिल्म ने भगवान दादा को कॉमेडी कलाकार के रूप में स्थापित कर दिया था। सी. रामचंद्र के गीतों ने लोगों को थिरकने के लिए बाध्य कर दिया था। मरीन ड्राइव पर उन्होंने घर खरीद लिया था। लंबी से गाड़ी ले ली थी, मंहगी सिगरेट पीने लगे थे। इसके बाद उन्होंने ‘रंगीला’, ‘झमेला’, ‘लाबेला’ जैसी कई फिल्में बनाईं। लेकिन सफलता ने जैसे मुंह ही फेर लिया था। फिल्मों से आई सारी कमाई फिल्मों में ही चली गई। घर बिका, गाड़ी बिकी, आग में सारी फिल्मों के प्रिंट जलकर खत्म हो गए। ‘अलबेला’ का प्रिंट इसलिए बच गया क्योंकि वह एक
वितरक के पास गिरवी पड़ा था। सब जानते हैं कि इसके बाद वे छोटे-मोटे रोल करके अपना गुजारा चलाते रहे और गरीबी का जीवन जिया।
यहां पर एक बदलाव आता है। विश्वयुद्ध के कारण महंगाई आसमान पर पहुंच गई थी। फिल्मों के बजट लगातार बढ़ रहे थे। हजारों में बनने वाली फिल्म लाखों में बनने लगी थी। फिल्म इतिहासकार मनमोहन चड्ढा अपनी पुस्तक हिंदी सिनेमा का इतिहास में लिखते हैं: ”1938 में अच्छे-खासे बजट की भव्य फिल्म बनाने में सत्तर या अस्सी हजार रुपए ही खर्च आता था। 1946 तक यह बजट बढ़कर सात-आठ लाख रुपए तक पहुंच गया था। सस्ती से सस्ती फिल्म बनाने में भी पांच लाख रुपए खर्च होने लगे थे। फिल्म के संदर्भ में कीमतों में सबसे अधिक बढ़ोत्तरी अभिनेताओं की कीमतों में हुई। पहले जो अभिनेता एक फिल्म में काम करने के 5,000 रुपए लेता था, अब वह एक फिल्म के दो लाख रुपए मांगने लगा था। इन दो लाख रुपयों में तीस से पचास हजार रुपए तक की राशि खुले तौर पर और डेढ़ लाख रुपए की राशि काले धन के रूप में लेता था।’’
वैध रास्तों से कमाया गया पैसा इसके लिए कम पडऩे लगा। धीरे-धीरे दूसरे विश्वयुद्ध के बाद होर्डिंग, ब्लैकमार्केटिंग, स्मगलिंग जैसे अवैध रास्तों से आया पैसा फिल्मों के लिए उपलब्ध होने लगा। कुछ निर्माता लालच में आए भी। ऐसे व्यापारियों के लिए काला धन लगाने के लिए फिल्म से सुरक्षित और कौन सा माध्यम हो सकता था। वह एक ऐसा दौर था जब फिल्म उद्योग में वैध पैसे के मुकाबले अवैध पैसे का लेन-देन कई गुना बढ़ गया था।

हाजी मस्तान जैसे अंडरवल्र्ड डॉन भी इस क्षेत्र में आए और खुले हाथों से अपना पैसा फिल्मों के लिए उपलब्ध कराया। हाजी मस्तान के साथ उस दौर के कई फिल्मकारों की करीबी के फोटो तब की पत्रिकाओं में छपते भी थे।

एक अजीब बात हमें यह भी दिखाई देती है कि सत्तर के दशक में आकर हम देखते हैं कि फिल्मों में अंडरवल्र्ड क्राइम का महिमामंडन होने लगा। सलीम-जावेद की पटकथा लेखक जोड़ी, जिसे उस समय स्टारडम हासिल हो गई थी, यश चोपड़ा के लिए ‘दीवार’ जैसी फिल्म लिखकर अंडरवल्र्ड डॉन को ग्लोरिफाई कर रहे थे। ‘शक्ति’ भी कमोबेश उसी का एक्सटेंशन थी। चूंकि ये फिल्में सफल थीं, इसलिए इस तरह के चरित्र फिल्मों में खूब नजर आने लगे। तर्क दिया जा सकता है कि पश्चिम में इटेलियन माफिया डॉन कार्लियानो के चरित्र को ग्लोरिफाई करते हुए ‘गॉडफादर’ सीरीज की फिल्में बनी थी। लेकिन वहां ऐसा

