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केरल के गांव में भई जुड़वन की भीड़

विश्व में जुड़वा बच्चों के जन्म का औसत प्रति 1,000 में 6 का है, और भारत में भी जुड़वा बच्चों का अनुपात काफी कम है पर कोदिनही में जुड़वा बच्चों के जन्म का अनुपात प्रति 1,000 में 42 है। यह विश्व औसत से 700 प्रतिशत अधिक है। उसकी इस विचित्रता ने दुनिया भर में दिलचस्पी पैदा की है और कई तरह के शोध चल रहे हैं।
केरल के मल्लपुरम जिले में महज 2,000 की आबादी वाले मुस्लिम बहुल कोदिनही गांव का नाम कम ही लोगों ने सुना होगा। लेकिन आज यह जुड़वा भाई-बहनों के सर्वाधिक औसत के लिए विश्व के नक्शे में अहम स्थान हासिल कर रहा है। यहां जुड़वा भाई-बहनों के 310 जोड़े हैं। इस विचित्रता ने इसे ऐसा गांव बना दिया है, जहां जुड़वां बच्चों का प्रतिशत विश्व भर में सबसे ऊंचा है। कोदिनही के जुड़वां और कुटुम्बी संघ टाका ‘ट्विन्स ऐंड किन्स एसोसिएशन’ ने इस वर्ष के आरंभ में घर-घर जाकर सर्वेक्षण किया, तो पता चला कि गांव में इस समय 290 जुड़वां जोड़े हैं। शेष ने गांव से बाहर शादी कर ली है, या गांव छोड़कर कहीं और चले गए हैं। आश्चर्य की बात यह है कि जिन स्त्रियों की शादी इस गांव से दूर कहीं और हुई है, उन्होंने भी वहां जुड़वां बच्चों को जन्म दिया। जिन बाहरी स्त्रियों ने गांव के युवकों से विवाह किया, उन्होंने भी जुड़वां बच्चों को जन्म दिया।

विश्व में जुड़वा बच्चों का औसत प्रति 1,000 में 6 का है। पर इस गांव में यह अनुपात प्रति 1,000 बच्चों में 42 का है। यह विश्व अनुपात से 700 प्रतिशत अधिक है। हालांकि भारत में जुड़वा बच्चों के जन्म की दर सबसे कम है लेकिन कोदिनही गांव का कीर्तिमान विश्व में सबसे ऊंचा है।

गांव का चक्कर लगाने पर लगभग हर परिवार में जुड़वा भाई-बहन नजर आएंगे। कई बार यह भ्रम होने लगता है कि कहीं आपकी आंखें गड़बड़ा तो नहीं गई हैं कि हर चीज दोहरी दिख रही हो। स्कूल, बाजार, दुकान और दफ्तरों में हर तरफ जुड़वां ही जुड़वां दिखाई देते हैं। नौजवान, बूढ़े और मध्यवय के एक से चेहरे वाले लोग हर जगह नजर आ जाते हैं। आधा दर्जन मामले तो तीन बच्चों के एक साथ जन्म के भी हैं।

यहां 2012 में ही 17 जुड़वों का जन्म हुआ। इस गांव में यह विचित्र परिघटना पिछले 60-70 सालों से जारी है। डॉक्टरों ने कोदिनही के रहस्य को सुलझाने की बहुत कोशिश की, पर सिर खुजाते रह गए। उन्होंने जुड़वां बच्चों के गर्भाधान के समय तक का उत्पत्ति संबंधी जैविक, आणविक, आनुवंशिक कारणों और जलवायु तक का अध्ययन किया।

कुछ देशों में जुड़वां बच्चों को सम्मान के साथ देखा जाता है, तो कुछ देशों में संदेह के साथ। हालांकि कोदिनही गांव में ऐसा कुछ असामान्य नहीं है जिससे कोई नतीजा निकाला जा सके। ग्रामीणों का खानपान सामान्य है। गांव में किसी रसायन की अधिकता या प्रदूषण भी नहीं है। आसपास के गांवों और कस्बों की भी आबादी और भू-भाग एक जैसा ही है लेकिन किसी अन्य गांव में जुड़वां बच्चों की ऐसी भरमार नहीं है।

शोधकर्ता जुड़वां बच्चों के जन्म दर में इस वृद्धि के कारण खोजने में लगे हैं। उनका मानना है कि यहां के वातावरण में ऐसा कुछ है, जो जुड़वां बच्चों की अधिकता के लिए उत्तरदायी है। स्थानीय लोगों का कहना है कि इसका कारण यहां की जलीय स्थिति में छिपा है। कोदिनही गांवों के खेतों में चारों तरफ पानी भरा रहता है। मानसून में भारी वर्षा के कारण यहां आना-जाना असंभव हो जाता है।

