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महंगाई कांग्रेस पर भारी

हाल में कांग्रेस ने एक आंतरिक सर्वे कराया, जिसमें उसे अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों में लगभग 110 सीटें मिलने की ही उम्मीद लगाई गई है। इस सर्वे से हड़कंप मचा हुआ है।
कुछ दिन पहले ही संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार ने दावा किया था कि उसके शासनकाल में कंगालों (गरीबी की रेखा से नीचे के लोगों) की आबादी 37.2 फीसदी से घटकर 21.9 प्रतिशत रह गई है। दूसरी तरफ हाल में जारी खाने-पीने की चीजों के थोक मूल्य सूचकांक से पता चलता है कि 2004-2013 के बीच इसमें 157 फीसदी का इजाफा हुआ है। इस अवधि में सब्जियों की कीमत 350, फलों की 95, दालों की 123, गेहूं की 137, चावल की 117, दूध की 119, चीनी की 106 तथा नमक की 85 प्रतिशत बढ़ गई। 80 से 100 रुपए प्रति किलो की दर पर प्याज खरीदने वाली जनता के दर्द को हाल ही में कराए गए चुनावी सर्वेक्षण से भी समझा जा सकता है। आगामी पांच विधानसभा चुनाव परिणामों का पूर्वानुमान लगाने के लिए अखबारों और टीवी चैनलों द्वारा कराए गए सभी सर्वेक्षणों में कांग्रेस के सफाए का स्पष्ट संकेत मिलता है। यह भी पता चलता है कि आगामी चुनावों में महंगाई सबसे बड़ा मुद्दा होगी। आम जनता शासक वर्ग के सात खून माफ कर सकती है, लेकिन जब कोई सरकार उसके पेट पर लात मारे तो उसका बचना असंभव होता है। गरीबों की थाली से रोटी छीनकर कांग्रेस उनकी खुशहाली का झूठा दावा करने का पाप कर रही है, ऐसे में उसका पतन तय है। यह बात अब खुद कांग्रेस के आला नेता स्वीकार करने लगे हैं। हाल ही में पार्टी ने एक आंतरिक सर्वे कराया, जिसमें उसे अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों में लगभग 110 सीटें मिलने की बात की गई है। इस सर्वे से हड़कंप मचा हुआ है।

आज महंगाई का आलम यह है कि गली-मोहल्लों में फेरी लगाने वालों ने सब्जी के भाव, किलो में नहीं बल्कि पाव में बताने शुरू कर दिए हैं। जब नौ साल में प्याज 521 फीसदी, आलू 185 फीसदी, बैंगन 311 फीसदी, बंद गोभी 714 फीसदी तथा टमाटर 134 फीसदी महंगा हो जाए तो जनता के लिए एक किलो सब्जी खरीदना भी ऐय्याशी बन जाती है और यह ऐय्याशी करने की हिम्मत तो अब मध्यम वर्ग भी नहीं जुटा पा रहा है। आलू-प्याज जैसी जरूरी चीजें गरीबों के लिए सपना बन गई हैं। अच्छे मानसून और दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा सब्जी उत्पादक देश होने के बावजूद, इस महंगाई का कारण समझ से परे है। कीमत कम करने के लिए कदम उठाने के बजाए संप्रग सरकार के मंत्री जले पर नमक छिड़कने का काम कर रहे हैं। बकौल कृषि मंत्री प्याज के आसमान छूते भाव से किसानों को लाभ मिल रहा है। दूसरी तरफ केंद्र सरकार के प्रवक्ता दावा करते हैं कि प्याज की मूल्य वृद्धि जमाखोरों की कारस्तानी है।

महंगाई अब खतरनाक मुकाम पर पहुंच चुकी है। दाल-सब्जी जैसी जरूरी चीज गरीब की थाली से गायब होती जा रही है। गरीबों के लिए प्रोटीन का सबसे बड़ा जरिया दाल है और जब यही नसीब नहीं होगी तो उन्हें कुपोषण की चपेट में आने से कौन बचा सकता है? हमारे देश में कुपोषण के शिकार बच्चों की संख्या दुनिया में सबसे ज्यादा है। जिस रफ्तार से महंगाई दौड़ रही है, उसे देखकर यह बात दावे से कही जा सकती है कि निकट भविष्य में उन पर काबू पाना कठिन है। आज महंगाई मध्यम वर्ग को भी कंगाली की ओर धकेल रही है। ऐसे में कांग्रेस के नेताओं का पांच रुपए में भोजन की थाली मिलने का दावा जन-आक्रोश को और हवा देता है।

