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आत्मान्वेषी होने की ललक

कलम हुए हाथ, शिक्षाकाल और पालनहारे जैसी बेजोड़ कहानियों से हिंदी कथा साहित्य को समृद्ध करने वाले बलराम अरसे तक मौन रहने के बाद पुन: मुखर हुए हैं, बाहर से भीतर की ओर खिलती मुखरता लिए। भूख, दरिद्रता, शोषण और अशिक्षा जैसी विकट सामाजिक समस्याओं से जूझते, अपने अस्तित्व के लिए आर-पार की मर्मांतक लड़ाई लड़ते लोगों के सुख-दुख, पीड़ा और संकटों को मात्र साक्षी की तरह नहीं, उनमें एक होकर जीते हुए जन-जीवन को कलमबद्ध करते रहे हैं बलराम। पहले कहानी संग्रह ‘कलम हुए हाथ’ के बाद बरसों तक उनका मौन शायद इसलिए भी रहा कि वह अपने अनुभवों के सान्निध्य में अकेले रह सकें, उनका होकर। उनका पुनर्सृजन तभी करें, जब उसे रचना में रूपांतरित होने की उसकी व्याकुलता अपने चरम पर पहुंच जाए। बलराम के बरसों के तप का ही फल है उनका दूसरा संग्रह ‘गोआ में तुम’। स्थूल से सूक्ष्म की ओर उनका यह विकास अनुभव के आंतरिक उत्कर्ष को पाने के लिए ही हुआ लगता है यानी अपने सामाजिक सरोकारों के प्रति चेतस रहते हुए भी मनुष्य की नियति से जुड़े सरोकारों की ओर उन्मुख। इस सबके खामोश और प्रच्छन्न सूत्र ‘गोआ में तुम’ की कहानियों में जहां-तहां बिखरे पड़े हैं। चीजों को बाह्यï दृष्टिï से जांचने-परखने के बाद अब वह अपनी अंतर्दृष्टिï से चीजों की विलक्षणता और अबूझता को विश्लेषित करने की ओर अग्रसर हैं, आत्मान्वेषी होने की गहरी ललक के साथ।

बलराम की ‘गोआ में तुम’ कहानी किसी एक के जीवन में न होने या न रहने के तनाव या आंतरिक द्वंद्व से उत्पन्न स्थिति की कहानी है। असल में यथार्थ की कठोर, शुष्क और खुरदरी बीहड़ता से गुजरने और सृजित करने के उपरान्त तरलता की ओर बलराम का यह विकास बहुत स्वाभाविक है। ऐसा बहुत से सृजनधर्मियों के साथ होता है। तरलता से अभिप्राय अनुभवों का डायलूशन या पतला पडऩा नहीं, अपितु उस नदी की तरह होता है, जो पहाड़ों से निकलकर अनेक बाधाओं से टकराती, कई मोड़ मुड़ती ज्यों-ज्यों मैदानी इलाकों में प्रविष्टï होती है, त्यों-त्यों शांत, गंभीर और गहरी होती चली जाती है। एक लेखक भी अपने लेखन में सिर्फ उत्कर्ष (हाइटïस) को ही प्राप्त नहीं करना चाहता, वह गहरा भी होना चाहता है और खुद को विस्तार देने के लिए उत्सुक भी। ‘गोआ में तुम’ की कई कहानियां इसी लक्षित तक पहुंचने की आत्मसंपन्न कोशिश करती हैं। किसी भारी-भरकम या ओढ़ी हुई शब्दावली के माध्यम से नहीं, बल्कि सहज, सरल और बोधगम्य भाषा के माध्यम से। शिल्प के प्रति किसी अतिरिक्त आग्रह के बिना। संग्रह की कई कहानियां लघु होते हुए भी रिश्तों के कालातीत सच को उदïघाटित करती हैं, निस्संगता और गहरी संपृक्ति के साथ।

‘गोआ में तुम’ संग्रह की अत्यंत साफ-सुथरी और खूबसूरत कहानी है ‘शुभ दिन’। मामूली-सी चीजों में सुख और तसल्ली पा लेने की अजब-गजब और गहरे तक छू लेने वाली कहानी है ‘शुभ दिन’। और बदलते जीवन-मूल्यों की कहानी है ‘फर्क’। इन्हें ‘अर्थी’ के प्रतीक के माध्यम से बखूबी उदïï्घाटित किया गया है। ‘ठहरो मत’ कहानी हर पल को ऐसे जीने की बात कहती है, जैसे उस पल के न पीछे कुछ हो, न आगे और वह पल अपने आपमें संपूर्ण हो। उस संपूर्णता को ही अपनी संपूर्णता बना लो। ‘गोआ में तुम’ संग्रह की कुछ कहानियां बड़े हल्के-फुल्के अंदाज में लिखी गई हैं, लेकिन विट और ह्यïमर पगी हुई, जिन्हें पढ़कर हम कुछ समय के लिए ही सही, अपनी रोजमर्रा की चिंताओं और खिचखिच से बाहर आकर कहानियों के पात्रों के साथ मलिनता से परे एक तरह की मुक्ति के एहसास को जी लेते हैं। पैटर्निटी लीव, ग्रेट आइडिया, इतना खटराग आदि रचनाएं इस बात को पुष्टï करती हैं। अंत में दिए गए लंबे आलेख ‘चित्र-चरित्र जरूरी’ में लगभग सभी पीढिय़ों के प्रमुख कथाकारों की रचनाधर्मिता पर सारगर्भित टिप्पणियां हैं, जो आलोचक बलराम की कथा साहित्य की गहरी समझ की परिचायक हैं।

 

केशव

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