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अर्थव्यवस्था पर माओवादी कहर

स्थानीय लोगों का मानना है कि सारंडा वन क्षेत्र और जमशेदपुर के आसपास इलाकों में अवैध खनन से लौह अयस्क माओवादी चीन रवाना करते हैं। सारंडा वन क्षेत्र दुनिया में लौह अयस्क का इकलौता सबसे बड़ा भंडार है। यहां 200 करोड़ टन लौह अयस्क का अनुमान है।

केंद्रीय गृह मंत्रालय के मुताबिक माओवादियों की 30 फीसदी काडर महिलाएं हैं। गृह राज्यमंत्री आर.पी.एन. सिंह ने लोकसभा में बताया कि ‘हाल के नक्सली हमलों में अच्छी-खासी संख्या में महिला काडरों की हिस्सेदारी के सबूत मिले हैं। सुरक्षा बलों से गोलीबारी में बड़ी संख्या में महिला काडर मारी गई हैं।’ माओवादी महिलाओं को सुरक्षा कवच की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। 25 मई को छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले की दरभा घाटी में कांग्रेसी काफिले पर हमले में भी महिला माओवादियों की बड़ी तादाद थी। उसमें कांग्रेस नेता मारे गए थे और माओवादियों के मुख्य निशाना रहे महेंद्र कर्मा को तो गोलियों से भूनने के बाद महिला माओवादियों द्वारा छूरा भोंकने के 70 से अधिक निशान थे। इससे पता चलता है कि कैसे माताओं-बहनों को करुणा और ममता के स्वाभाविक गुणों से दूर किया जा रहा है और उन्हें हत्यारी मशीन में तब्दील किया जा रहा है। बच्चों का बचपन छीना जा रहा है। दरभा में माओवादी हमले के दौरान रेडियो सेट संचालित करने वाले बच्चे की उम्र महज 10 साल की थी। ताजा रिपोर्टों के मुताबिक माओवादियों ने 10,000 लड़के-लड़कियों का ‘बाल संघम’ और ‘बाल दस्ता’ बनाया है। ये सभी बच्चे 10 से 15 साल उम्र के हैं।

दरभा घाटी के हमले का जश्र दिल्ली के जेएनयू में कुछ छात्रों ने, जो लगभग पूरी तरह सरकारी पैसे पर उच्च शिक्षा पा रहे हैं, विश्विविद्यालय परिसर में गंगा ढाबा पर मनाया। अगस्त के तीसरे हफ्ते में जेएनयू के एक पूर्व छात्र हेम मिश्रा को महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में पकड़ा गया। वह एक विजिटिंग कार्ड में लगे माइक्रोचिप में कूट संदेश के साथ गिरफ्तार हुआ। यह संदेश एक उच्च शिक्षाविद की ओर से माओवादियों की विशेष क्षेत्रीय शाखा के लिए था। कुछ दिनों पहले ही हेम मिश्रा की सूचना पर महाराष्ट्र पुलिस ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जी.एन. साईबाबा के घर पर छापा मारा। दिल्ली विश्वविद्यालय और जेएनयू में साईबाबा जैसे अनेक अध्यापक हैं। माओवादी आतंकी विचार अध्यापक और छात्र के रिश्ते को भी बर्बाद कर रहा है।

राज्य और अर्थव्यवस्था की तबाही
माओवादी देश के महिलों और बच्चों को अपराधी बना रहे हैं। उनकी आत्मा नष्ट कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ में महेंद्र कर्मा और विद्याचरण शुक्ल की हत्या से ऐसा आतंक बरपा है कि कोई राजनीतिक गतिविधि उनकी रजामंदी या गठजोड़ के बिना नहीं की जा सकती है। ऐसे माहौल में निष्पक्ष और साफ-सुथरे चुनाव नहीं हो सकते। देश में लाल आतंक के समूचे क्षेत्र में कई विधायक ऐसे हैं जो माओवादियों की शह से जीते हैं। ये विधायक सभी पार्टियों के हैं। इस तरह माओवादी क्रांति के नाम पर देश के संविधान को रौंद रहे हैं। इस तरह महिला, बच्चों, छात्र, शिक्षक, संविधान और सबसे बढ़कर लोकतंत्र सभी माओवादियों के निशाने पर हैं। वे हर परिवार, समाज और राज्य की संस्था को नेस्तनाबूद करने पर तुले हैं।

