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देश का अनर्थ ना करें

लगता है जैसे भारतीय अर्थव्यवस्था लडख़ड़ा रही है। बात चाहे खाद्य सामग्री की हो, पेट्रोलियम उत्पादों की या दूसरी चीजों की, यूपीए सरकार की राजनीति ने आम आदमी को हाशिए पर धकेल दिया है। रुपया तो हाल ही में अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया था। ध्यान देने वाली बात तो यह है कि मई से सितंबर 2013 के बीच रुपए की कीमत 22 प्रतिशत गिर गई थी। सितंबर के मध्य में यह 63 रुपए प्रति डॉलर था। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) जो करीब 9 प्रतिशत होनी चाहिए थी, डर है कि वह वर्तमान वित्त वर्ष में गिरकर 5 प्रतिशत से नीचे न चली जाए। इसके अलवा यह भी किसी से छिपा नहीं है कि खेती, औद्योगिक उत्पादन और सेवा क्षेत्र में आई गिरावट से सब कुछ अस्त-व्यस्त हो गया है। भारतीय आर्थिक सलाहकार परिषद के प्रमुख प्रकाशन ‘इकॉनॉमिक आउटलुक 2013-14’ के अनुसार, भारतीय अर्थव्यवस्था 5.3 प्रतिशत की दर से वृद्धि करेगी, जो कि पहले से अनुमानित 6.4 प्रतिशत से बहुत कम है। हालांकि लगभग सभी गैर-सरकारी आर्थिक जानकारों का अनुमान है कि यह विकास दर तो और भी कम, 4 से 4.9 प्रतिशत के बीच होने जा रही है, क्योंकि चुनाव मई 2014 से पहले होने जा रहे हैं।

सरकार का पूरा ध्यान लोक-लुभावन मुद्दों पर केंद्रित होता जा रहा है। संसद के पिछले सत्र में पारित खाद्य सुरक्षा अधिनियम राजस्व पर दबाव डालेगा। दरअसल खाद्य सुरक्षा अधिनियम को लेकर सरकार का तर्क है कि यह अर्थव्वस्था को फिर से पुनर्जीवित कर देगा, जैसे कि जापान में हुआ था। जहां अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने के लिए पुल बना दिए गए थे, लेकिन ये पुल कहीं पहुंचे नहीं। जैसा कि अनुमान था, इस काम ने अर्थव्यवस्था को सुधारने में कोई मदद नहीं की, उल्टे हालात और बिगड़ गए। हाल के बाजार की स्थिति यह है कि निवेशकों की भावनाओं का खयाल रखे बिना उठाए गए इस तरह के कदमों से रुपए पर अवमूल्यन का और दबाव पड़ेगा, मंहगाई बढ़ेगी और वित्तीय घाटा भी बढ़ेगा। पिछले सत्र में ही पारित ‘भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास अधिनियम’ ढ़ांचागत विकास के रास्ते की बाधा ही बनेगा। जानकारों को आशंका है कि ऐसे हर भूमि अधिग्रहण के मामले में, जहां सरकार मध्यस्थ रही है, प्रशासनिक समीक्षा के चलते नए औद्योगिक प्रतिष्ठानों को स्थापित करने में देर लगेगी। इस तरह वर्तमान आर्थिक गिरावट अगले बीस सालों में निम्नतम स्तर पर पहुंच जाएगी। यह घाटे का प्रदर्शन भारत की घरेलू राजनीति और वैश्विक सामरिक लक्ष्यों के संदर्भ में बोझ को और बढ़ाएगा।

भारत की अर्थव्यवस्था के अर्श से गिरने की कहानी अब तक आम हो चुकी है। कृषि आधारित अर्थव्यवस्था होने के बावजूद पिछले साठ सालों में सकल घरेलू उत्पादन में कृषि क्षेत्र का योगदान लगातार कम होता चला गया है। 1951 में यह जहां 42 प्रतिशत होता था, 2011 में यह 11 प्रतिशत रह गया है। पिछले दो दशकों के दौरान कृषि क्षेत्र में प्रति व्यक्ति औसत वार्षिक वृद्धि एक प्रतिशत रह गई है। मैं आंकड़ों और क्षेत्रों के ज्यादा विस्तार में नहीं जाना चाहता, जहां अर्थव्यवस्था गिरी या चढ़ी है। यह शिकायत मुझे जरूर है कि ‘आम आदमी’ बेचारा आजादी के बाद से एक के बाद दूसरी खोटी सरकार के जाल में फंसता हुआ भुगत रहा है।

