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सुख का स्रोत

सत्य का रास्ता कठिन है। इस रास्ते पर हजार चलने की सोचते हैं मगर सौ ही चल पाते हैं। नौ सौ तो सोचकर ही रह जाते हैं और जो सौ चल देते हैं, उनमें केवल दस ही पहुंच पाते हैं। नब्बे तो रास्ते में ही भटक जाते हैं। और जो दस पहुंचते हैं, उनमें भी सिर्फ एक ही सत्य को उपलब्ध हो पाता है, नौ फिर भी किनारे पर आकर डूब जाते हैं। तभी तो कहते हैं कि सत्य एक है। और याद रखें : सत्य परेशान हो सकता है, लेकिन पराजित नहीं।
मुनिश्री तरुणसागरमुनिश्री तरुणसागर
इन्द्रियों को वश में करना ही धर्म है
श्रीप्रकाश शर्मा
भगवान मनु के अनुसार मनुष्य के साधारण दस धर्म बताये गये हैं – धैर्य धारण, क्षमा, मन का निग्रह, अस्तेय (मन, वचन तथा शरीर से किसी के स्वत्व को ग्रहण करना चोरी है), शौच (बाहर तथा अन्दर की पवित्रता), इन्द्रिय निग्रह, विद्या, धी (बुद्धि), सत्य (वाणी, मन तथा आचरण का) तथा अक्रोध (मन के विरुद्ध कार्यो को बिना विकार के सह लेना), इन सभी दस धर्मों में मन का निग्रह अत्यंत कठिन साध्य किन्तु जीवन में परमानन्द प्राप्ति का द्वार माना जाता है। किन्तु मन की दिशा एवं गति बड़ा चंचल होता है और यही कारण है कि इस पर नियंत्रण पाने के लिए बड़ी साधना की आवश्यकता होती है।
महाभारत के एक प्रसंग में यक्ष ने युधिष्ठिर से एक प्रश्न पूछा – ”वायु से तेज क्या है?’’ युधिष्ठिर ने उत्तर दिया- ” मन’’। आशय यह है कि मानव मन वायु से भी अधिक तेज वेग से चलता है और यह मानव की बौद्धिक एवं भौतिक क्षमता को बहुत पीछे छोड़ देता है। अहम प्रश्न यह उठता है कि आखिर मन की गति पर नियंत्रण कैसे पायें ताकि सांसारिक संतापों से मुक्ति मिल जाए और जीवन अलौकिक आनंद की अनुभूति से अनुप्राणित हो जाए?

गौतम बुद्ध ने कहा था कि इच्छा मानवीय कष्टों की गंगोत्री है। इच्छा की पूर्ति नहीं होने की स्थिति में मन का उद्विग्न एवं अस्थिर होना अत्यंत ही स्वाभाविक है। किसी सरोवर के स्थिर जल में एक कंकड़ फेंककर देखिये। सरोवर के जल में जो उर्मियां बनती हैं, वे बहुत देर पश्चात स्थिर हो पाती हैं। मानव मन की दशा सरोवर के उसी स्थिर जल सरीखा ही है। हमारी इच्छाएं कंकरियां हैं, जो मन की नीरवता को निरंतर उद्वेलित करती रहती हैं। लिहाजा उन इच्छाओं को नियंत्रित करने की आवश्यकता है और फिर जो अपने मन को नियंत्रित कर लेता है, वह अंतत: समस्त संसार पर विजय प्राप्त कर लेता है।

 स्वामी चिन्मयानन्द

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