माओवादियों के नियंत्रण वाले इलाकों में लोग और लोकतंत्र ही अस्तित्व की लड़ाई नहीं लड़ रहा है, बल्कि बाहरी और भीतरी निहितस्वार्थी तत्वों के उकसावे पर माओवादी अर्थव्यवस्था और विकास को भी धराशायी कर रहे हैं। देश के भीतरी निहितस्वार्थी तत्व तो इतने ताकतवर हैं कि प्रधानमंत्री तक उनसे सवाल करने से घबराते हैं। ऐसी एक संस्था राष्ट्रीय सलाहकार परिषद है जो वह कर रही जिसे करने की वैधानिक जिम्मेदारी प्रधानमंत्री और उनके मंत्रिपरिषद को है।

खनन उद्योग हुआ चौपट
ताजा रिपोर्ट के मुताबिक देश के 708 पुलिस जिलों में 203 जिले माओवादी आतंक के घेरे में हैं। 90 जिलों में तो बेपनाह हत्या औ मार काट जारी है जबकि 27 जिलों में पूरी तरह माओवादियों का फरमान ही चलता है। माओवादी खासकर खनन उद्योग से भारी जबरन उगाही करते हैं। इन इलाकों में खनन समेत सभी उद्योग-धंधों को 7 से 10 प्रतिशत लेवी देनी पड़ती है। सरकारी सूत्रों के मुताबिक माओवादियों का वार्षिक बजट 1,500 करोड़ से 2,000 कारोड़ रुपए के बीच है। लेकिन इंफ्रास्ट्रक्चर और विकास पर सकल सरकारी बजट और माओवादियों की लेवी दरों, जो खुलकर सार्वजनिक की गई हैं, की गणना करने पर इन पंक्तियों के लेखक का माओवादियों के वार्षिक बजट का आकलन पांच गुना ज्यादा बैठता है। माओवादियों की जबरन उगाही के शिकार सिर्फ ठेकेदार, व्यापारी और उद्योग-धंधे करने वाले ही नहीं हैं, बल्कि सरकारी अधिकारी और राजनीतिक नेता भी हैं। जो पैसे देने से इनकार करते हैं, उन्हें जान देकर कीमत चुकानी पड़ती है। क्या ऐसे आतंक के माहौल में कोई निवेश और आर्थिक प्रगति संभव है?

दरअसल लाल आतंक का क्षेत्र वही है जहां देश का खनिज भंडार है, इसलिए हमारी पूरी अर्थव्यवस्था पिछड़ रही है। ऐसे में यह सवाल मौजूं है कि क्या माओवाद अपने मौजूदा स्वरूप में भारत में प्रगति और आर्थिक विकास के मूल स्रोत पर छद्म युद्ध है? क्या इस माओवादी आतंकी युद्ध के लिए आदिवासियों की अस्तित्व रक्षा का बहाना बनाया जा रहा है? क्या माओवादी किसी दुश्मन देश की शह पर भारत की अर्थव्यवस्था को नेस्तनाबूद करने के लिए उसके मूल स्रोत खनिज संसाधनों पर निशाना साध रहे हैं? इस संबंध में इंडियन एक्सप्रेस में शेखर गुप्ता के लेख ‘करंट एकाउंटबिलीटी डेफिसिट’ में आंख खोलने वाले आंकड़ों का जिक्र है। हमारी त्रासद आर्थिक गाथा के कुछ नमूने इस प्रकार हैं :

देश में 2010 से ही लगातार खनन में गिरावट दर्ज की जा रही है। 2010 से अब तक गिरावट की दर -2.37 प्रतिशत है।

