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दागियों के लिए दागदागियों के लिए दाग

दागी सांसदों या विधायकों को संरक्षण देने के संबंध में लाया गया अध्यादेश पूरी तरह अनावश्यक ही नहीं, बल्कि संवैधानिक रूप से गलत भी है, क्योंकि देश में ऐसे हालात ही नहीं हैं, जिनके अन्तर्गत इस प्रकार का अध्यादेश लाने के लिए सरकार को बाध्य होना पड़े।
ज्यादा समय नहीं बीता है जब मीडिया इस बात की चर्चा किया करता था कि राजनेता अपने हितों के लिए बाहुबलियों का प्रयोग करते हैं। इस चर्चा में राजनेताओं और बाहुबलियों, खासतौर पर अपराधियों के बीच संबंधों पर चिन्ता सुर्खियां बनती थीं। राजनेताओं और अपराधियों के बीच के संबंधों पर पूर्व केन्द्रीय गृह सचिव और राज्यपाल एन.एन. वोरा समिति की रिपोर्ट भी आई, लेकिन भारतीय राजनीति के अपराधीकरण की मीडिया में सुर्खियां बनने पर विराम नहीं लगा। लेकिन समय गुजरने के साथ राजनेताओं के संरक्षण में सक्रिय अपराधियों की सोच बदल गई और वे राजनेताओं के हितों के लिए काम करने की बजाय खुद ही राजनेता बनने की डगर पर चल पड़े। इस वक्त देश की विधानसभाओं और संसद में लगभग 4835 में से 1448 ऐसे माननीय विराजमान हैं, जो अदालती मुकदमों में फंसे हैं। 162 सांसदों पर आपराधिक मामले हैं। दागी माननीयों को बाहर कर संसद और विधानसभाओं की धुलाई करने में न्यायपालिका की कोशिशों को आगे बढ़ाने की बजाय सरकार दागी माननीयों को बचाने के रास्ते खोजती रही है। दागी जन-प्रतिनिधियों की सदस्यता को बचाने के लिए लाया गया ताजा अध्यादेश उसी रास्ते पर सरकार का एक और कदम है। न्यायपालिका के आदेशों या दिशा-निर्देशों को तोडऩे-मरोडऩे या बदलने अथवा निष्प्रभावी करने का सरकार का यह प्रयास पहली बार नहीं हुआ है। ऐसे उदाहरणों को खोजने के लिए किसी विशेष प्रकाश की जरूरत नहीं है जिसमें सरकार ने अपने राजनीतिक स्वार्थों के चलते न्यायपालिका के आदेशों या दिशा-निर्देशों के विपरीत कानून बना कर बदल न डाला हो अथवा उन्हें निष्प्रभावी न कर दिया हो। सुप्रीम कोर्ट का 1986 में आया फैसला इस संबंध में न भूलने वाला उदाहरण बना हुआ है। शाहबानो मामले के इस फैसले में उच्चतम न्यायालय ने तो तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं की स्थिति पर गौर करते हुए उन्हें गुजराभत्ता दिए जाने से संबंधित अपना निर्णय सुनाया था, लेकिन तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने अल्पसंख्यकों के वोट बैंक की खातिर कट्टरपंथियों के दबाव में कानून बना कर इस फैसले को निष्प्रभावी बना दिया। चुनावों और जन-प्रतिनिधियों से जुड़े अदालत के फैसलों पर सरकार जिस प्रकार से सक्रिय होती है, लोकतन्त्र और संवैधानिक संस्थाओं के भविष्य को लेकर आम आदमी की शंकाएं उतनी ही अधिक बढ़ जाती हैं। दस जुलाई को अदालत ने सजा पाए व्यक्ति पर चुनाव लडऩे पर रोक लगा दी, लेकिन मानसून सत्र में संसद ने कानून में परिवर्तन कर उसे निरस्त कर दिया। ऐसा ही एक और फैसला उसी दिन आया जिसमें किसी सांसद या विधायक को दो साल से अधिक की सजा होने पर विधानसभा या संसद, जिसका भी वह सदस्य हो, उस सदन से उसकी सदस्यता तुरन्त समाप्त करने का फैसला दिया गया था। दागी माननीयों को संकट से उबारने के लिए सरकार ने पहले तो पुनर्विचार याचिका लगाई, लेकिन अदालत द्वारा उसे अस्वीकार कर दिए जाने पर सरकार अब अध्यादेश ले आई है। इसी प्रकार से एनडीए सरकार ने अध्यादेश लाकर कोर्ट के उस आदेश को निरस्त कर दिया था जिसमें अदालत ने चुनाव लडऩे वाले उम्मीदवारों को अपनी संपत्ति और आपराधिक पृष्ठभूमि का विवरण देने के लिए बाध्य किया था। वह बात अलग है कि मतदाता के लिए चुनाव में खड़े प्रत्याशी के बारे जानने का अधिकार बताते हुए अदालत ने बाद में उसे रद्द कर दिया था।

अदालत ने जन-प्रतिनिधित्व कानून, 1951 की धारा 8 (2) को यह कह कर हाल ही में असंवैधानिक करार देकर रद्द दिया कि संसद को दागी नेताओं पर कानून बनाने की शक्ति नहीं दी गई है। संविधान की धारा 102 और 191 में इस संबंध में साफ तौर पर रोक लगी है। संविधान के अनुच्छेद 101 (1) (ए) और 107 (3) (ए) का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि संविधान के ये अनुच्छेद दोषी ठहराए गए सांसद या विधायक की सदस्यता को बहाल रखने के लिए संसद को कोई कानून बनाने का अधिकार नहीं देता। दागी सांसदों या विधायकों को संरक्षण देने के संबंध में लाया गया अध्यादेश पूरी तरह से अनावश्यक ही नहीं, बल्कि संवैधानिक रूप से गलत भी है, क्योंकि देश में ऐसे हालात ही नहीं हैं, जिनके अन्तर्गत इस प्रकार का अध्यादेश लाने के लिए सरकार को बाध्य होना पड़े।