नहीं था कि वास्तविकता में भी फिल्म कलाकारों की मौजूदगी किसी डॉन की पार्टी में नजर आ रही हो। यहां तो यह होने लगा था। निर्माता-निर्देशकों को धमकियां मिल रही थीं कि अपनी फिल्म में फलां कलाकार को काम दो वरना…। स्टारडम हासिल कर चुकी संगीतकार जोड़ी के एक पार्टनर पर आरोप था कि एक निर्माता को कत्ल कराने के लिए उसने सुपारी दी थी। वह बेचारा आज तक देश वापस नहीं लौट पाया।

अंडरवल्र्ड पुराण को फिलहाल यहीं छोड़कर आगे बढ़ा जाए। अपने निर्माण के प्रारंभ से ही हमारा सिनेमा पाश्चिम के सिनेमा के साथ कदम से कदम मिलाकर चलता आ रहा था, लेकिन पिछली सदी के अंतिम वर्षों में हमारी और उनकी फिल्मों के बीच में टेक्नोलॉजी का बड़ा अंतर आ गया था। डिजास्टर फिल्मों में वे जिस दर्जे के स्पेशल इफैक्ट दे रहे थे, हम उनका मुकाबला नहीं कर पा रहे थे। स्पीलबर्ग की ‘जुरासिक पार्क’ अंग्रेजी के साथ साथ हिंदी में भी डब करके दिखाई गई और इसने हॉलिवुड के लिए भारत में एक बहुत बड़े बाजार के दरवाजे खोल दिए। इसके बाद इस सीरीज की अन्य फिल्में, वाचोस्की बंधुओं की ही ‘मैट्रिक्स’ श्रृंखला की फिल्मों भारत में धमाल मचाया। ‘अवतार’ ने तो उस हफ्ते रिलीज हुई हिंदी फिल्मों के मुकाबले ज्यादा कमाई की। इन सब में कंप्यूटर ग्राफिक्स का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हुआ था। यह काफी मंहगी तकनीक थी और भारतीय फिल्मों के अर्थशास्त्र को डगमगा सकती थी। इसके बावजूद तमिल में रजनी कांत ने ‘रोबोट’ और हिंदी में शाहरुख खान ने ‘रा वन’ बनाकर ताल ठोकी। स्पेशल इफैक्ट की दौड़ में धूम, डॉन और कृष श्रृंखला की फिल्मों ने खासी धूम मचाई और भारत में ही नहीं ब्रिटेन और अमेरिका में भी खासी कमाई की। एक अच्छी बात यह हुई कि कंप्यूटर ग्राफिक्स में भारत दुनिया के किसी भी देश से आगे रहा और हॉलिवुड के निर्माता भी अपनी फिल्मों के स्पेशल इफैक्ट के लिए भारत की ही तरफ देखते रहे हैं। इस तरह उनकी मोटी कमाई का कुछ हिस्सा भारत में भी आ रहा है।

बॉलीवुड का पैसा?
फिल्म बनाने के लिए पैसा कहां से और कैसे आता है और कैसे खर्च होता है, इस पर बात करना भी जरूरी है। हर व्यवसाय की तरह फिल्म भी एक प्रपोजल के रूप में शुरू होती है, पहले पैसा खर्च करती है। कमाई की बात बाद में आती है। कहानी फाइनल होने के बाद कलाकारों से बात होती है और स्टार कास्ट के हिसाब से फिल्म का बजट बनता है। यहां एक तरफ निर्माता अपना निर्माण कार्य शुरू करता है और दूसरी ओर वह बड़े कॉरपोरेटों के पास अपने प्रपोजल लेकर जाता है। पहले वह वितरकों के पास जाता था। इन दोनों के पास जाने का उद्देश्य यही होता था कि ये फिल्म के अधिकार खरीदें और निर्माता को पैसे देने शुरू करें। इस तरह से निर्माता का पैसा एक तरफ खर्च हो रहा है और दूसरी तरफ से आ रहा है। लेकिन अब तक पैसा एक जेब से दूसरी जेब में ही आ जा रहा है।

