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मोदी की दिल्ली रैली यूपीए को नई चुनौती

मोदी की रैली में उमड़ी भीड़ का उनकी हर बात पर उत्साह कांग्रेस की चिंताएं बढ़ा सकता है। वे ‘शहजादा’ के तेवर से वंशतंत्र और लोकतंत्र का जो फर्क बता रहे थे, वह यूपीए घटकों को भी सचेत करने की कोशिश कर रहे थे कि कांग्रेस के साथ भविष्य सुरक्षित नहीं है। बदलो दिल्ली का नारा भी व्यापक असर पैदा कर सकता है।
दिल्ली ने कई दशकों से वह नजारा नहीं देखा था जो 29 सितंबर को मोदी की रैली में दिखा। इसका संदेश दो शब्दों ‘बदलो दिल्ली’ में बखूबी जाहिर होता है। दिल्ली में विधानसभा और उसके बाद संसदीय चुनावों के मद्देनजर इस नारे का खास अर्थ है। इससे कांग्रेस की चिंताएं निश्चित रूप से बढ़ जानी चाहिए। उसकी पेशानी पर बल सिर्फ रैली में जुटी भीड़ से ही नहीं, बल्कि नरेंद्र मोदी के उठाए मुद्दों और भीड़ की प्रतिक्रिया से भी पड़ेगा। मोदी के हर अंदाज पर भीड़ का जैसा हुंकार उठ रहा था, उसे महज ‘रॉकस्टार’ जैसी दीवानगी भी कहना छोटा करके आंकना हो सकता है।

मोदी की हाल में भोपाल की सभा में पांच लाख की भीड़ तो कार्यकर्ताओं की थी, लेकिन राष्ट्रीय राजधानी में, जहां पिछले कुछ वर्षों से लाख से ऊपर की भीड़ जुटाने को राजनीतिक पार्टियां तरसती रही हैं, दो लाख से अधिक कार्यकर्ता और सामान्य लोगों की भीड़ को मोदी के प्रति निरंतर बढ़ते आकर्षण का ही संकेत माना जाएगा। यही नहीं, भीड़ का उत्साह देश के मिजाज का संकेत दे रहा था।

भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार ने दिल्ली की गद्दी को चुनौती देने का ऐलान भी बखूबी किया। उन्होंने कहा कि दिल्ली का राज पूरी तरह भ्रष्ट हो गया है और उसे फौरन बदलने की जरूरत है। उनके भाषण में गंभीर आलोचना, तीखी चुटकियां, व्यंग्य तो था ही, अगले आठ साल के राजकाज का विजन भी था, जब देश आजादी की 75वीं वर्षगांठ मना रहा होगा। यह भी देखना दिलचस्प है कि मोदी ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को नवाज शरीफ के नाम के आगे ‘मियां’ नहीं जोड़ा, जो संबोधन लगाना अमूमन पाकिस्तानी मीडिया या नेता कभी नहीं चूकते। जबकि पहले वे परवेज मुशर्रफ को हमेशा ही ‘मियां मुशर्रफ’ कहकर संबोधित करते रहे हैं, जिसे मोदी के आलोचक राजनीति के ध्रुवीकरण की कोशिश कहते रहे हैं। शायद वे ‘कुत्ते का बच्चा’ और ‘बुर्का’ पर उठे विवाद से ज्यादा सतर्क हो गए हैं।

हालांकि मोदी ने राहुल गांधी के लिए ‘शहजादा’ कहकर सबको चौंकाया। उन्होंने युवराज नहीं कहा जो राहुल के बारे में मीडिया में लिखा या कहा जाता रहा है। वैसे तो युवराज और शहजादा का अर्थ एक जैसा है लेकिन हिंदी पट्टी में दोनों के दो अर्थ निकाले जाते हैं। युवराज अक्सर गद्दी के वाजिब हकदार के लिए इस्तेमाल किया जाता है जबकि शहजादा में एक तरह का व्यंग्य छुपा होता है। मोदी ने कहा, ‘मामला यह है कि देश संविधान से चलेगा या शहजादे के मनमौजी इरादों से। यह वंश तंत्र और लोकतंत्र के बीच का टकराव है।’ मादी के मुताबिक ‘दाल रोटी खाओ, प्रभु के गुण गाओ’ जैसे दर्शन ने नुकसान ही ज्यादा किया है, इसलिए अब इस देश को बड़ा सपना देखना होगा, जिसकी 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम उम्र की है। उन्होंने अपने घंटे भर के भाषण में युवा शक्ति का जिक्र कम से कम पांच बार किया।

