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लालू को सजा राजनीति का एक निर्णायक पल

चारा घोटाले के फैसले ने साबित किया कि आप कितने भी बड़े और रसुखदार क्यों न हों, कानून के हाथ बहुत लंबे हैं। लालू को सजा भारतीय राजनीति में उस विचारधारा की भी पराजय है जो मानती है कि वोट विकास से नहीं जातिगत और समुदायगत ध्रवीकरण से मिलते हैं।
लालू प्रसाद यादव और उनकी पार्टी ने 1990 से 2005 तक बिहार को सबसे खराब सरकार दी। उनकी सरकार का कार्यकाल ‘जंगलराज’ कहा जाता था। वह शासन के नाम पर कलंक थी। मंत्री और सरकारी अधिकारी शायद ही कभी सचिवालय जाते थे। घटियापन राजनीतिक स्टाइल था। भ्रष्टाचार अनियंत्रित था। इससे एक नई विचारधारा पैदा हो गई थी कि वृद्धि और विकास से वोट नहीं मिल सकता, केवल जाति और समुदाय का ध्रुवीकरण करके ही सत्ता हासिल की जा सकती है और उसे बरकरार रखा जा सकता है। जब लालू प्रसाद यादव को चारा घोटाले में गिरफ्तार किया गया, उस वक्त पार्टी में कोई सहायक कमांडर नहीं था। उनकी पत्नी मुख्यमंत्री बन गईं। जिस राज्य में जाति के आधार पर ध्रुवीकरण हो चुका था उस राज्य ने उन्हें मुख्यमंत्री के रूप में स्वीकार कर लिया। यहां तक कि उन्होंने एक चुनाव भी जीता।

वर्ष 2005 बिहार के लिए ऐतिहासिक घटना का वर्ष था। इस शासन को मतदाताओं ने उखाड़ फेंका। तब लालू यादव गठबंधन की राजनीति का पीछा करते हुए केंद्रीय मंत्री के रूप में केंद्र में आ चुके थे। वे यूपीए के लिए संतुलनकारी ताकत बन गए। यूपीए का समर्थन करने में उनके निहित स्वार्थ जुड़े थे। इसके अलावा सत्ता में होने के कारण वे सीबीआई का चालाकी से इस्तेमाल कर सकते थे, जिसने अभियोजन को नुकसान पहुंचाने के मामले मे मुकदमा चला रखा था। वर्ष 2004 में सात दागी मंत्रियों को मंत्रिपरिषद में शामिल करने को लेकर यूपीए पर पहला प्रहार हुआ। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने दागी मंत्रियों का बचाव किया। दागी मंत्रियों में लालू प्रसाद का नाम सबसे ऊपर था, जिन पर मुकदमा चल रहा था। उनके कुछ मामलों को अभियोजन ने खुद ही सफलतापूर्वक खत्म कर दिया था। आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने के मामले में न्यायाधीश बदल गए, अभियोजन बदले, आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण की विशेष शाखा और एक फैसला, जिससे बड़ी मुश्किल से भरोसा पैदा होता। सीबीआई ने फैसले के खिलाफ अपील नहीं करने का फैसला किया। जब बिहार सरकार ने फैसले के खिलाफ अपील की तब सीबीआई ने अपील दायर करने के लिए बिहार सरकार के हस्तक्षेप के औचित्य पर सवाल खड़ा किया। आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने के मामले को दफन कर दिया गया। कई बार कुछ लोग व्यवस्था पर काबू पा लेते हैं। हर वक्त हर आदमी पर काबू पाना संभव नहीं है। प्रत्येक संस्थान में कुछ लोग ईमानदार हैं। न्यायपालिका में अभी भी ऐसे लोग हैं, जिन्हें झुकाया नहीं जा सकता। आरोपी वर्तमान न्यायाधीश को लेकर परेशानी में था, उन्हें बदलने के प्रयास विफल हो गए। अभियोजन को बदला गया, लेकिन उच्चतम न्यायालय ने हस्तक्षेप किया और ऐसा होने से रोक दिया। आखिरकार एक ऐतिहासिक फैसला आया, जिसमें 45 लोगों को दोषी करार दिया गया। इनमें राजनीतिज्ञ, सरकारी अधिकारी, बिचौलिए और ठेकेदार शामिल हैं।

  1. न्याय मिलने में 17 वर्ष लगे। साहसी वादी इस मामले को बिहार पुलिस से सीबीआई में हस्तांतरित कराने में कामयाब हुए। उन्हें यूपीए सरकार के कार्यकाल के दौरान अपने मामले में गड़बड़ी करने से रोकने में सफलता मिली। जब दोष सिद्ध होना अवश्यंभावी हो गया तो यूपीए दोषी ठहराए जाने के बाद आजीवन कारावास के लिए भी तैयार है। जब संसद ने विधेयक को मंजूरी नहीं दी और स्थायी समिति के पास भेज दिया, बेशर्म यूपीए सरकार ने एक अध्यादेश को मंजूरी दे दी। राष्ट्रपति इस अध्यादेश पर हस्ताक्षर नहीं करना चाहते थे। अध्यादेश को मंजूरी नहीं दी जा सकती थी, जिसका कारण सभी को पता है। आज हम सभी समझ सकते हैं कि यह अध्यादेश क्यों लाया गया था। इसका एकमात्र उद्देश्य यूपीए के एक वफादार घटक की मदद करना था, जिसे दोषी ठहराए जाने की संभावना थी। आखिरकार न्याय मिला। आप कितने भी बड़े क्यों न हों लेकिन कानून के हाथ बहुत लंबे हैं।

    (लेखक राज्यसभा में विपक्ष के नेता हैं)

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