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लालू को जेल, एक युग का अंत

आधुनिक बिहार के इतिहास में 30 सितंबर की तारीख एक युग के अंत के रूप में दर्ज होगी। हाल के दौर में सबसे चर्चित और प्रभावशाली नेता लालू प्रसाद यादव को करोड़ों के चारा घोटाले में जेल भेज दिया गया। वे पहले ऐसा राजनेता बने, जो दो साल से अधिक सजा पाने वाले सांसदों और विधायकों की सदस्यता रद्द करने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के शिकार भी हुए।
रांची की एक अदालत में लालू प्रसाद को चारा घोटाले के एक मामले आरसी 20(ए)/96 के तहत झारखंड के चाईबासा सरकारी खजाने से फर्जी तरीके से 37.7 करोड़ रुपए की निकासी का दोषी पाया। हालांकि इस अदालती फैसले की उम्मीद सभी लोग कर रहे थे और लालू प्रसाद के भी दिल के एक कोने में यह आशंका बनी हुई थी। फिर भी अपने जुझारू स्वभाव के लिए जाना जाने वाला यह नेता निराशा में भी आशा की तलाश कर रहा था। वे कई मंदिरों की परिक्रमा कर आए थे, देवताओं के आगे सिर झुका आए थे, अपने हाथ में काला धागा पहन रखा था। रांची में विशेष सीबीआई अदालत के सामने पेश होने के लिए निकलने के पहले उन्होंने काफी पूजा-अर्चना की, शुभ के लिए दही खाई और अपने गोशाला में जाकर गऊ पूजा की।

लेकिन देवताओं का आवाहन या परिजनों तथा पार्टीजनों की शुभकामनाएं लालू प्रसाद के काम न आईं। सीबीआई जज प्रभाष कुमार सिंह ने जब फैसला सुनाया तो अपनी देहाती चतुराई और आकर्षण के लिए प्रसिद्ध नेता के चेहरे का रंग उड़ गया। अपने दिल के किसी एक कोने में यह आशंका उन्हें लंबे समय से थी, जो आज सच होकर उनके सामने खड़ी थी। उन्होंने जज से अपील की कि उन्हें फैसले की कॉपी जितनी जल्दी संभव हो, मुहैया कराई जाए ताकि वे उच्च अदालतों में अपील कर सकें।

आखिरकार मीडिया के कैमरों और पत्रकारों की भारी भीड़ के साथ बिहार की राजनीति का यह शोमैन दोपहर को जेल भेज दिया गया। हालांकि लालू पहली दफा जेल नहीं गए हैं, इसके पहले वे 1997 और 2001 में भी जेल जा चुके हैं लेकिन इस बार उनके चेहरे पर उदासी झलक रही थी। वे शांत थे। शायद उन्हें अपने परिवार और पार्टी के अस्तित्व की चिंता थी। अदालत का फैसला सुनने के फारैन बाद उन्होंने अपने छोटे बेटे तेजस्वी के मोबाइल से अपनी पत्नी राबड़ी देवी से बात की और कहा कि घबराने की कोई बात नहीं। मगर उनके माथे पर पसीना दिख रहा था। पसीना पोंछते हुए वहां मौजूद पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं का हाथ हिलाकर अभिवादन किया मानो आश्वस्त कर रहे हो कि चिंता मत करना। और शायद यही ऊपरी भरोसा दिखाने के लिए रांची जेल के गेट पर उन्होंने एक सिपाही से तंबाकू बनाकर खिलाने को कहा।

