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दिशाहीन संसद और सरकार

‘बदतमीजी कर रहे हैं आज फिर भौंरे चमन के
साथियों आंधी उठाने का जमाना आ गया है।’
जिस देश में जनता को जनार्दन तथा नारी को जगदंबा के अवतार के रूप में माने तथा पूजे जाने की पवित्र परंपरा एवं समृद्ध दर्शन रहा हो, आखिर उनके दुख-दर्द का तारणहार कौन बनेगा – सरकार, संसद या सड़क?
भारत सरीखे लोकतांत्रिक देश में संसद की गौरवशाली सत्ता एवं उत्कृष्टता को भारतीय संविधान में प्रमुखता से वर्णित किया गया है तथा इसका भारतीय जम्हूरियत की पवित्रतम संस्था के रूप में शुमार किया जाता है, क्योंकि यह मात्र देश के कानून निर्माण की सबसे बड़ी संस्था ही नहीं, बल्कि इस देश के आवाम की आशा एवं आकांक्षाओं के साकार करने का सबसे बड़ा माध्यम भी है। सम्पूर्ण राष्ट्र के कल्याण तथा सुख-समृद्धि के लिए अनिवार्य नियमों की संहिता प्रजातंत्र के इसी मंदिर से निर्मित होता है तथा उसके क्रियान्वयन की सौ फीसदी जिम्मेदारी भी संसद के ऊपर ही निर्भर करता है। यही कारण है कि भारत की संसद तथा भारत के नागरिक एक-दूसरे के पर्याय कहलाते हैं। संसद का सरोकार राष्ट्र तथा जनता के कल्याण से जुड़ा होता है तथा राष्ट्र की संप्रभुता की रक्षा से ताल्लुकात रखता है। किन्तु हाल के वर्षों में जिस प्रकार की विविध समस्याओं के समाधान के लिए जनता सड़कों पर उतर कर अपने हक के लिए संघर्ष कर रही है। अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए सार्वजनिक रूप से अपनी आवाज बुलंद कर रही है तथा अन्याय एवं शोषण के खिलाफ धरना एवं प्रदर्शन के अतिरिक्त सरकार एवं उसके नौकरशाहों के दफ्तरों का घेराव कर रही है, तो यह प्रश्न आत्मबोध एवं आत्मावलोकन का हो जाता है कि आखिर सरकार की उदासीनता एवं व्यवस्था की संवेदनहीनता हमें किस मुकाम की तरफ ले जा रही है? क्या आम जनता में सरकार की कर्तव्यपरायणता एवं राज्यधर्म के प्रति आस्था एवं श्रद्धा की अभेद्य दीवारों में दरार पडऩे लगी है? क्या संसद की कार्यप्रणाली एवं सर्वोच्च संवैधानिक संस्था का रुतबा बीमार होकर अपना अस्तित्व खोता जा रहा है? तथा सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि क्या संसद सड़क में तब्दील हो चुकी है, जनता के प्रतिनिधियों की प्रासंगिकता अर्थहीन होती जा रही है? क्या सरकार की नैतिक जिम्मेदारी का धर्मबोध कुंद पड़ता जा रहा है? कदाचित ही कोई इस कड़वे हकीकत से इनकार कर पाए कि जिस कदर अराजकता एवं अव्यवस्था के अनचाहे एवं अवांछित माहौल के दौर से आज सम्पूर्ण राष्ट्र गुजर रहा है, वह लोकतंत्र की मजबूत बुनियाद के लिए बड़ा खतरा साबित हो रहा है, जिसकी कोख में भयंकर अंदेशों के भ्रूण अबाध गति से स्पंदन कर रहा है।

1990 के दशक के सुधारवादी अर्थव्यवस्था के उदारीकृत एवं वैश्वीकृत परिवेश के उत्तर संक्रमण काल के इस आधुनिक एवं सूचना क्रांति के रंगीन युग में तमाम दुनिया परिवर्तनों के अजीब दौर से गुजर रही है। शिक्षा एवं सूचना के प्रचार-प्रसार ने जनता की सोई आत्मा को जागृत किया है तथा उसके विवेक में एक तिलस्मी चमत्कार लाया है। जमाने की खबर से पलभर में रू-ब-रू होनेवाले 21वीं सदी के सुपरसोनिक स्पीड से प्रगति कर रहा भारत, दुनिया के विभिन्न हिस्सों में हो रही तब्दीलियों से अनजान नहीं रहा है। लीबिया, मिस्र, ट्यूनिशिया सरीखे देशों में जिस कदर जनाक्रोश के माध्यम से सत्ता के शीर्ष पर बैठे तानाशाही हुकूमतें धाराशायी हुई हैं, उनके दृश्य, दशा एवं दिशा की लौ की जलन से भारत सरीखा प्रजातांत्रिक देश भी अछूता नहीं रहा है। सोशल साइट्स की क्रांतिकारी सूचना के परिणामस्वरूप शीघ्रता से संदेशों के विनिमय के माध्यम ने आम जनता के दिमाग में क्रांति एवं बदलाव के लिए संघर्ष की चिंगारी को हवा देने में कोई कसर नहीं उठा रखी है। वैश्विक अर्थव्यवस्था में इस प्रकार के नवीनतम बदलाव के संस्करण की पुनरावृत्ति की संभावना हमारे लिए कई अनुत्तरित प्रश्न छोड़ जाती है – जिसमें अव्वल प्रश्न यह उठता है कि सम्पूर्ण विश्व में इस प्रकार के जन आन्दोलनों के पीछे की मंशा को हमारी देश की सरकार ने क्या शिद्दत से पढऩे की कोशिश की है? क्या सरकार जनता की विविध समस्याओं की संवेदनशीलता के प्रति सचेत हुई है? तथा उससे भी अव्वल प्रश्न यह उठता है कि जिस देश में जनता को जनार्दन तथा नारी को जगदंबा के अवतार के रूप में माने तथा पूजे जाने की पवित्र परंपरा एवं समृद्ध दर्शन रहा हो, आखिर उनके दुख-दर्द का तारणहार कौन बनेगा – सरकार, संसद या सड़क? प्रश्न बड़ी दुविधा का है, प्रश्न आत्म-मंथन का है, प्रश्न हमारे जमीर का है तथा अंतत: प्रश्न मुल्क की संप्रभुता को महफूज रखने की हमारी संवैधानिक एवं राष्ट्रीय अनिवार्यता का है, जो हमारे विचारों को आंदोलित करती है और इस प्रश्न पर गंभीरता से सोचने के लिए विवश करती है।