नेशनल सेम्पल सर्वे की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, खाने-पीने की चीजों की कीमत शहरों के मुकाबले गांवों में कहीं ज्यादा है। देश की अधिकांश आबादी आज भी गांवों में रहती है। ऐसे में उसकी बदहाली का अनुमान सहज लगाया जा सकता है। ऊपर से तुर्रा यह है कि सरकार गांव में रहने वाले करोड़ों किसानों-मजदूरों के जीवन-यापन के लिए महज 27 रुपए प्रतिदिन काफी बताती है। खाद्य सुरक्षा कानून का ढिंढोरा पीटने वाला शासक वर्ग भूल जाता है कि जिंदा रहने के लिए गेहूं-चावल ही काफी नहीं है। रोटी और चावल के साथ दाल-सब्जी भी जरूरी है और दाल-सब्जी खरीदना आज सबके बस की बात नहीं रही।

आर्थिक सुधार के नाम पर हमारी सरकारें 1991 से खुली अर्थव्यवस्था की डगर पर चल रही हैं। उसके बाद से ही गरीब-अमीर के बीच की खाई निरंतर चौड़ी होती जा रही है। तेज आर्थिक विकास की अंधी दौड़ में सरकार ने मुद्रास्फीति पर काबू में रखने की अनदेखी की है। नतीजा सामने है। खाद्य मूल्य सूचकांक लगातार दो अंक की गिरफ्त में चल रहा है। कमजोर सप्लाई चेन और खाद्यान्न में वायदा कारोबार के कारण खाने-पीने की चीजों की कीमत आसमान पर है। बढ़ती बेरोजगारी, कोढ़ में खाज का काम कर रही है। शेयर बाजार गिरने से तो सरकार की पेशानी पर निशान आ जाते हैं, लेकिन दाल-सब्जी, आटा-चावल, चीनी के दाम बेतहाशा बढऩे पर उसे कोई फिक्र नहीं होती।

अर्थशास्त्र का सिद्धांत सिखाता है कि यदि महंगाई सालाना पांच फीसदी की दर से बढ़ रही है तो 25 साल में कीमतें 240 प्रतिशत ऊंची हो जाती हैं। संप्रग सरकार के नौ बरस के शासन में खाद्य पदार्थों का मूल्य 157 प्रतिशत बढ़ चुका है। उल्लेखनीय है कि यह आंकड़ा थोक मूल्य का है। इस सच से सभी वाकिफ हैं कि खुदरा बाजार में सब्जी, फल, दूध जैसी जल्दी खराब होने वाली चीजों की कीमत दो से तीन गुना ज्यादा होती है। ऐसे में आम आदमी की पीड़ा का अंदाज लगाया जा सकता है। फिर भी शासक वर्ग कोई कारगर कदम नहीं उठा रहा तो इसे उसकी असंवेदनशीलता ही कहा जाएगा।

अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी और जापान जैसे विकसित देशों में आम आदमी की माली हालत हमारे देश से कहीं बेहतर है। फिर भी वहां महंगाई का आंकड़ा पांच फीसदी से नीचे है। हमारे देश में मुद्रास्फीति की दर कहीं ऊंची है और जनता की कमाई सीमित। ऐसे में उस पर महंगाई की गहरी मार का अंदाजा लगाने के लिए रॉकेट विज्ञान का ज्ञान जरूरी नहीं है। सरकार की नीयत मंा खोट है, नहीं तो पर्याप्त सप्लाई के बाद भी खाद्य पदार्थ महंगे होने का क्या कारण हो सकता है? सरकार समर्थक कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि देश में आम आदमी की आमदनी बढ़ी है। इसी कारण खाद्य पदार्थों की मांग में खासा वृद्धि हुई है। भाव भी इस वजह से बढ़े हैं। वे सफेद झूठ बोलते हैं। सरकार के अनुसार, आज भी भारत की एक चौथाई जनता कंगाल है। कंगाल आबादी पर खाद्य पदार्थों का मूल्य बढ़ाने का आरोप तो कोई मूर्ख भी नहीं लगा सकता। महंगाई के अभिशाप से मुक्ति पाने को आज आम जनता छटपटा रही है। विपक्षी दलों की ओर वह आशा भरी नजरों से देख रही है। आशा है सत्ता परिवर्तन के बाद जनता को आसमान छूती महंगाई से मुक्ति मिल जाएगी।

धर्मेंद्रपाल सिंह

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