हैदराबाद स्थित सेलूलर और आणविक जीवविज्ञान केंद्र के निदेशक डॉ. लालजी सिंह कहते हैं, ‘यह गांव जेनेटिक सोने की खान के समान है।’ गांव की विचित्रता को समझने के लिए केंद्र के एक दल ने गांव के जुड़वां बच्चों और उनके माता-पिता के रक्त के नमूने एकत्रित किए, लेकिन इस दल को अभी तक कारण का पता नहीं चला है। हो सकता है पर्यावरण, भोजन और जीने की परिस्थितियों में इसका कारण छिपा हो। अन्य कारण – यहां भारी संख्या में सगोत्रीय और गांव में अंतर्विवाह का प्रचलन हो सकता है। यदि किसी परिवार में जन्म बहुलता का इतिहास होता है, तो यह प्रवृत्ति एक पीढ़ी से दूसरे पीढ़ी तक जारी है।

वैज्ञानिकों ने गांव की मिट्टी और पानी के नमूने भी लिए, पर उन्हें कुछ भी असाधारण या असामान्य नहीं मिला। जुड़वां बच्चों के रहस्य को जानने के लिए गांव के पशुओं तक का दस्तावेजीकरण किया गया है।

कोदिनही में जुड़वां बच्चों को ईश्वर की विशेष देन और सौभाग्यसूचक माना जाता है। उन्हें प्रेम और स्नेह के साथ पाला जाता है। उनके जन्म को लोग शुभ मानते हैं। माना जाता है कि जुड़वां बच्चों में दैवी शक्तियों का वास है। उन्हें दुख देने वालों को वे हानि पहुंचा सकते हैं।

कोदिनही में जुड़वां बच्चों की बाढ़ ने दुनिया भर में दिलचस्पी पैदा की है। 2010 में नेशनल ज्योग्राफिक के दल ने दौरा करके इस विचित्र गांव का अध्ययन और दस्तावेजीकरण किया। दल ने एक घंटे की फिल्म भी बनाई, जिसका शीषर्क है – ‘जुड़वां नगर’।

लगभग हर दूसरे घर में जुड़वां होने से गांव में अक्सर रोचक घटनाएं हो जाती हैं। जुड़वां लोगों से जुड़े हंसी-मजाक के कारण गांव में उबाऊ वातावरण नहीं है। अनेक घटनाएं ऐसी हैं, जब मां ने एक ही बच्चे को बार-बार दूध पिला दिया, पर वह यह समझती रही कि उसने अपने दोनों बच्चों को दुग्धपान करा दिया है। जबकि एक ने भूख से अधिक पेट भर लिया और दूसरा भूख से बिलखता रह गया। स्कूलों में ऐसी रोचक घटनाएं होती हंै, जब शिक्षक को यह पहचान करना कठिन हो जाता है कि जुड़वा भाइयों में किसका नाम क्या है? अपराध राजू ने किया और दंड उसके भाई को मिल गया। गांव वालों के सामने भी ऐसी समस्याएं रोज खड़ी होती हैं। इस बारे में अनेक चुटकुले और मजाक प्रचलित हैं कि शादी के बाद नवविवाहिता ने वर के भाई को गलती से अपना स्वामी समझ लिया। इस परेशानी से बचने के लिए स्त्रियां अपने पति से कहती हैं कि वह खास तरह के कपड़े पहनें, जिससे धोखा न हो और वह पति के बजाय अपने देवर – जेठ पर प्रेम न उड़ेल दे।

गांव के स्कूलों में शिक्षकों को एक एक करके छात्रों के नाम याद करने पड़ते हैं, क्योंकि 20 जुड़वां जोड़ों का एक ही लिंग है और चेहरा भी एक जैसा है। बच्चों को नाम लेकर बुलाने में शिक्षकों में अक्सर गलती हो जाती है। दो बहनों या दो भाइयों को वह अलग तरीके से बाल काढऩे को कहते हैं, ताकि दोनों अलग पहचाने जा सकें।

गांव में 68 वर्षीय पठुम्मकुट्टी और कुन्हिपाथुट्टी सबसे बुजुर्ग जुड़वां हैं। गांव के रिवाज के अनुसार दोनों के नाम भी एक ही हैं। औसत की दृष्टि से विश्व की सबसे

अधिक जुड़वां जनसंख्या नाइजीरिया में है, लेकिन इस भारतीय गांव का मामला सबसे अलग है। यहां एक ही गांव में भारी संख्या में जुड़वां लोग हैं। कोदिनही का जुड़वां गांव उत्तर भारत में भी है। इलाहाबाद के पास मोहम्मदपुर उमरी की जनसंख्या 3,000 है, यहां जुड़वां लोगों के 100 जोड़े हैं। दोनों जुड़वां गांवों में एक ही समानता है कि दोनों मुस्लिम बहुल गांव हैं। मोहम्मदपुर उमरी गांव में भी पिछले 60-70 साल से यह विचित्रता मौजूद है।

 

मल्लपुरम से अनिल धीर

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