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अलकायदा की नई चाल: खतरनाक गोलबंदी

अलकायदा के कमजोर पडऩे और अल जवाहिरी का संगठन पर प्रभावी नियंत्रण न रहने के संकेत मिल रहे हैं। पाकिस्तान के कबाइली इलाकों में वर्षों से फंसा जवाहिरी अमेरिकी ड्रोन हमलों से कहीं बाहर नहीं निकल पा रहा है।
पाकिस्तान के पेशावर में 1988-89 में अलकायदा का जन्म हुआ। सोवियत रूस को अफगानिस्तान में नौ साल बाद मुजाहिदीन और तालिबान से बुरी तरह पराजित होकर वापस लौटना पड़ा था। ये दोनों संगठन अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने सोवियत सेना से लडऩे के लिए खड़े किए थे। सऊदी अरबपति के बेटे ओसामा बिन लादेन को जेहाद में पक्के यकीन के साथ संगठन खड़ा करने और अस्त्र-शस्त्र तथा रकम जुटाने में कोई दिक्कत नहीं थी। इस तरह एक गैर-राज्य या गैर-सरकारी आतंकी तंत्र का दुनिया में सूत्रपात हो रहा था। रूस को परास्त करने के कुछ समय बाद अलकायदा सऊदी अरब में अमेरिका के ठिकानों को अपना निशाना बनाने लगा, यहां तक कि अमेरिका में भी हमला कर बैठा। 11 सितंबर 2001 में अमेरिका के वल्र्ड ट्रेड सेंटर के दो टॉवरों को ध्वस्त करने के पहले तक अलकायदा अफगानिस्तान-पाकिस्तान में आधारित दुर्दांत आतंकी संगठन बन गया था। अमेरिका ‘आतंक के खिलाफ जंग’ की घोषणा करने पर मजबूर हुआ।

अमेरिका की जवाबी कार्रवाई
अफगानिस्तान में 2002 में अमेरिका की अगुआई में नाटो सेना के उतरने के बाद से ही अलकायदा का पतन शुरू हो गया। उसके नेता-कार्यकर्ताओं पर अफगानिस्तान में ही नहीं बल्कि यमन में भी कहर टूट पड़ा। उसके कई नेता-कार्यकर्ता गुआतनामो जेल में बंद हैं। खालिद शेख मुहम्मद जैसे उसके वरिष्ठ नेताओं को 9/11 और दूसरे ‘युद्ध अपराधों’ के लिए सजा सुनाई गई।

अलकायदा के मुखिया ओसामा बिन लादेन 2005 से ही पाकिस्तान के एबटाबाद में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई की पनाहगाह में रह रहा था। उसे 2 मई 2011 को अमेरिकी फौज की नेवी सील टुकड़ी ने अचानक हमला करके मार गिराया। फिर, अफगानिस्तान, पाकिस्तान के पश्चिमी सीमावर्ती इलाकों और यमन में अमेरिकी ड्रोन हमलों ने अलकायदा को काफी नुकसान पहुंचाया।

कैंसर फैलने लगा
इन हमलों के बावजूद अलकायदा ने न सिर्फ अपना वजूद बचाए रखा, बल्कि उत्तरी अफ्रीका और मध्य-पूर्व में अपने पैर फैला लिये। इराक अमेरिकी फौज के 2011 में पूरी तरह हटने के बाद आज भी थरथर्राता रहता है। वहां सामुदायिक हिंसा में अनगिनत लोग अपना जान गंवा चुके हैं। सीरिया में सुन्नी और शिया लड़ाके राष्ट्रपति बशर अल असद के पक्ष और विपक्ष में खून-खच्चर कर रहे हैं। विश्व ताकतें इसके गहरे नतीजों को नहीं देख पा रही हैं। इससे अलकायदा नए इलाकों में अपना पैर फैला रहा है। अमेरिका अल असद सरकार की विदाई चाहता है जबकि रूस, चीन और ईरान उसे समर्थन और हथियार मुहैया करा रहे हैं। महाशक्तियों के इस टकराव से अलकायदा को फायदा मिल रहा है। उत्तरी अफ्रीका, यमन और इराक से अलकायदा के सैकड़ों लड़ाके अल असद की फौज से लडऩे सीरिया पहुंच रहे हैं।

विश्वव्यापी जेहाद
मिस्र 2011 से ही अप्रत्याशित सियासी झंझावात में फंसा है। जुलाई 2013 में मिस्र की फौज ने राष्ट्रपति मोहम्मद मुर्सी को सत्ता से हटा दिया। इससे मुस्लिम ब्रदरहुड तथा दूसरे सलफी गुटों और मिस्र की फौज के बीच खूनी संघर्ष जारी है। मिस्र की फौज सिनाय में भी बगावत से निपट रही है। मिस्र में भी अलकायदा की मौजूदगी के संकेत मिले हैं।
उत्तर-पश्चिमी अफ्रीका में 2007 में एक स्थानीय सलफी संगठन अलकायदा से जुड़ गया और अलकायदा इस्लामी मगरबी का गठन हुआ। यह संगठन ट्यूनीशिया, अलजीरिया, माली, निगर और मोरक्को में काफी सक्रिय है। 2012 में इस संगठन ओर दूसरे इस्लामी गुटों ने उत्तरी माली पर कब्जा कर लिया। इससे फ्रांस को वहां फौज भेजनी पड़ी। मगरबी गुट का अगुआ अब्देलमालेक द्रौकदेल है।

