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विमानन क्षेत्र के विकास का पर्यावरण पर बढ़ता दबाव

देश के आसमान में विमानन गतिविधियों में तेज वृद्धि हमारे वायुमंडल में प्रदूषण का स्तर भी भयावह तेजी से बढ़ा रही हैं। यह वायु और शोर प्रदूषण सड़क परिवहन से कई गुना ज्यादा घातक है, इसलिए आज जरूरी है कि विमानन गतिविधियों में संतुलन कायम करने के लिए व्यापक नीति बनाई जाए, वरना आने वाली पीढिय़ों के लिए हमारी धरती असुरक्षित हो जाएगी।
भारत में टाटा संस लिमिटेड के प्रस्तावित सस्ती एयरलाइन शुरू करने की नई योजना से भारतीय वायुक्षेत्र में विमानन गतिविधियां बढ़ जाएंगी। यही नहीं, आधुनिकीकरण में लगी सेना अपने बेड़े में नए विमान और हेलिकॉप्टर को शामिल कर रही है, जिससे हमारे आकाश मार्ग की व्यस्तता और बढ़ेगी। नतीजतन, देश का वातावरण इससे प्रभावित होगा और उसमें प्रदूषण स्तर बढ़ेगा। आम लोगों में यह धारणा है कि सामान्यत: पेट्रोल और डीजल से चलने वाली गाडिय़ों से निकलने वाले विषैले धुंए से ही वायुमंडल में प्रदूषण फैलता है। लेकिन वायुमंडल के प्रदूषण की इससे भी बड़ी वजह वायुयानों के एयर टरबाईन फ्यूल (एटीएफ) से निकलने वाला विषैला धुआं और शोर है। लेकिन विडंबना यह है कि औद्योगिक रूप से आगे कुछ देशों से बिलियन डॉलर की लागत से खरीदे गए एयरक्राफ्ट और एटीएफ हमारे वायु क्षेत्र को दूषित करते हैं, जबकि हमारी घरेलू एयरलाइन अपना लाभ भारतीय मुद्रा में कमाते हैं।

हमारी सड़कों की तरह ही हमारा आकाश भी विभिन्न आकार के वायुयानों से काफी भीड़ भरा हो जाएगा। निजी क्षेत्र की एयरलाइन कंपनियों के आने से यात्रियों और भारतीय वायुक्षेत्र में मालवाहक एयरक्राफ्टों की संख्या कई गुना बढ़ गई है। इसी तरह भारतीय वायुसेना भी कई विमानों को खरीदने वाली है और आने वाले वर्षों में अपनी उड़ानों की संख्या बढ़ाएगी। वायुमंडल का सुरक्षा कवच ओजोन परत के विनाश और ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में इस तथाकथित विकास का योगदान सबसे अधिक होने वाला है।
एक अनुमान के मुताबिक भारत में औसतन हर 15 दिन में घरेलू विमान कंपनियों अपने बेड़े में एक यात्री विमान जोड़ लेती हैं, जो देश के दूर-दराज के इलाकों तक अपनी पहुंच बनाने की होड़ में जुट जाती है। कॉरपोरेट सेक्टर के अलावा सार्वजनिक उपक्रमों और राज्य सरकारों ने भी अपने एक्जक्यूटिव जेट और हेलिकॉप्टरों का संचालन करना शुरू कर दिया है। इसके कारण भारतीय वायुक्षेत्र में उड़ानों की संख्या काफी बढ़ गई है। गौरतलब यह भी है कि सशस्त्र बलों- वायु सेना, थल सेना, नौसेना और तटरक्ष बलों के एक हजार से ज्यादा लड़ाकू, परिवहन विमान और हेलिकॉप्टर दिन-रात उड़ते रहते हैं। एक अनुमान के मुताबिक, भारतीय वायुक्षेत्र में उड़ान गतिविधियों में सलाना 15 प्रतिशत की दर से वृद्धि हो रही है।