अनेक इस्पात के कारखाने आयातित माल से चल रहे हैं। 2010 और 2013 के बीच लौह अयस्क और लौह स्क्रैप का आयात 7 अरब डॉलर से दोगुना होकर 14.9 अरब डॉलर हो गया है। पिछले साल हमारा लौह अयस्क निर्यात 87 प्रतिशत घटकर 11.737 करोड़ टन हो गया। चीन का इस्पात उत्पादन 78 करोड़ टन है जबकि भारत का उत्पादन मात्र 8 करोड़ टन है। भारत में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा बॉक्साइट का भंडार है लेकिन हमारे एल्युमीनियम संयंत्रों को सिर्फ आयात पर निर्भर रहना पड़ रहा है। विडंबना देखिए कि चीन में बॉक्साइट का भंडार नहीं है, लेकिन उसका एल्युमीनियम उत्पादन 2 करोड़ टन है, जबकि हमारा 1.5 करोड़ टन। भारत में कोयले का प्रचुर भंडार है पर वह 16 अरब डॉलर की कीमत का कोयला आयात कर रहा है। इस तरह कोयले और लौह अयस्क का आयात हमारे चालू खाते का घाटा काफी बढ़ा रहे हैं।

लेख में 30 साल पहले देंग शियओ पिंग के उस बयान को उद्धृत किया है कि अगले 25 साल में चीन को आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक और टेलीकॉम गजटों के लिए जरूरी दुनिया में उपलब्ध धातुओं और खनिज (गैडोलिनाइट, सेरियम, स्कैनडियम और ट्रियम) के 90 प्रतिशत हिस्से को हासिल करना है। आज चीन इनमें 80 प्रतिशत पर पियंत्रण कर चुका है और इसके बल पर पैनासोनिक तथा सोनी जैसी जापानी कंपनियों से बढ़त बना ली है। बाकी 20 प्रतिशत खनिज में आधा से अधिक भारत के पास है, लेकिन माओवादी आतंक के चलते उसे हासिल नहीं किया जा सकता है।

माओवादी खनन पर पूरा काबू पाने के लिए खदानों पर हमले करते हैं और बुलडोजर तथा ट्रकों में आग लगा देते हैं। वे खनिज की रेलवे से ढुलाई में भी बाधा डालते हैं। राष्ट्रीय खनिज विकास निगम की बैलाडिला खदान से लौह अयस्क राष्ट्रीय इस्पात निगम लिमिटेड के लिए ढुलाई करने वाली किरनदुल-कोट्टावसला लाइन पर लगातार हमले होते हैं। यह लाइन छत्तीसगढ़ में दंतेवाड़ा से आंध्र प्रदेश के विजाग तक जाती है। स्थानीय लोगों का मानना है कि सारंडा वन क्षेत्र और जमशेदपुर के आसपास इलाकों में अवैध खनन से लौह अयस्क माओवादी चीन रवाना करते हैं। सारंडा वन क्षेत्र दुनिया में लौह अयस्क का इकलौता सबसे बड़ा भंडार है। यहां 200 करोड़ टन लौह अयस्क का अनुमान है। यह क्षेत्र झारखंड, ओडीशा और छत्तीसगढ़ के तिमुहाने पर स्थित है और माओवादियों के लिए अति रणनीतिक महत्व का क्षेत्र है। माओवादियों को सिर्फ इसी क्षेत्र से खनन कंपनियों की जबरन उगाही से 500 करोड़ रुपए की आय होती है। ये कंपनियां अवैध खनन में करती हैं, यानी अपने पट्टे वाले इलाके से बाहर खनन करती हैं और माओवादी उनकी रक्षा करते हैं।

माओवादियों के लिए देश भर में जानमाल और अर्थव्यवस्था के ठिकानों को तहस-नहस करने के लिए खनन उद्योग ही विस्फोटक पाने का मुख्य स्रोत है। केंद्र सरकार के मुताबिक 2010 और 2012 के बीच 9,00,000 किलोग्राम विस्फोटक सामग्री चोरी हुई और अवैध खनन करने वालों तथा माओवादियों के पास पहुंच गई। इतना विस्फोटक एक समूचे छोटे शहर को बर्बाद करने के लिए पर्याप्त है।

