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देश का भविष्य तय करते दागी नेता

अदालत द्वारा अपराधी घोषित किए जा चुके नेताओं को बचाने के लिए केंद्र सरकार की ओर से लाया गया अध्यादेश अनैतिक ही नहीं, गैरकानूनी भी है। अनैतिक इसलिए क्योंकि जो व्यक्ति अपराधी हो उसे संसद या विधानसभा में बैठकर कानून बनाने का कोई अधिकार नहीं हो सकता। गैरकानूनी इस कारण कि हमारा संविधान देश के प्रत्येक नागरिक को समान अधिकार प्रदान करता है।

कांग्रेस पार्टी के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने केंद्र सरकार की ओर से लाए गए जनप्रतिनिधित्व कानून संशोधन अध्यादेश की सार्वजनिक मंच से आलोचना कर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की रही-सही इज्जत भी मिट्टी में मिला दी है। सरकार के पास अब इस अध्यादेश को वापस लेने के अलावा कोई चारा नहीं है। दागी नेताओं के बचाव में लाए गए अध्यादेश के पक्ष में कल तक कांग्रेस के जो नेता गला फाड़कर चिल्ला रहे थे, राहुल के बयान के बाद भीगी बिल्ली बन गए हैं। राहुल ने विवादास्पद अध्यादेश को फाड़कर कूड़े की टोकरी में फेंक देने की बात कर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार की साख मिट्टी में मिला दी है। इसके बाद मनमोहन सिंह को पद पर बने रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं रह गया है। सजायाफ्ता सांसदों और विधायकों की कुर्सी बचाने का अध्यादेश मंत्रिमंडल की अनुमति और संप्रग के सहयोगी दलों की सहमति से ही आया था। निश्चय ही इस निर्णय पर कांग्रेस आलाकमान (सोनिया गांधी और राहुल गांधी) की मुहर भी लगी होगी। अध्यादेश के खिलाफ उमड़े जनाक्रोश, विपक्षी दलों के विरोध और राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की शंकाओं को भांपकर राहुल गांधी ने पलटा मार अपनी छवि को चार चांद लगाने की कोशिश की है। इस राजनीतिक स्टंट से उन्होंने अपनी सरकार और अपने वफादार प्रधानमंत्री की फजीहत कर दी है, वह भी जब वे विदेश में थे और महत्वपूर्ण राष्ट्र प्रमुखों से मुलाकात कर रहे थे। अमूमन विपक्षी नेता भी प्रधानमंत्री पर तब छींटाकशी नहीं करते जब वे विदेश में हों।

अदालत द्वारा अपराधी घोषित किए जा चुके नेताओं को बचाने के लिए केंद्र सरकार की ओर से लाया गया अध्यादेश अनैतिक ही नहीं, गैरकानूनी भी है। अनैतिक इसलिए क्योंकि जो व्यक्ति अपराधी हो उसे संसद या विधानसभा में बैठकर कानून बनाने का कोई अधिकार नहीं हो सकता। गैर-कानूनी इस कारण से, क्योंकि हमारा संविधान देश के प्रत्येक नागरिक को समान अधिकार प्रदान करता है। जब संविधान सजायाफ्ता नागरिक को चुनाव लडऩे का हक नहीं देता तब सजा प्राप्त अपराधी को सांसद या विधायक बने रहने का अधिकार कैसे दिया जा सकता है? संप्रग सरकार ने चोर दरवाजे से जनप्रतिनिधित्व कानून में संशोधन का मार्ग अपने कुछ चहेते सांसदों की कुर्सी बचाने के लिए उठाया है। कानून बनाने या बदलने का एकाधिकार संसद या विधानसभाओं का होता है। जब संसद न बैठी हो तभी किसी तत्काल महत्व के मुद्दे पर सरकार को अध्यादेश के जरिए कानून में संशोधन का हक है। दागी जनप्रतिनिधियों की कुर्सी बचाना न तो तत्काल महत्व का मुद्दा है और न ही लोकतंत्र के लिए जरूरी। दरअसल सरकार की जल्दबाजी का कारण अपने सहयोगी राजद के लालू प्रसाद और कांग्रेस के नेता रशीद मसूद को अदालती फैसले से सुरक्षा कवच मुहैया कराना था जो राष्ट्रपति की आपत्तियों और राहुल गांधी की आलोचना से अध्यादेश के रुकने से नहीं हो सका।

वैसे भी अध्यादेश के पक्ष में दी गईं सरकारी दलीलें बहुत लचर हैं। इस कदम के पक्ष में कानून मंत्री कपिल सिब्बल कहते हैं, ‘अध्यादेश का उद्देश्य कानून निर्माताओं को बचाना नहीं है। कई बार अदालती फैसले गलत आते हैं, जिनके खिलाफ अपील होती है। आप किसी जनप्रतिनिधि को यूं ही अयोग्य घोषित नहीं कर सकते, संतुलन तो रखना ही पड़ेगा।’ सिब्बल साहब नामी वकील हैं और उन्हें यह भी पता है कि देश में ऐसे हजारों लोग हैं, जिन्हें निचली अदालत से आजीवन कारावास जैसे कड़ी सजा मिली और उच्च अदालत में अपील करने पर वे निर्दोष छूट गए। बेगुनाह होने के बावजूद ऐसे लोग बरसों जेल में सड़े। निचली अदालत का निर्णय आने और बड़ी अदालत द्वारा निर्दोष घोषित किए जाने की अवधि के दौरान उन्हें कोई रियायत नहीं दी जाती। फिर सांसदों और विधायकों को अपील की अवधि में अपनी सदस्यता बरकरार रखने की छूट कैसे दी जा सकती है?