मादी के भाषण के पांच हिस्से थे। पहले उन्होंने दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित पर निशाना साधा और कहा कि मुख्यमंत्री जी ने अपने पिछले तीनों कार्यकाल में ज्यादातर समय फीता काटने में बिताया है। उन्होंने कॉमनवेल्थ गेम्स पर कहा कि शीला दीक्षित ने भ्रष्टाचार को गले लगाकर देश को गौरव के एक अवसर से वंचित कर दिया। भाषण का दूसरा हिस्सा ‘भ्रष्टाचार की संस्कृति’ पर था। उन्होंने कहा कि यूपीए ने महात्मा गांधी के प्रति अपने प्रेम को ‘नोट’ पर उतार दिया है और वह ‘टनों नोट’ जमा कर रहा है। दरअसल ऐसा एक एसएमएस कई दिनों से चल रहा है जिसे मोदी ने अपनी शैली में व्यंग्य करने के लिए इस्तेमाल किया।

भाषण का तीसरा हिस्सा भ्रष्टाचार, कुशासन और यूपीए सरकार की ‘पॉलिसी पैरालाइसिस’ पर था। चौथा हिस्सा इस पर आधारित था कि कैसे एक चायवाला भाजपा में योग्य उम्मीदवार बन गया, वह भी शशांक की तरह नहीं बल्कि एक सेवक की तरह शहजादा से सत्ता छीनना चाहता है। उन्होंने कहा कि शहजादा को देखिए कि वह अपनी ही पार्टी के प्रधानमंत्री की पगड़ी उछाल रहा है। मोदी की विकास पुरुष के रूप में स्थापित छवि से अब मोदी को गुजरात के विकास का जिक्र करने की जरूरत नहीं रही। वे प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं। सो, अब छह करोड़ गुजरातियों के बदले वे 125 करोड़ देशवासियों की बात करने लगे हैं।

मोदी का सफर एक सुविचारित राह पर है। वे गुजरात में तीसरी बार जीतने के बाद राष्ट्रीय मंच पर आए हैं। वे इसके पहले फरवरी में श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स के छात्रों को संबोधित करते हुए बता चुके हैं कि कैसे गुजरात का विकास मॉडल देश में लागू किया जा सकता है। अब सात महीने बाद वे दिल्ली के जापानी पार्क में अलग एजेंडा लेकर पहुंचे थे।

वे पिछले कुछ समय से सीधे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी या राहुल गांधी की आलोचना नहीं कर रहे हैं। लेकिन राहुल ने दागी सांसदों से संबंधित अध्यादेश को ‘फाड़ कर फेंक दो’ और ‘बकवास’ जैसी गुस्सैल टिप्पणियों से प्रधानमंत्री ही नहीं, समूचे मंत्रिमंडल को बेमानी बता दिया तो स्वाभाविक ही था कि मोदी फिर उन्हें निशाने पर लेते। पहले तो उन्होंने मनमोहन सिंह की राष्ट्रपति ओबामा के आगे भारत की गरीबी का हवाला देकर अमेरिकी निवेश के लिए हाथ पसारने की खिल्ली उड़ाई। फिर नवाज शरीफ के उन्हें एक देहाती बुढिय़ा जैसा बताने पर कहा, ‘नवाज शरीफ आपकी क्या औकात है..नवाज शरीफ को इतनी हिम्मत कहां से आई। हम अपने प्रधानमंत्री और अपनी मातृभूमि का ऐसा अपमान नहीं सहेंगे।’ और जब उन्होंने कहा कि ‘वे दूसरों का सम्मान कैसे हासिल करेंगे जब उनके अपनी पार्टी के नेता ही उन्हें बकवास कहते हैं और वह भी तब जब वे विदेश में हैं,’ तो भीड़ से हुंकार उठ रहा था। फिर कहा कि ‘शहजादा ने उनकी पगड़ी उछाल दी है। उन्होंने सिर्फ प्रधानमंत्री का ही अपमान नहीं किया, बल्कि पूरी सरकार की इज्जत उतार दी है।’

पगड़ी का जिक्र छेड़कर मोदी सिख समुदाय की संवेदनाएं भी उभारना चाहते थे जिसके लिए पगड़ी उछालने का अर्थ इज्जत उतारने जैसा होता है। मोदी यूपीए पर चोट कर रहे थे। यूपीए के घटक राकांपा के नेता शरद पवार पहले ही राहुल की टिप्पणी पर नाराजगी जता चुके हैं। मोदी ने कहा कि यूपीए के घटक दलों को सोचना है कि उन्हें वंश तंत्र चाहिए या लोकतंत्र।

उदय इंडिया ब्यूरो

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