दूसरी ओर दागी सांसदों और विधायकों बचाने के लिए लाए ताजा अध्यादेश के विषय पर संविधान में ही रोक लगी है। सांसद को आम आदमी से ऊंचा करने वाले जन-प्रतिनिधित्व कानून की धारा (8)4 को कोर्ट ने इसलिए रद्द कर दिया, क्योंकि आम आदमी दंडित होने के बाद कानूनन चुनाव लडऩे के अयोग्य हो जाता है, लेकिन सांसद या विधायक दंडित होकर भी संसद में बना रह सकता है।

अध्यादेश लाने से पहले सरकार इस संबंध में कानून में बदलाव की राज्यसभा में विधेयक लाकर कोशिश कर चुकी है। सरकार ने जन-प्रतिनिधित्व कानून में संशोधन के लिए 10अगस्त को राज्यसभा में पेश किया था, लेकिन सरकार उस विधेयक को राज्यसभा में पारित नहीं करा सकी और विस्तृत विचार के लिए विधेकयक स्थायी समिति के पास भेज दिया गया। संविधान में सुप्रीम कोर्ट को संविधान और कानूनों की व्याख्या करने और आवश्यकता पडऩे पर दिशा-निर्देश बनाने का अधिकार सुप्रीम कोर्ट को दिया हुआ है। सुप्रीम कोर्ट अध्यादेश के विषय पर सरकार की पुनर्विचार याचिका रद्द कर इस संबंध में दिए अपने फैसले पर दृढ़ रहने की मुहर लगा चुका है। संसद ने अभी अपनी राय प्रकट नहीं की है। संसदीय लोकतन्त्र की गीता भारतीय संविधान के तीन प्रमुख स्तम्भों में से एक स्तम्भ मूक है और दूसरा स्तम्भ इसके विरूद्ध है। कवेल तीसरा स्तम्भ–कार्यपालिका इतनी सक्रिय है कि किसी भी तरह से माननीय दागियों का बचाव करना चाहती है।

कानून विज्ञ और संविधान विशेषज्ञ एक राय में साफ तौर पर इस अध्यादेश को गैर-जरूरी और संविधान विरुद्ध बता रहे हैं। अध्यादेश राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए उनके पास गया हुआ है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज, भाजपा के अध्यक्ष राजनाथ सिंह और पार्टी सीनियर नेता पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी को लेकर राष्ट्रपति से मिलीं और अध्यादेश स्वीकृत न करने के लिए उनसे अनुरोध किया।

वैसे तो सरकार ने पहले भी सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को पलटने में कभी कोताही नहीं बरती है। यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट के जनहित आदेशों को सरकार न्यायपालिका की अतिरिक्त सक्रियता बताती है। उम्मीदवारों से उनकी संपत्ति के ब्यौरे की सार्वजनिक घोषणा के लिए कहना, उनकी आपराधिक पृष्ठभूमि को चुनावों से पूर्व मतदाता के समक्ष लाना, दागी सांसदों और विधायकों को सदन से बाहर रखने की कोशिश करना, दागी सांसदों और विधायकों की सदस्यता समाप्त करने के प्रयासों से लोकतन्त्र को सुदृढ़ करने की कोशिश करने का सरकार को न्यायपालिका की निरंकुशता लगती है। लेकिन यह समझ से परे है कि मनमोहन सिंह सरकार दागी माननीयों को येन-केन-प्रकारेण बचाने के चक्तर में खुद पर ही क्यों दाग लगाने पर तुली हुई है। संसद से मंजूरी मिलने के आसार न होने पर अध्यादेश लाकर यह बताने की कोशिश करना कि दागियों को बचाना उसका परम धर्म है। सरकार यदि यही सब खुद को बचाने के चक्कर में करती तो भी समझ में आता। दागी माननीय यदि संसद से बाहर होते हैं, तो उससे सरकार के स्थायित्व पर कोई असर पडऩे वाला नहीं है। लोकसभा का कार्यकाल भी अधिक नहीं बचा है। राज्यसभा सांसद रशीद मसूद या राजद नेता लालू यादव के खिलाफ किसी परिणाम से कोई फर्क पडऩे वाला नहीं है। इस बात की संभावाना जरूर हो सकती है कि कांग्रेस के रणनीतिकारों ने सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को दूर दृष्टि दी हो कि अगले चुनावों में यदि सरकार बनाने के लिए राजद की जरूरत पड़ी, तो लालू यादव खुद को सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह से अनुग्रहित महसूस करते हुए उनके पाले में आने के लिए हिचकिचाएंगे नहीं। आने वाले चुनावों में जनता के समक्ष मनमोहन सिंह सरकार का यह दाग छिप सकेगा, यह कहना मुश्किल है, लेकिन यह कहना बिल्कुल मुश्किल नहीं है कि लालू के साथ के लिए मनमोहन सिंह सरकार के इस कदम पर कांग्रेस को चुनावों में कितनी कीमत चुकानी पड़ सकती है।

श्रीकान्त शर्मा

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