इसके बाद चाहे निर्माता हो या कॉरपोरेट हाउस, वे वितरकों को अपनी फिल्म दिखाकर उनसे विभिन्न क्षेत्रों के अधिकार के बारे में सौदे करते हैं। वितरण क्षेत्रों का बंटवारा, जो करीब 40 के दशक में हो गया था, अब भी चला आ रहा है। प्रमुख वितरण क्षेत्र बंबई का है जो वास्तव में मुंबई तक सीमित न होकर उत्तरी महाराष्ट्र और गुजरात तक फैला हुआ है। दूसरा बड़ा क्षेत्र अब दिल्ली और यूपी है, जिसमें उत्तराखंड भी शामिल है। ईस्ट पंजाब में पंजाब के अलावा हरियाणा और हिमाचल प्रदेश भी शामिल हैं। पश्चिम बंगाल में बंगाल के अलावा बिहार, ओडिशा, पूर्वोत्तर के प्रांत और नेपाल भी आते हैं। सी.आई. मध्यप्रदेश का पूर्वी हिस्से के अलावा महाराष्ट्र का कुछ हिस्सा भी है। सीपी एंड बरार में बाकी मध्य प्रदेश और कुछ महाराष्ट्र शामिल है। इसी तरह हैदराबाद, मैसूर, निजाम आदि चुनाव क्षेत्र बंटे हुए हैं। कुछ वितरण क्षेत्र निर्माता खुद रखते हैं और कुछ को बेचते हैं। जो वितरक पूरा क्षेत्र खरीदते हैं वे उस क्षेत्र को टुकड़ों में बांटकर उन्हें अन्य वितरकों को बेचते हैं। विदेश में वितरण अधिकार के लिए ओवरसीज टेरेटरी बनाई गई है, जहां से पहले तो आय कम होती थी लेकिन अब अच्छी आय होने लगी है।

इनके अलावा फिल्मी संगीत के अधिकार और सेटेलाइट प्रसारण के अधिकार भी होते हैं। पहले कायदा होता था कि फिल्म रिलीज के कम से कम छह महीने बाद ही कोई फिल्म सेटेलाइट प्रसारण के लिए दी जाती थी, लेकिन अब रिलीज के कुछ सप्ताह के भीतर ही कोई न कोई टेलिविजन चैनल फिल्म दिखा देता है। इसलिए यहां से भी मोटी कमाई होने लगी है।

अब बात आती है प्रदर्शन की। अंतत: सिनेमाघर वह जगह है जहां से फिल्म अपना पैसा वसूलती है। टिकट की बिक्री से आने वाला पैसा ग्रॉस इनकम कहलाता है। इसमें से हर राज्य के अनुसार मनोरंजन कर की रकम निकालकर वहां डाल दी जाती है। बाकी पैसों में से तय अनुपात में पैसा वितरक और सिनेमाघर को मिलता है। वितरकों को जो पैसा मिलता है उससे पहले तो वह अपनी उस रकम की भरपाई करता है जो उसने निर्माता को देनी है या दे दी है। इसके बाद वह अपना हिस्सा रखता है और अगर होने वाली आय इस सब से ज्यादा है तो उसे ओवारफ्लो कहा जाता है। उसमें वितरक के अलावा निर्माता का भी हिस्सा होता है। पहले फिल्म की कमाई लंबे समय तक होती रहती थी लेकिन अब एक, दो या तीन हफ्तों में ही फिल्म कमाई कर पाती है। फिल्म के एक साथ इतने प्रिंट रिलीज होते हैं कि इच्छुक दर्शकों को फिल्म अपनी इच्छा से देखने को मिल जाती है। हाउसफुल का बोर्ड कम ही दिखाई देता है।

शाहरुख और सलमान जैसे कलाकारों की फिल्में निर्माता को रिलीज से पहले ही इतना पैसा दे देती हैं कि उन्हें फायदा हो जाता है। शाहरुख की ‘रा वन’ के बिकने पर ही उन्हें अपने खर्च से ज्यादा पैसे मिल गए थे। लेकिन कुछ क्षेत्रों में जहां फिल्म ने कम बिजनेस किया, वहां के वितरक या उपवितरक को घाटा उठाना पड़ा। फिल्म के आय और व्यय का तंत्र दरअसल काफी जटिल है। यहां पर मैंने जितना हुआ, सरलीकरण करने का प्रयास किया लेकिन मैं जानता हूं, जानकारों को इसमें कसर जरूर नजर आएगी। उनसे मैं क्षमा याचना के अलावा और क्या कर सकता हूं।

