ब्रेकिंग न्यूज़ 

अंधेरी सुरंग में ढेर सारा प्रकाश

लालू, जगन्नाथ मिश्र, जगदीश शर्मा जैसे राजनीतिज्ञों को जेल भेज कर देश की न्यायिक व्यवस्था ने आम आदमी की लोकतन्त्र और देश के संविधान में आस्था एक बार फिर पुनर्जीवित कर दी है। आम आदमी में इससे विश्वास जगा है कि कानून से ऊपर कोई नहीं, चाहे वह कितना ही बड़े से बड़ा व्यक्ति क्यों न हो।
शारजाह, अबु धाबी, दुबई जैसे खाड़ी देश बहुत ही खूबसूरत हैं। उनके बारे में काफी कुछ सुना और फिल्मों में देखा था। इन देशों को देखने की इच्छा दिल में काफी बलवती थी। उस इच्छा को साकार करने का मौका पिछले सप्ताह हाथ आया। मौका छोडऩा अपनी फितरत में नहीं रहा है। इसलिए उस मौके का फायदा उठाते हुए शारजाह होते हुए दुबई पहुंच गया। सैर कराते हुए गाइड ने जब दुबई के बारे में जानकारियां देने की शुरुआत की तो दो बातें लगभग एक साथ हुईं। उस वक्त पर्यटन-बस में चल रहे रेडियो पर समाचार सुनाई दिया, ”चारा घोटाले में बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव को अदालत ने दोषी करार दे कर जेल भेज दिया।’’ बस में सामने खड़ा गाइड दुबई के बारे में बता रहा था, ”दुबई में दो बड़े अजूबे हैं। एक, यहां संसार की सबसे ऊंची इमारत-‘बुर्ज खलीफा’ है और यहां ‘करप्शन जीरो परसेंट’ है।’’ इसे इत्तिफाक कहा जा सकता है कि भारत में ‘लालू को जेल भेजे जाने’ और दुबई में ‘करप्शन जीरो परसेंट’ होने की बात लगभग एक साथ सुनाई दी। यह भी समझ में आया कि दुबई में जहां कुछ अर्सा पहले केवल धूल उड़ा करती थी, वहां आज दुनिया की धन-कुबेर की हैसियत रखने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियां क्यों मौजूद हैं। दूसरी तरफ भारत में जहां धन-कुबेर ने अपना डेरा डाला हुआ था, वहां से कुबेर क्यों अपना डेरा समेटने की कोशिश कर रहा है। स्पष्ट है कि भ्रष्टाचार के कैंसर से बुरी तरह ग्रस्त कोई भी संस्था, समाज या देश तब तक नहीं पनप सकता, जब तक कि उसका उचित इलाज न कर दिया जाए। यदि कैंसर पूरे शरीर में फैला हो तो उसके लिए बड़ी सर्जरी की भी जरूरत होती है।

लालू यादव पहली बार जेल नहीं गए। चारा घोटाला के सिलसिले में ही उन्हें पहली बार 1997 में जेल जाना पड़ा था। तब उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था। लेकिन तब उन्हें इस बात की चिन्ता नहीं थी कि उनकी छवि…..या उनकी साख को बट्टा लग रहा है। जनता उनके बारे में क्या सोचेगी। अपनी राजनीतिक-चादर पर लगने वाले धब्बे को साफ करने के लिए उन्होंने किसी ‘रिन जैसे डिटर्जेंट’ की तलाश नहीं की। ‘सर्फ-एक्सल’ की तरह उन्हें भी लगा कि राजनीति की कोठरी में तो ‘दाग अच्छे होते ही हैं’। इस दाग को साफ करने के लिए उन्होंने सत्ता को सुरक्षित रखने की चिन्ता की। उन्हें किसी अन्य पर नहीं, बल्कि अपनी पत्नी राबड़ी देवी पर विश्वास था। बेचारी राबड़ी सत्ता को लेकर जाएगी कहां? सो, लालू ने राबड़ी को रसोई से निकाल कर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा कर जेल से सत्ता चलाने का सुख भोगा।

इस बार लालू की चिन्ता अलग है। सत्ता तो है नहीं, जो उसके जाने की चिन्ता हो। अब तो लोकसभा की सदस्यता जाने और लगभग छह महीने बाद आने वाले आम चुनावों में जनता को अपना चेहरा दिखाने लायक बनाने की चिन्ता है। हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला और उनके बेटे पार्टी इनेलोद के प्रमुख महासचिव अजय चौटाला की तरह उन्हें चुनाव मैदान में उतरने की योग्यता खोने का डर है। उनकी इस चिन्ता ने कांग्रेस में अध्यादेश-का कोहराम मचा दिया। पूर्व केन्द्रीय मंत्री रशीद मसूद और लालू को बचाने के लिए कांग्रेस ने कानून बदलने या अध्यादेश लाने के पुराने फार्मूले का फिर आजमाने की कोशिश की लेकिन उन असफल कोशिशों ने उसके अन्दर कोहराम मचा दिया। लेकिन जब कांग्रेस के कर्णधारों को महसूस हुआ कि लालू को बचाया नहीं जा सकता, तो ‘अध्यादेश लागू करने के तीर’ को वापस तरकश में डालने का श्रेय ‘शीर्ष परिवार’ को देने की कोशिश हुई। उसके लिए प्रधानमंत्री पद की गरिमा की चिन्ता भी नहीं की गई। प्रधानमंत्री को संबंधित अध्यादेश वापस लेने के लिए कहने की बजाय पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने सार्वजनिक रूप से अध्यादेश को ‘बकवास’ करार दे दिया। राहुल गांधी की इस टिप्पणी का मतलब साफ था कि अध्यादेश वापस लेकर कूड़ेदान में फेंक दो।