संयुक्त राज्य अमेरिका के भूतपूर्व राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन लोकतंत्र की इस परिभाषा ‘प्रजातंत्र जनता के लिए, जनता का तथा जनता के द्वारा शासन होता है’ के साथ मशहूर तथा अमर हो गए, किन्तु लोकतंत्र की इस परिभाषा में छुपे गूढ़ार्थ को वर्तमान सामाजिक, पारिवारिक एवं राजनीतिक परिदृश्य में एक नए सिरे से समझने की दरकार है। एक अत्यंत ही आत्मबोध का प्रश्न यह उठता है कि सरकार अवाम के लिए है या फिर अवाम सरकार के लिए है? निस्संदेह इसका सीधा-सा अर्थ यह है कि बिना अवाम के सरकार की कोई अहमियत तथा सार्थकता नहीं है, कोई प्रासंगिकता भी नहीं है। शरीर रूपी सरकार के जीवन के लिए अवाम सांस की तरह अनिवार्य है। फिर क्या यह आवश्यक नहीं है कि जो सरकार इस देश की लगभग सवा सौ करोड़ आबादी के सपने के स्पंदन पर जीवित रहता हो, सवा सौ करोड़ आबादी की इच्छाओं पर अपना स्वरूप बदलता हो – फिर क्या सरकार का यह नैतिक दायित्व नहीं बनता है कि इस राष्ट्र की जनता के दुख-दर्द, जहालत, मुफलिसी एवं अन्य विविध प्रकार के कष्टों के प्रति संवेदनशील हों तथा उनकी ख़ुशी एवं कल्याण के लिए सदा तत्पर रहे? सच पूछिए तो इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि सरकार के पास कोई जादू की छड़ी है या अलादीन की तरह कोई तिलस्मी चिराग है, जिसके चमत्कार से मुल्क तथा अवाम की कोई समस्याएं ही नहीं रहेंगी। यह चिरंतन सत्य है कि यदि सरकार है, मुल्क है तो केवल समस्याएं ही नहीं, बल्कि कई प्रकार के संकट भी जरूर रहेंगे, क्योंकि राष्ट्र के पास यदि संकट एवं समस्याएं नहीं हों तो ऐसा माना जाता है कि कदाचित मुल्क प्रगति नहीं कर रहा है या फिर इसमें गतिशीलता का अभाव है। समस्याएं हैं तो एक बात तय है कि राष्ट्र में प्रगति तथा समृद्धि की राह में आगे बढऩे के लिए एक अजीब तरह की बेचैनी तथा उग्रता जन्म ले रही है। समस्याएं प्रगति का रास्ता प्रशस्त करती है। लेकिन यह भी सार्वभौमिक सत्य है कि समस्याओं से दूर भागने की तथा उन्हें टालने की हमारी तथाकथित पलायनवादी प्रवृत्ति हमारे लिए चिंता एवं चिंतन का सबब है, जिससे हमें भयभीत रहने की आवश्यकता है।

सच पूछिए तो वर्तमान पारिवारिक, सामाजिक तथा राजनीतिक परिवेश में जिस प्रकार हिंदुस्तान सरीखा राष्ट्र, भ्रष्टाचार एवं अन्य सामाजिक बुराइयों के चक्रव्यूह में फंसा हुआ, वह अपने जीवन के लिए किसी ऐसे महा राष्ट्रनायक की तलाश में है, जो उसकी मुक्ति एवं मोक्ष के लिए उसका उचित रहनुमाई कर पाए। शरीर के किसी हिस्से में यदि जख्म हो जाए तो उसे तत्क्षण सुधारने की जरूरत है। यदि इस जख्म को लाइलाज छोड़ दिया जाए तो इसके नासूर बनने से कोई नहीं रोक सकता है। फिर नासूर तो हमारे लिए जीवन-मृत्यु के यक्ष प्रश्न सरीखे महत्वपूर्ण होता है, जिसके उत्तर के अभाव में हम कदाचित उस तबाही की तरफ बढ़ रहे होंगे, जिससे फिर उबर पाना बिलकुल मुमकिन नहीं है। सच मायने में आज आवश्यकता इस बात की है कि हम एक ऐसे राष्ट्र के पुनर्निर्माण के प्रति संजीदिगी से चिंता एवं चिंतन करें, जिसमें हम अपने अवाम के दर्द एवं दुखों को शिद्दत से महसूस करें एवं उनके आंसूओं में छुपी हुई पीड़ा महसूस कर, उन्हें दोनों हाथों से पोंछने की हर संभव कोशिश करें, तभी महात्मा गांधी के द्वारा देखे गए ‘रामराज्य’ का सपना मुकम्मल तौर पर साकार हो पाएगा।

 

श्रीप्रकाश शर्मा

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