चीन के साथ सामरिक प्रतियोगिता की ही बात करें तो भारत की आर्थिक मंदी इसके सामरिक लक्ष्यों को भी पीछे ले आएगी। अर्थव्यवस्था के तेजी के सालों में भी भारत की गति चीन के मुकाबले धीमी ही रही है। और हाल की आर्थिक गिरावट के समय चीन में भी कुछ गिरावट नजर आई है। जो भी हो, भारत के सुस्त आर्थिक प्रदर्शन को देखते हुए वह समय अभी दूर है, जब भारत की अर्थव्यवस्था चीन का मुकाबला करेगी। दक्षिण-पूर्व और पूर्वी एशिया में आर्थिक सहयोग बने हुए हैं और भारत के लिए सौभाग्य की बात है कि चुनाव पूर्व के विचलनों के आने से पहले ही इन देशों के साथ किए गए व्यापार समझौतों को पूरा कर लिया है। लेकिन, ऐसा लगता है कि सरकार में देश को आर्थिक गौरव के शिखर तक ले जाने की इच्छाशक्ति ही नहीं है। जब देश वर्तमान सरकार की गलत आर्थिक नीतियों के कारण संकट के दौर से गुजर रहा है, भारत की घायल अर्थव्यवस्था पर मरहम लगाने के बजाय सरकार किंकर्तव्यविमूढ़ है। कम से कम यह उम्मीद तो की जा सकती है कि सरकार ढांचागत सुधारों के जरिए विकास की चुनौतियों को पूरा करने की कोशिश करेगी। लेकिन ऐसा लगता है कि सरकार को समझ में ही नहीं आ रहा है कि वह कर क्या रही है।

एक तरफ तो वह खर्चों को घटाने की बात करती है, तो दूसरी तरफ लोकप्रिय वरीयताओं को अपनाकर खर्चों को और बढ़ा रही है। कम से कम सरकार को कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए था, लेकिन इस दिशा में कुछ भी नहीं किया गया। बढ़ती महंगाई के कारण आम आदमी सड़कों पर चिल्ला रहा है, लेकिन चिदंबरम इस दिशा में कोई नीतिगत प्रयास करते नजर नहीं आ रहे हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के अनुसार, वित्तमंत्री ने घाटे को कम करके और विकासपरक तरीकों को अपनाकर प्रशंसनीय काम किया है। अगर भारत 8 प्रतिशत की विकास दर हासिल करने में सफल होता है, तो यह भारत के लोगों की जीत होगी, खासकर युवावर्ग की। इन लोगों को भी रोजगार के अवसरों की सख्त जरूरत है। जैसे… गीता में भी लिखा है कि मुझे यूपीए तमोगुण में डूबी नजर आती है, जो अपने भ्रामक अज्ञान के शिखर पर है। उस बेचैन तितली की तरह उसका शरीर और दिमाग किसी आक्रोश में है, लेकिन उसमें ऐसी बुद्धि की कमी है, जो उसे किसी निश्चय की ओर ले जाए और वह रचनात्मक काम की ओर प्रवृत्त हो सके। उसकी चंचलवृत्ति कभी उसे एक दिशा में ले जाती है, तो कभी दूसरी दिशा में। यूपीए कुछ इस तरह व्यवहार कर रही है, जैसे उसमें विनम्रता है ही नहीं। ‘आम आदमी’ के प्रति वह अकारण ही रूखी और बदमिजाज है लगती है। वर्तमान हालात के बावजूद लडख़ड़ाती अर्थव्यवस्था को संभालने और सुधारने की जादूई छड़ी नीति निर्धारकों के हाथों में ही है। वास्तव में भारत में राजनीतिक सत्ता के दावेदारों को यह सोचने की जरूरत है कि ऐसा क्या करें कि भारतीय अर्थव्यवस्था फिर से गुनगुनाने लगे।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

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