यह पूरी गुत्थी में यह समझ से परे है कि तथाकथित ‘बकवास अध्यादेश’ जब मनमोहन सिंह की कैबिनेट ने पारित किया था, तो कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी उस वक्त कहां थे? क्या पार्टी को तब यह अध्यादेश बकवास नहीं लगा था? क्या यह प्रधानमंत्री की गरिमा को जानबूझ कर ठेस लगाने की कोशिश नहीं है? यदि ऐसा नहीं है तो इस तथाकथित ‘बकवास अध्यादेश’ पर कोई टिप्पणी करने से पहले राहुल को प्रधानमंत्री का स्वदेश आने के लिए एक दिन और इंतजार नहीं करना चाहिए था? पूरे प्रकरण में क्या अन्तर पड़ता, यदि राहुल यही टिप्पणी डॉ. मनमोहन सिंह के सामने करते और सरकार को शालीनता से उस अध्यादेश को वापस लेने का रास्ता दिखाते जिसे राष्ट्रपति के पास भेजने से पहले कांग्रेस के कोर ग्रुप ने दो बार और फिर पूरी कैबिनेट ने विचार कर पारित किया था।
कुल मिला कर अध्यादेश और राहुल के प्रकरण के कई अर्थ माने जा सकते हैं, जिनमें कांग्रेस द्वारा नेहरू-गांधी परिवार को देश का प्रथम परिवार बनाए जाने की कोशिशों में अगले चुनावों में यदि सत्ता तक पहुंच पाते हैं तो राहुल गांधी को गद्दी तक पंहुचाए जाने की दिशा का यह एक कदम तो माना जा सकता है, साथ ही इसे ‘मीठा मीठा गप, कड़ुवा कड़ुवा थू’ की कहावत को चरितार्थ करने का एक और उदाहरण भी बताया जा सकता है। इसके अतिरिक्त यदि अध्यादेश येन-केन प्रकारेण लागू हो जाता और लालू उसका लाभ उठा पाते तो आने वाले चुनावों में कांग्रेस के समक्ष बिहार के लिए उनके साथ पुन: समीकरण बनाए रखने का रास्ता खुला रहता। लेकिन अध्यादेश को अधर में ही लटका देखा तो उसकी वापसी का रास्ता ‘राहुल को श्रेय’ देकर ही तैयार करना पार्टी को श्रेयस्कर लगा।

बहरहाल, राजनीति और अपराध के गठबंधन की धुलाई के न्यायपालिका के प्रयासों के फलस्वरूप लालू को चारा घोटाले के एक मामले में भ्रष्टाचार के अपराध में गुरुवार को मिली पांच साल की सजा और 25 लाख रुपए के जुर्माने में लोकसभा से उनकी सदस्यता तो खत्म होगी ही, साथ ही उन पर छह साल तक चुनाव लडऩे पर भी रोक लग जाएगी। उनके साथ अन्य 49 लोगों को भी इस मामले में अदालत ने दोषी पा कर सजा सुनाई है। लालू के जेल जाने से राजनीति में उभरने वाले नए हालात के कयास लगाए जा रहे हैं। इनमें लालू की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के भविष्य, राजद के नेतृत्व, राजद के वोट बैंक और नए राजनीतिक समीकरणों से जुड़े सवाल शामिल हैं। इनमें अनेक सवालों के जवाब भविष्य के गर्भ में छिपे हैं, लेकिन एक सवाल का जवाब अभी दिया जा सकता है। राजनेताओं के भ्रष्टाचार और राजनीति के अपराधीकरण ने अक्सर यह सवाल खड़ा किया है कि क्या राजनेताओं को भी उनकी करनी का फल मिल सकता है? इस सवाल पर आम आदमी हमेशा ही संशय किया करता है कि देश को लूटने वाले नेताओं को उनकी करनी का फल कभी मिल सकता है। लालू को करोड़ों रुपए का भ्रष्टाचार करने के अपराध में पांच साल के लिए जेल भेजने और 25 लाख रुपए का जुर्माना करने, अपराध करने के बाद भी अपील करने के बहाने सदन में बैठे रहने और अपने बचने के लिए कानून बनाने का अधिकार छीन लेने के न्यायालय के फैसले ने अंधेरी घुप सुरंग में केवल एक किरण नहीं, बल्कि आम आदमी को ढेर सारी रोशनी दी है।

लालू, जगन्नाथ मिश्र, जगदीश शर्मा जैसे राजनीतिज्ञों को जेल भेज कर देश की न्यायिक व्यवस्था ने आम आदमी की लोकतन्त्र और देश के संविधान में आस्था एक बार फिर पुनर्जीवित कर दी है। आम आदमी में इससे विश्वास जगा है कि कानून से ऊपर कोई नहीं, चाहे वह कितना ही बड़े से बड़ा व्यक्ति क्यों न हो। देर सवेर उसे सजा होनी ही है। देश के न्यायालय के इतिहास के इस एक और ऐतिहासिक फैसले के दिन सीबीआई के जांच अधिकारी तत्कालीन संयुक्त निदेशक उपेन्द्र नाथ बिस्वास जैसे ईमानदार अधिकारियों को यदि ‘उदय इंडिया’ का सलाम न हो तो इस मसले पर ‘नजरिया’ कहीं अधूरा रह जाएगा। यदि इन अधिकारियों ने दबाव या किसी लालच में आए बगैर ईमानदारी से अपना कर्तव्य नहीं निभाया होता तो आज न्यायपालिका भी लालू और उनके साथियों को जेल का रास्ता दिखाने में असमर्थ ही रहती।

 

श्रीकान्त शर्मा

посуда biolкомпьютеры ноутбуки цены

Leave a Reply

Your email address will not be published.