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अन्तिम व्यक्ति का विकास ही देश की समृद्धि

आम आदमी की आमदनी न बढऩे से औद्योगिक उत्पादों की मांग घटने लगी है और औद्योगिक उत्पादन पिछले डेढ़ वर्षों में थम-सा गया है। जरूरी है कि गरीबों की आमदनी में सुधार हो, कॉरपोरेट मुनाफों पर लगाम लगे और मजदूरों की मजदूरी बढ़े। सभी प्रकार के वेतनों को महंगाई के साथ जोड़ा जाए। प्रोपर्टी की कीमतों को थामा जाए।
संयुक्त राष्ट्र के एक संगठन ‘अंकटाड’ ने अपनी हालिया रिपोर्ट में चिंता व्यक्त की है कि दुनिया में आर्थिक समृद्धि थम-सी गई है। भारत, चीन, ब्राजील समेत लगभी सभी विकासशील देशों की विकास दर पिछले 4-5 साल में लगभग आधी रह गई है। गौरतलब है कि चीन की जीडीपी पिछले डेढ़ दशक से लगभग 14-15 प्रतिशत की दर से बढ़ रही थी, जो अब घटकर 7-8 प्रतिशत ही रह गई है। भारत की प्रगति 2002-2012 के बीच औसत लगभग 8 प्रतिशत की दर से बढ़ रही थी, अब घटकर 5 प्रतिशत पर सिमट गई है। ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और अन्य देशों के हालात भी अच्छे नहीं है। विकास दर की इस गिरावट में सबसे ज्यादा नुकसान उत्पादन क्षेत्र को हुआ है। भारत में उत्पादन क्षेत्र की वृद्धि दर 2010-11 में 8.2 प्रतिशत से घटकर पिछले साल मात्र 1.1 प्रतिशत पर सिमट गई। गौरतलब है कि यह वृद्धि दर 2002-2012 के दौरान औसत 8 प्रतिशत रही। उत्पादन क्षेत्र में वृद्धि सभी उत्पादों में थी, लेकिन कार, मोटरसाइकिल, एयर कंडीशनर, इलेक्ट्रॉनिक्स इत्यादि में यह वृद्धि 15 प्रतिशत के आसपास थी।

भारत ही नहीं अन्य देश जैसे चीन में उत्पादन क्षेत्र में वृद्धि 2000-2011 के दौरान विभिन्न वर्षों में 9 प्रतिशत से 30 प्रतिशत तक रिकार्ड की गई। ब्राजील में भी उत्पादन क्षेत्र में वृद्धि अब सिमट कर 1 प्रतिशत से भी कम हो गई है। लेकिन अब इन देशों में उत्पादन क्षेत्र की वृद्धि पहले सरीखी नहीं है, बल्कि कई बार तो गिरावट होने लगी है।

‘अंकटाड’ की चिंता और समाधान
विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं में प्रगति थमने को ‘अंकटाड’ ने रेखांकित करते हुए इस पर चिंता व्यक्त की है। गौरतलब है कि विकासशील देश में प्रति व्यक्ति आय विकसित देशों से कम है। ऐसे में विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं में आई इस मंदी के कारण इन देशों की जनता की जीवन स्तर सुधारने की अकांक्षाओं पर आघात होगा। विकसित और विकासशील देशों के बीच गैर-बराबरी को दूर करने के लिए पहली शर्त यह है कि ये देश तेजी से तरक्की करें।

हालांकि भारत समेत विकासशील देशों की सरकारें इस मंदी के लिए अंतरराष्ट्रीय कारणों को दोष दे रही हैं, लेकिन ‘अंकटाड’ का विश्लेषण इस संदर्भ में अलग है। अंकटाड का कहना है कि मजदूरों की लगातार घटती वास्तविक मजदूरी के कारण विकासशील देशों में मांग नहीं बढ़ रही है। दूसरी ओर ऐसे क्षेत्र जिनको कर्ज की जरूरत होती है, उन तक कर्ज की पहुंच नहीं है, जिसके चलते उनका विकास बाधित हो रहा है। ‘अंकटाड’ के अनुसार घटती वृद्धि को थामने के लिए जरूरी है कि केंद्रीय बैंक (जैसे भारत में रिजर्व बैंक) ऐसी नीतियां अपनाएं जिससे जरूरी कर्ज जरूरतमंदों को मिल सके। दूसरी ओर इन देशों की सरकारें ऐसी नीति अपनाएं ताकि मजदूरी दर बढ़ सके। मांग बढ़ाकर ही इन देशों में वृद्धि दर बढ़ाई जा सकती है, विकासशील देशों के बीच व्यापार भी बढ़ सकता है।