सिकुड़ रहा है सुरक्षित आर्थिक गतिविधि का स्थान
माओवादी लाल आतंक के कॉरीडोर के साथ दूसरे अलगाववाद तथा उपद्रवग्रस्त क्षेत्रों को मिला दिया जाए तो देश का करीब 40 प्रतिशत हिस्सा बनता है। इससे जाहिर है कि भारत में सुरक्षित स्थान सिकुड़ कर आधा रह गया है। लिहाजा, आर्थिक गतिविधियों के लिए भी क्षेत्र काफी घट गया है। कौन-सा देशी या विदेशी सम्मानजनक उद्योग या व्यापारिक कारपोरेट लाल आतंक क्षेत्र या पूर्वोत्तर या कश्मीर में निवेश करना चाहेगा? कल्पना कीजिए कि अगर इन क्षेत्रों में शांति और सुरक्षा कायम होती तो भारत की आर्थिक प्रगति और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) कहां पहुंचती। छत्तीसगढ़ और ओडीशा में ही 46.7 अरब डॉलर का निवेश बिजली क्षेत्र और इस्पात संयंत्रों में 2012 में प्रस्तावित था। देश में लौह अयस्क, कोयला, तांबा, बॉक्साइट और दूसरे खनिजों के विशाल भंडार होते हुए भी खनन क्षेत्र की जीडीपी में हिस्सेदारी मात्र 2.8 प्रतिशत है।

अर्थशास्त्री भारत की इस भयावह आर्थिक गिरावट की कई वजहें गिना रहे हैं। हालांकि किसी का ध्यान इस गिरावट के लिए आंतरिक सुरक्षा की भयावह स्थितियों की ओर नहीं गया है। भारत यूरोपीय संघ के निवेश के लिए अगले पांच साल 20 मुफीद ठिकानों में नहीं है। चीन उनका पसंदीदा ठिकाना बना हुआ है। एक प्रतिष्ठित जर्मन अखबार फ्रैंकफुर्त एलगेमाइन ने अपने संपादकीय में भारत के बारे में लिखा, ‘……सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों का लगातार उल्लंघन होता है। अपराध दर बढ़ रही है। सुरक्षित जीवन, जो हर सरकार की बुनियादी जिम्मेदारी है, मुश्किल हो गया है। भारत हर मायने में ‘नाकाम राज्य’ की श्रेणी में पहुंच गया है।’

ऐसा लगता है कि एक सुनियोजित चाल के तहत देश की कार्यपालिका के प्रमुख को राष्ट्रीय सलाहकार परिषद जैसी संविधानेत्तर संस्था से घेर दिया गया है। यह विदेशी और देशी विध्वंसकारी ताकतों की योजना के बिना नहीं हो सकता है। यह तब एकदम स्पष्ट हो गया जब विनायक सेन के खिलाफ अदालती कार्रवाई देखने यूरोपीय आयोग के लोग यहां पहुंचे। आज तक किसी सरकारी अधिकारी ने यह नहीं बताया कि विनायक सेन को जमानत मिलने के फौरन बाद योजना आयोग की स्वास्थ्य कमेटी में क्यों और कैसे रख लिया गया।

इस लेखक को ‘कर्नाटक में अवैध खनन’ पर एक डाक्युमेंटरी के प्रदर्शन के लिए दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में बुलाया गया था। लेकिन बाद में लगा उस आयोजन का मुख्य मकसद ‘विनायक सेन बचाओ अभियान’ को प्रारंभ करना था। श्रोताओं-दर्शकों में हर पांत के कम्युनिस्ट माओवाद से सहानुभूति रखने वाले से लेकर मुख्यधारा की पार्टियों तक के लोग थे। यह गंभीर संदेह का विषय है कि मुख्यधारा की कम्युनिस्ट पार्टियों और माओवादियों के बीच फर्क सिर्फ लोगों के सामने दिखावे और सुविधा के लिए तो नहीं है।