इन गतिविधियों का असर स्थानीय वायु गुणवत्ता, खासकर हवाई अड्डों के आस-पास का क्षेत्र में स्थानीय निवासियों के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो गया है। दिल्ली हवाई अड्डे पर हर मिनट एक जहाज उड़ान भरने या उतरने को तैयार रहता है। इससे वायुमंडल में न सिर्फ वायुयानों के ईंधन से वायु प्रदूषण होता है, बल्कि विमानों के कारण ध्वनि प्रदूषण भी उतनी ही तेजी से फैलता है। इसके अलावा हवाई अड्डे पर उतरने का इंतजार करते इन वायुयानों से हजारों टन विषैला धुआं वायुमंडल में छोड़ते हैं। भारत में बड़े पैमाने पर व्यावसायिक उड़ानों के विस्तारीकरण, हवाई यातायात सुरक्षा के कारण हवाई अड्डे के आसपास रहने वाले लोगों के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न कर दिया है। यह भी आशंका जताई जा रही है कि एक दशक पहले हरियाणा के चरखी-दादरी में आकाश में दो यात्री विमानों के टकराने जैसी दुर्घटना दोबारा घटित हो सकती है।

इस प्रदूषण में किरोसिन का महत्वपूर्ण योगदान है, व्यावसायिक विमानों और मिलिट्री विमानों को उड़ाने के लिए एटीफ में इस्तेमाल किया जाता है। अन्य जीवाश्म जनित ईंधनों की तरह किरोसिन भी दहन के दौरान कार्बन डाई ऑक्साइड और वाष्प का बड़े पैमाने पर उत्सर्जन करता है। लड़ाकू विमान और वायुयान प्रमुख रूप से दो तरह का उत्सर्जन करते हैं, जिसमें कार्बन डाई ऑक्साइड और वाष्प होता है। इनके इंजन से नाइट्रोजन डाई ऑक्साइड और नाइट्रिक ऑक्साइड के साथ-साथ एयरोसोल जैसा घातक उत्सर्जन होता है। इंजन के चालू होने के दौरान होने वाली दहन प्रक्रिया को पूरी तरह कार्य-कुशल नहीं है। इसमें कार्बन मोनो ऑक्साइड और जैविक यौगिक जैसे ऑक्सीकरण उत्पाद, वायुमंडल में बड़े पैमाने पर फैलते हैं। वायुयानों द्वारा फैलाए गए इस प्रदूषण से कई तरह से पर्यावरण नुकसान तो होता ही है, नागरिकों का जीवन भी संकट में आ पड़ जाता है।
ऊंचाई पर उडऩे के कारण इन विमानों द्वारा छोड़े गए गैस, वायुमंडल के ऊपरी व्योम मंडल और नीचले समताप मंडल को सीधे प्रभावित करते हैं, जो ग्रीनहाउस गैसों के संकेद्रण के जरिए पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते हैं। कार्बन डाई ऑक्साइड प्रमुख ग्रीनहाउस गैस होता है।

अध्ययन से यह बात साबित हो चुका है कि ये गैसें वायुमंडल में औसतन 100 साल तक मौजूद रहती हैं। इसका सीधा अर्थ है कि कार्बन डाई ऑक्साइड के घातक असर को अगली पीढिय़ों को भुगतना होगा। एक अनुमान के अनुसार, वर्तमान में हर साल 6 हजार मिलियन टन कार्बन डाई ऑक्साइड वैश्विक स्तर पर वायुमंडल में छोड़ा जाता है।

उड़ान गतिविधियों की सबसे बड़ी खामी कंट्रेल्स भी है, जो वाष्पीकरण और एयरोसोल कण से बनते हैं। कंट्रेल्स, जिसे प्राय: जमीन से भी देखा जा सकता है, जो वायुयानों द्वारा छोड़े गए उत्सर्जन से संघनन द्वारा बनता है। वायुयानों द्वारा उत्सर्जित पदार्थ बर्फीला बादल छोड़ते हैं, जो ताप को अवशोषित कर वायुमंडल में रेडियोधर्मिता को अनियंत्रित करता है।

भारी वायु यातायात वाले हवाई क्षेत्रों के सेटेलाइट तस्वीरों में साफ दिखता है कि कंट्रेल्स बहुत जल्दी बनते हैं और वहां विद्यमान रहकर ‘सिरस क्लाउड’ का निर्माण करते हैं। सिरस क्लाउड और कंट्रेल्स, दोनों जलवायु परिवर्तन के प्रमुख कारक होते हैं, जो जीवों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालने के साथ-साथ, कई तरह की प्राकृतिक आपदाओं का प्रमुख कारण होता है।

इन चिंताओं और हानिकारक प्रभावों को देखते हुए, भारत में बढ़ती हुई उड़ान गतिविधियों पर समूचित दृष्किोण अपनाने की जरूरत है। वायुयानों की उड़ानों में बेतहाशा वृद्धि के कारण ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन को देखते हुए, भारत को इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने और सहयोग लेने से हिचकना नहीं चाहिए।

 

एन.के. पंत

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