असमानताएं भी हैं मंदी का कारण
हम देखते हैं कि पिछले दो वर्षों में औद्योगिक वृद्धि दर घटने का प्रमुख कारण मांग का घटना है। मांग इसलिए घट रही है कि अधिसंख्य लोगों की आमदनी आनुपातिक रूप से नहीं बढ़ पा रही है। ध्यान से देखें तो पाते हैं कि कृषि में लगे लोगों की संख्या में कोई विशेष कमी नहीं हुई है, जीडीपी में कृषि का योगदान लगातार घटता जा रहा है। जहां वर्ष 2000 में कृषि का कुल जीडीपी में योगदान 25 प्रतिशत से अधिक था, वह अब घटकर मात्र 14 प्रतिशत ही रह गया है। शहरी और ग्रामीण औसत प्रति व्यक्ति उपभोग का अनुपात जो 1993 में 1.62 प्रतिशत था, वह 2009-10 में 1.96 हो गया। उधर, औद्योगिक क्षेत्र का योगदान कोई खास नहीं बढ़ा लेकिन सेवा क्षेत्र का योगदान 50 प्रतिशत से बढ़ता हुआ अब लगभग 60 प्रतिशत पहुंच चुका है। गौरतलब है कि कुल जनसंख्या का मात्र 25 प्रतिशत ही सेवा क्षेत्र में लगा हुआ है। इससे यह नहीं समझना चाहिए कि सेवा क्षेत्र में संलग्न सभी लोगों की आमदनी इस अनुपात में बढ़ गई है। वास्तव में सेवा क्षेत्र में लगे अधिकतर कार्मिक जैसे- होटल, रेस्टोरेंट, खुदरा दुकानों, ट्रांसपोर्ट इत्यादि सभी क्षेत्रों में लगे अधिसंख्य सामान्य कर्मचारी एवं मजदूर निहायत ही कम वेतन पर काम करने के लिए मजबूर हैं। सेवा क्षेत्र में लगे मात्र 10 प्रतिशत लोग ही अच्छी आमदनी पाते हैं। कहा जा सकता है कि जहां बहुसंख्यक कामगार अत्यंत निम्न स्तर पर गुजारा करते हैं, कुछ चुनिंदा लोग ही सेवा क्षेत्र में होने वाली आर्थिक वृद्धि का लाभ उठा रहे हैं।

  1. आंकड़े बताते हैं कि 1990 के दशक के प्रारंभ में मजदूरी का भाग जो 40 प्रतिशत था, 2010 तक घटकर मात्र 34 प्रतिशत ही रह गया। शहरों में 1993-94 में जनसंख्या के ऊपर के 10 प्रतिशत लोग नीचे के 10 प्रतिशत लोगों से 10.5 गुना उपभोग करते थे, और अब 14.5 गुना से ज्यादा उपभोग करते हैं। गांवों में यह अंतर 7 गुना से बढ़कर 10 गुना पहुंच गया। सरकारी परिभाषा के अनुसार गरीबी रेखा से नीचे शहरों में 1000 रुपए और गांवों में 810 रुपए की मासिक आय के कम पाने वाले करोड़ों लोग हैं।

    तमाम आर्थिक वृद्धि के बावजूद लोग गुरबत में जीने के लिए मजबूर हैं, यह भविष्य की आर्थिक वृद्धि पर भी ‘ब्रेक’ लगा रहा है। जनसंख्या के ऊपरी मात्र 5 प्रतिशत से भी कम लोग जैसे- पूंजीपति, सरकारी अफसर, उच्च शिक्षा प्राप्त नौकरीपेशा लोग कुछ भ्रष्ट राजनेता तो इस आर्थिक वृद्धि से लाभान्वित हुए हैं, लेकिन बहुसंख्यक लोग इसके लाभ से वंचित हैं। उनके पास मोबाइल फोन तो आया है, लेकिन उसे रिचार्च करने के पैसे नहीं हैं। ताजा आंकड़ों के अनुसार मोबाइल फोनधारकों की संख्या जून 2012 में 93.4 करोड़ थी, उनमें से 25 प्रतिशत (यानी 24 करोड़) से अधिक लोगों के मोबाइल निष्क्रिय हैं।

    आम आदमी की आमदनी न बढऩे से औद्योगिक उत्पादों की मांग घटने लगी है और औद्योगिक उत्पादन पिछले डेढ़ वर्षों में थम-सा गया है। घरों की मांग भी घटने लगी है। पहले से लिए गए कर्जों पर ईएमआई बढऩे से मध्यम वर्ग दबाव में है। जरूरी है कि आर्थिक वृद्धि के लाभ बराबरी से बंटे। गरीब लोगों की आमदनी में सुधार हो। पूंजीपति के लाभों पर लगाम लगे और मजदूरों की मजदूरी बढ़े। सभी प्रकार के वेतनों को महंगाई के साथ जोड़ा जाए। प्रोपर्टी की कीमतों को थामा जाए। ऐसा न किया गया तो हो सकता है हम फिर से 3-4 प्रतिशत की आर्थिक वृद्धि की ओर मुड़ जाएं।

     

    डॉ. अश्विनी महाजन

    (लेखक पीजीडीएवी कॉलेज, दिल्ली वि.वि., में एसोसिएट प्रोफेसर हैं)

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