2009 में यमन और सऊदी अरब के अलकायदा गुटों ने अरब द्वीप अलकायदा का गठन किया, जो सबसे खूंखार माना जा रहा है। अब उसका फोकस अफगानिस्तान-पाकिस्तान के बदले अरब की ओर हो रहा है क्योंकि यह गुट अरब में अमेरिकी ठिकानों पर हमलों में सक्षम माना जा रहा है। इसका मुख्यालय यमन में है और नासेर अल वुहायशी इसका प्रमुख है।

2013 में अलकायदा की एक शाखा इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड द लेवांट कई आतंकी गुटों को मिलाकर स्थापित की गई। इसका इराक, सीरिया, जॉर्डन, इज्राइल फिलस्तीन, लेबनान और दक्षिण तुर्की में असर है। इस संगठन ने सीरिया में अपने लड़ाके भेजे और वहां सक्रिय फ्री सीरिया आर्मी जैसे दूसरे गुटों से ज्यादा प्रभावी बन गया। इसका अगुआ अबु बर्क अल बगदादी है।

अलकायदा का अफगानिस्तान और पाकिस्तान में भी तालिबान, तहरीके तालिबान पाकिस्तान और हक्कानी नेटवर्क से संपर्क है। इस तरह अलकायदा के भौगोलिक प्रसार से कई देशों में स्थायित्व, ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री माल वहन पर खतरा पैदा हो गया है(देखें नक्शा)। उत्तरी अफ्रीका और मध्य-पूर्व में इसकी उपस्थिति से ऊर्जा के स्रोत और समुद्री माल वहन प्रभावित होने लगा है। इससे खाड़ी देशों की सरकारें चिंतित हैं क्योंकि वे अपनी जनता को अरब वसंत की हवा से दूर रखना चाहते हैं। राजनीतिक रूप से अस्थिर और गरीब उत्तर अफ्रीका अलकायदा के लिए ठिकाना बनाने और रंगरूटों की भर्ती के लिए महफूज जगह मुहैया कराता है। भूमध्यसागर के पार उत्तरी अफ्रीका की यूरोप से नजदीकी भी चिंता का दूसरा कारण है। इससे इज्राइल और तुर्की की चिंताएं भी बढ़ गई हैं। इस इलाके में राजनीतिक अस्थिरता से भी अलकायदा को मजबूत आधार मिलेगा।

अलकायदा का मकसद बदला
हाल में अलकायदा के भगोड़े प्रमुख अयमान अल जवाहिरी ने आतंकी संगठनों को नए दिशानिर्देश जारी किए हैं। उसने मुस्लिम देशों में गैर-सुन्नी मुसलमानों, ईसाइयों, हिंदुओं और सिखों पर हमले करने, मस्जिदों या सार्वजनिक स्थानों पर तबाही बरपा करने से बाज आने को कहा है। इसके अलावा दावा या लोक कल्याण में जुटने का आह्वान किया है। जवाहिरी ने बताया है कि अब उत्तरी अफ्रीका और मध्य-पूर्व में इस्लामी राज्य की स्थापना ही अलकायदा का मकसद है। इस मकसद में इज्राइल का विनाश और काराकस से कश्मीर तक मुस्लिम भाइयों को काफिर सरकारों से मुक्त करना शामिल है। उसने सभी आतंकी गुटों से एकजुट होने का भी आह्वान किया है।

जानकारों को इस संदेश में अलकायदा के कमजोर पडऩे और अल जवाहिरी का संगठन पर प्रभावी नियंत्रण न रहने के संकेत मिल रहे हैं। पाकिस्तान के कबाइली इलाकों में वर्षों से फंसा जवाहिरी अमेरिकी ड्रोन हमलों से कहीं बाहर नहीं निकल पा रहा है। इस वजह से कई स्वतंत्र आतंकी संगठन खड़े हो गए हैं। जवाहिरी के संदेश से यह भी स्पष्ट है कि वह खास निशानों, कथित दुश्मन देश के नेताओं और फौजी ठिकानों पर हमले की तैयारी कर रहा है।
आतंक के ताजा मामले
अमेरिका ने 3 अगस्त को उत्तरी अफ्रीका और मध्य-पूर्व में अपने दूतावासों को हमले की आशंका से आगाह किया। अमेरिका ने 22 देशों में अपने दूतावासों को बंद रखा। उसने अपने नागरिकों को यात्रा परामर्श भी जारी किया। ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी ने भी सना, यमन में अपने दूतावास बंद किए।

लेकिन वे दिन शांति से गुजर गए। 21 सितंबर को केन्या की राजधानी नैरोबी में एक मॉल में आतंकियों ने कब्जा कर लिया जिसमें 68 लोग मारे गए और 175 घायल हो गए। इससे मुंबई हमले की याद ताजा हो गई। यह हमला अल शबाब आतंकी गुट ने किया, जो 2011 में अलकायदा का हिस्सा बना।

अल जवाहिरी शायद 2014 की रणनीति तैयार कर रहा है जब नाटो की फौज अफगानिस्तान से विदा हो जाएगी और वहां मौजूदा सुरक्षा सेना को तालिबान के हमले झेलने होंगे। वहां हक्कानी नेटवर्क, तालिबान और पाकिस्तानी तालिबान मिलकर ताकतवर हो जाएंगे। जवाहिरी 2014 के बाद कश्मीर की बात भी करता है। यानी ये ताकतें कश्मीर की ओर कूच कर सकती हैं। जैसा कि ऊपर बताया गया है, नाटो फौज के अफगानिस्तान से निकलने के बाद अलकायदा को मजबूत आधार मिल जाएगा और वह दुनिया भर में अपने निशानों के प्रति सक्रिय हो जाएगा।

 

कर्नल यू. एस. राठौर

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