इन सभी नवाचारों के अलावा हमारे सितारों के खास अंदाज के पीछे भी दर्शक दीवाने हुए जाते रहे हैं। सलमान खान के दबंग अंदाज ने दर्शकों को इतना प्रभावित किया कि 100 करोड़ से ज्यादा की कमाई करवा दी और फिल्मों के धन संग्रह के नए प्रतिमान बना दिए। आमिर खान ने ‘थ्री ईडियट्स’ के माध्यम से इस आंकड़े को दो सौ करोड़ तक पहुंचाया, जिसकी बराबरी अब तक सिर्फ शाहरुख खान ने ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ में सवार होकर की।

सितारों की वजह से इतनी मोटी कमाई होने के कारण उनकी मांगे भी बढ़ती रही हैं। चर्चा है कि आज ये खान अभिनेता चालीस-पचास करोड़ रुपए लेने के अलावा किसी वितरण क्षेत्र में वितरण के अधिकार भी मांग रहे हैं और निर्माता दे भी रहे हैं। इस दौड़ में अगर कोई चीज मारी जाती है तो वह फिल्म की गुणवत्ता है। टिकट खिड़की पर ज्यादा से ज्यादा सफलता लेेने के लिए नायक के लटकों-झटकों के अलावा आयटम डांस और बेसिर पैर की कॉमेडी भरनी पड़ती है। ‘थ्री ईडियट्स’ अपवाद हो सकती है जिसने एक साफ सुथरी फिल्म होने के साथ ही मोटी कमाई की है, बाकी सभी फिल्मों में सब कुछ बेसिर पैर का है। हिंसा ऐसी कि हीरो का घूसा खाकर लोग हवा में उड़ते दिखाई देते हैं। इन सब में पैसा लगता है। इतनी मोटी रकम खर्च करना एक आम निर्माता के लिए काफी मुश्किल होता है। लेकिन अब इस क्षेत्र में कॉरपोरेट उतर आए हैं। अब स्थिति एक तरह से पुराने स्टूडियो सिस्टम वाली हो गई है। इन कॉरपोरेट के पास फिल्म बनाने के लिए धन तो होता ही है, उनकी अपनी वितरण व्यवस्था भी होती है। यहां तक कि प्रदर्शन के लिए सिनेमाघर तक अपने होते हैं। इनका अपना गणित होता है। किसी भी कॉरपोरेट की तरह इनके कारोबार में एक व्यवस्था है। पैसे की तंगी की वजह से इनकी फिल्में कभी रुकती नहीं है, जैसे पहले आम निर्माताओं के साथ होता था। कलाकार भी इनके सामने ज्यादा नखरे नहीं दिखाते। फिल्म अपने शिड्यूल के अनुसार बनती और पूरी होती है। यूटीवी, अष्ट विनायक फिल्म्स, बिग सिनेमा, सहारा कम्युनिकेशन्स, बालाजी फिल्म्स, प्रीतीश नंदी कम्युनिकेशन्स के अलावा यशराज, मुक्ता आट्र्स और धर्मा प्रोडक्शन्स, जो फिल्म निर्माता कंपनी के रूप में शुरू हुए थे, अब कॉरपोरेट बन गए हैं। आम कॉरपोरेट व्यवसायी की तरह इनको अपना उत्पादन बनाए रखना पड़ता है, इसलिए कुछ बड़ी फिल्मों के बीच में ये छोटी फिल्में भी बनाते रहते हैं। अब तो वार्नर ब्रदर्स, कोलंबिया, 20 सेंचुरी फॉक्स जैसे हॉलिवुड के निर्माता भी भारत की फिल्मों में पैसे लगाने लगे हैं तो हमारे बिग सिनेमा वाले अनिल अंबानी हॉलिवुड में भी फिल्में बना रहे हैं।

 

सुरेश उनियाल

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