हमारे संविधान के अनुच्छेद 102 (1)(ई) तथा अनुच्छेद 191 (1)(ई) के तहत संसद को देश के सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून की जिम्मेदारी सौंपी गई है। उच्चतम न्यायालय ने गत दस जुलाई को जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8 (4) को रद्द कर इसी भावना का पालन किया था। जनप्रतिनिधित्व कानून की उक्त धारा सजायाफ्ता सांसदों और विधायकों की सदस्यता बरकरार रखने की छूट देती थी। अदालत के इस निर्णय से हड़कंप मच गया। सरकार ने इसे निरस्त करने के लिए पहले सर्वदलीय बैठक बुलाई, फिर संसद में संशोधन बिल रखा। इसी दौरान उच्चतम न्यायालय में पुनर्विचार याचिका भी दायर की गई, जिसे गत चार सितंबर को अदालत ने नामंजूर कर दिया। अदालत के आदेश का सम्मान करने या मामले पर विचार कर रही संसदीय समिति की सिफारिशों का इंतजार करने के बजाय मनमोहन सरकार ने अध्यादेश का सहारा लिया, जिसकी सब तरफ से कड़ी आलोचना हुई है। यह कड़वा सच है कि पिछले तीन दशक में बड़ी संख्या में अपराधियों ने राजनीति में प्रवेश कर सत्ता के गलियारों में अपनी मजबूत पकड़ बना ली है। खुली अर्थव्यवस्था की राह पर चलने के बाद तो संसद और विधानसभाओं में धनबल और बाहुबल का प्रभाव और बढ़ गया है। वर्तमान लोकसभा में दागी सांसदों की संख्या 30 प्रतिशत है और इनमें से 14 फीसदी के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं। पांच साल पहले दागी सांसदों की संख्या 24 प्रतिशत थी। आज देश में कुल 4835 सांसद और विधायक हैं, जिनमें 1460 के खिलाफ कोई न कोई केस दर्ज है। कुछ राज्यों की विधानसभाओं की स्थिति तो और भी खराब है। वहां दागी विधायकों का आंकड़ा साफ-सुथरी लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास रखने वालों का दिल दहला देता है। एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म के आंकड़ों पर गौर करें तो लगता है कि बिना पैसे और बाहुबल के चुनाव जीतना अब लगभग असंभव हो गया है। राजनीति सेवा नहीं, पैसे कमाने का जरिया बन गई है। चुनावों की अंधी दौड़ में स्वच्छ और शरीफ छवि के नेताओं पर अपराधी तबका हावी है।

सबको पता है कि आज अनेक बड़े नेताओं के खिलाफ अदालतों में गंभीर आपराधिक मामले चल रहे हैं। जयललिता, मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, येदियुरप्पा आदि के विरुद्ध जो मुकदमे दर्ज हैं, उनमें महंगे वकीलों के भरोसे लगभग सभी दागी नेता अदालती कार्यवाही को लंबा खींचने में कामयाब हो जाते हैं। इसी कारण आज तक किसी बड़े नेता को सजा नहीं मिल पाई है। यह सब देखकर ही जनता को लगता है कि अपराधी नेताओं को सजा दिलाना और संसद या विधानसभा में उनका प्रवेश रोकना असंभव है।

कानून के सिद्धांत के अनुसार कोई भी आरोपी तब तक निर्दोष माना जाता है, जब तक अदालत उसे अपराधी करार न दे। लेकिन इस सिद्धांत की दुहाई देने वालों को देश की सुस्त न्याय व्यवस्था पर गौर करना चाहिए। भारत की छोटी-बड़ी अदालतों में आज करोड़ों मुकदमे लंबित हैं, अपराधी इस कमजोरी का लाभ उठाकर ही संसद और विधानसभाओं में जमे बैठै हैं। न्याय प्रणाली में तेजी लाने और अपराधियों को चुनाव लडऩे से रोकने की जिम्मेदारी सरकार की है। दुर्भाग्य से आज कानून निर्माताओं की जमात में बड़ी संख्या दागियों की है और चुनाव सुधार की हर कोशिश में पलीता लगा देते हैं। लंबे समय से चुनाव आयोग और अनेक गैर-सरकारी संगठन चुनाव प्रक्रिया में सुधार का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन सरकार सारे सुझाव दबाए बैठी है।

सरकार द्वारा दागियों को चुनाव मैदान से बाहर करने के आदेश को पंचर करने के प्रयास से जनता इसलिए भी रूष्ट है, क्योंकि संसद में आज लगभग 150 बिल लंबित पड़े हैं। सरकार को जनकल्याण से जुड़े ये बिल पास करने की कोई जल्दी नहीं है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट का आदेश पलट दागियों को बचाने के लिए सरकार का यह कदम स्वच्छ लोकतंत्र की कल्पना करने वाली जमात को खुली चुनौती है। इस चुनौती का मुंहतोड़ जवाब दिया जाना जरूरी है।

 धर्मेंद्रपाल सिंह

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