देश में सुरक्षित स्थान के सिकुडऩे के साथ कृषि भी गंभीर खस्ताहाली की ओर पहुंच गई है। लाल आतंक के क्षेत्र में बड़ी मात्रा में कृषियोग्य भूमि खाली पड़ी है। जमीन के मालिक माओवादियों के डर भाग गए हैं। एक आकलन के अनुसार करीब 5 लाख लोग इस आतंक से विस्थापित हुए हैं। इसलिए माओवादी ही देश में खाद्य असुरक्षा पैदा कर रहे हैं।

आदिवासी शोषण का दुष्प्रचार
निहितस्वार्थी तत्व यह मिथक जानबूझकर प्रचारित कर रहे हैं कि सभी माओवादी आदिवासी हैं और सभी आदिवसी वनोपज पर आश्रित हैं। सच्चाई यह है कि अधिकांश आदिवासी अपने भरण-पोषण के लिए कृषि पर आश्रित हैं। यह भी भारी दुष्प्रचार है कि माओवादी क्षेत्र ‘आदिवासी क्षेत्र’ ही है। गृह मंत्रालय के मुताबिक माओवाद से सर्वाधिक ग्रस्त राज्य छत्तीसगढ़, ओडीशा, बिहार और झारखंड हैं। माओवादियों का असर बिहार के 32 जिलों में है लेकिन एक में भी आदिवासी बहुसंख्या में नहीं हैं। ओडीशा में आदिवासी आबादी 22 प्रतिशत है और बिहार से काटकर बने झारखंड में महज 26 प्रतिशत (2001 की जनगणना के अनुसार)है। झारखंड में सिर्फ तीन जिलों लोहरदग्गा, पश्चिम सिंहभूम और गुमला में ही आदिवासी बहुसंख्या में हैं।

इसलिए यह गंभीरता से सोचने की दरकार है कि यूरोपीय लोग यहां के आदिवासियों को लेकर क्यों इतना चिंतित हैं। मणिपुर की माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने 9 दिसंबर 2011 की एक प्रेस विज्ञप्ति में बताया कि उसे फिलीपींस, मलेशिया, यूरोपीय देशों और कनाडा के कई अति वामपंथी गुटों का समर्थन हासिल है। ऐसा लगता है कि माओवादी आतंक के लिए आर्थिक और धार्मिक एजेंडे को मिला कर आदिवासी शोषण की कथा बनाई जा रही है। यूरोपीय गुट आदिवासी इलाकों में तमाम आर्थिक गतिविधियों को खत्म करके ‘धर्मांतरण’ की अच्छी फसल के लिए उपजाऊ जमीन तैयार कर रहे हैं। वे आर्थिक गतिविधियों के इसलिए विरोधी है क्योंकि इससे उनके धर्मांतरण में रुकावट पैदा होगी।

अर्थव्यवस्था : धार्मिक एजेंडे का बंदी
कई सामाजिक कार्यकर्ता और राजनीतिक खनन के लिए जमीन के अधिग्रहण का इस आधार पर विरोध करते हैं कि इससे आदिवासियों की पारंपरिक धार्मिक मान्यताओं पर चोट पहुंचती है, लेकिन उन्हीं मान्यताओं की धर्मांतरण के लिए ईसाई मिशनरियां धज्जी उड़ाती हैं। मिशनरियों के असर से आदिवासी सांस्कृतिक विरासत नष्ट हो रही है, जो उनकी पारंपरिक मान्यताओं, रस्मो-रिवाज में घुली-मिली होती है। मेक्सिको और ग्वाटेमाला में तो मिशनरियों ने ईसाई परंपरा के साथ स्थानीय परंपरा को जोड़ दिया है। वहां चर्च की दीवारों पर माया सभ्यता के देवताओं की तस्वीरें लगी होती हैं। लेकिन भारत में आदिवासियों की पूरी सभ्यता, संस्कृति और धार्मिक पहचान बदल दी जाती है।

ओडीशा की नियमगिरी पहाडिय़ों में यूरोपीय गुटों का, सीधे और अपने एनजीओ के जरिए, आदिवासियों की धार्मिक मान्यताओं के आधार पर वेदांता की बॉक्साइट परियोजना का विरोध पाखंड और अवसरवादिता के अलावा और कुछ नहीं है। यहां यह जिक्र किया जाना चाहिए कि आदिवासी धार्मिक भावनाओं का हवाला देकर ही चर्च ऑफ इंग्लैंड ने वेदांता में अपना शेयर बेच दिया। यह कंपनी मूलत: इंग्लैंड की है। ऐसा लगता है कि इन निहितस्वार्थी तत्वों ने भारतीय ‘सुपारी’ हत्यारों को वेदांता की हत्या की सुपारी दी है।
आदिवासी समाज की एकता में ये मिशनरियां अभिशाप साबित हो रही हैं। धर्मांतरण को लेकर इसी टकराव का नतीजा ओडीशा में ग्राहम स्टेंस की बर्बर हत्या के रूप में दिखा था। यही टकराव 2008 में कंधमाल में स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या का कारण बना। माओवादियों और मिशनरियों की यह सांठ-गांठ विनायक सेन के मुकदमे के दौरान यूरोपीय आयोग के सदस्यों के पहुंचने में भी दिखता है। इसी से दो इतालवी पाओलो बॉस्को (58) और क्लाउडियो कॉलेंगेलो (60) के अपहरण (कथित तौर पर नाटक) का राज भी खुलता है। पाओलो ओडीशा में कई साल से ट्रैक्रिंग कर रहा था। ये दोनों अपनी सरकार की चेतावनी को नजरअंदाज कर जंगलों में पहुंच गए थे। दोनों का अपहरण कथित तौर पर कंधमाल क्षेत्र में हुआ, जहां ज्यादातर माओवादी पन्ना जाति के ईसाई हैं। इस इलाके में माओवादियों और चर्च की सांठ-गांठ से ही सब कुछ चलता है और भारी हिंदू विरोधी माहौल है। अप्रैल 2012 में बिहार से 9 फ्रांसीसी पर्यटकों को इसलिए वापस भेज दिया गया क्योंकि उन पर माओवादियों से संपर्क का संदेह था। यूरोप के अति वामपंथी गुट वहां माओवादियों के पक्ष में आयोजन करते हैं। इनमें माओवादी नेता और उनके समर्थक पहुंचते हैं।
कम्युनिस्ट और उनके अतिवादी गुट गरीबी और आत्म गौरव से विरत क्षेत्रों में ही पनपते हैं। मौजूदा स्थितियां हमारा आत्म गौरव नष्ट कर रही हैं और हमें वंचित कर रही है। सरकारी प्रचार सामग्रियां हममें आश्रित बनने की संस्कृति पैदा कर रही हैं। गरीबी हटाओ योजनाएं ऐसी बनाई गई हैं, जिससे गरीबी बढ़े और लोग वंचित बने रहें। आतंक की राजनीति से विकास को सीमित करके यह संभव है कि लोग गरीब बने रहें। यह बाहरी ताकतों के साजिश के बिना संभव नहीं है।

नतीजा
देश की अर्थव्यवस्था की सेहत सुरक्षित स्थानों के भयावह सिकुडऩ से बेतरह बिगड़ रही है। भारत के विरुद्ध ताकतें आर्थिक और धार्मिक एजेंडे के तहत एकजुट हैं और इन्हें अब नजरअंदाज करना संभव नहीं है। संविधानेत्तर संस्थाओं का मकसद भी स्पष्ट हो चुका है। आर्थिक प्रगति और विकास माओवादियों और उनके समर्थकों को नहीं भाता है। सरकार उन्हें इसका मौका मुहैया करा रही है, क्योंकि मनमोहन सिंह ने उस हैसियत से सरकार नहीं चलाई जो उन्हें संविधान से हासिल है। जर्मन पत्रिका ‘मैनेजर मैगजिन’ ने एक लेख में लिखा, ‘भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह में अनुयायी बनने का स्वाभाविक गुण है, नेता का नहीं।’

 

आर.एस.एन. सिंह

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