राजद के मुखिया लालू प्रसाद यादव बिहार की राजनीति में लगभग दो दशकों तक छाए रहे हैं। हर राजनीतिक समीकरण उन्हें ही केंद्र में रखकर बनता-बिगड़ता रहा है। जब वे 1990 में बिहार की गद्दी पर पहली बार आए तो उन्हें सामाजिक न्याय का मसीहा कहा गया और उनके जैसा जनसमर्थन शायद ही किसी नेता को हासिल हुआ हो। उनकी देहाती चतुराई, मुहावरेबाजी, नाटकीयता और सहज मिट्टी का स्वभाव उनके समर्थकों के लिए चुंबक की तरह था। इस तरह लालू बिहार के स्वघोषित राजा बन गए थे। वे अपनी सरकार कई बार अपने आधिकारिक निवास पर आम के पेड़ के नीचे लुंगी और गंजी में चलाते थे, कई बार वे सड़क के किनारे और गांव में भी बैठकर सरकारी कामकाज निपटाते रहते थे। देश के लोगों और मीडिया में कुर्ता-पाजामा, सफेद चप्पल, अपनी अलग हेयर स्टाइल, बेंत की कुर्सी पर बैठे नींबू की चाय की चुस्की लेते उनकी छवि प्रसिद्ध हो गई थी। उनकी रंग-बिरंगी शख्सियत और राजनीतिक चतुराई का डंका देश के कोने-कोने में बजने लगा था और देखते-देखते करिश्माई लालू प्रसाद हिंदी पट्टी के बेजोड़ नेता बन गए थे। लालू ने अपने चुनावी वर्चस्व के लिए एक नया सामाजिक, राजनीतिक समीकरण तैयार किया। इसे वे एमवाई (मुस्लिम-यादव) गठजोड़ कहते थे। इस तरह बिहार में 15 प्रतिशत मुसलमानों और 14 प्रतिशत यादवों के बल पर वे पंद्रह साल तक लगातार राज करते रहे, चाहे खुद या फिर अपनी पत्नी राबड़ी देवी के जरिये। वह दौर ऐसा था जब उन्होंने अपने महा लाठी रैलियों में ऐलान कर दिया था कि उन्हें बीस साल तक राज करने का ठेका मिला हुआ है।

लालू की राजनीतिक यात्रा
• 1948 (11 जून) जन्म (फुलवरिया, जिला-गोपालगंज, बिहार)
• 1970 महासचिव (छात्रसंघ, पटना विश्वविद्यालय)
• 1977 सांसद, (सारण, जनता पार्टी)
• 1980-1989 विधानसभा सदस्य (दो बार)
• 1989 नेता, प्रतिपक्ष (बिहार विधान परिषद)
• 1989 सांसद (दूसरी बार)
• 1990-95 सदस्य, बिहार विधान परिषद
• 1990-97 मुख्यमंत्री, बिहार
• 1995-98 सदस्य, बिहार विधान परिषद
• 1997 राष्ट्रीय जनता दल का गठन (जनता दल से अलग होकर)
• 1998 सांसद (तीसरी बार)
• 1998-99 सदस्य, सामान्य प्रायोजन समिति (आंतरिक मामलों की समिति, सदस्य, कंस्यूलेटिव कमिटी (सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय)
• 2004 सांसद (चौथी बार)
• 2004 रेल मंत्री, भारत सरकार
• 2009 सांसद (पांचवीं बार)
हालांकि 1996 में पहली बार लालू झटका खाते लगे, जब करोड़ों रुपये का चारा घोटाला उजागर हुआ। अगले साल 1997 में वे जेल में भेज दिए गए, लेकिन उन्होंने मुख्यमंत्री की गद्दी पर राबड़ी देवी को बिठा दिया और उनके जरिये सरकार चलाते रहे। 2001 में फिर उन्हें जेल जाना पड़ा, लेकिन वे राजकाज अपनी ही स्टाइल में चलाते रहे। तब लालू की बात ही कानून थी और लालू की मर्जी ही विधायिका थी। उन वर्षों में बिहार परेशान होता रहा। उसे अंधकार का क्षेत्र कहा जाने लगा और जंगल राज स्थापित हो गया। सरकार तंत्र का कहीं कोई निशान नहीं रह गया था।
अपने मसखरेपन के लिए पहचाने जाने वाले लालू यादव राजनीति के महारथियों में शुमार किए जाते हैं। सड़क हो या संसद, गंभीर मुद्दों पर उनका मसखरापन माहौल को हल्का बनाने के लिए काफी होता था। लालू यादव के दिए कुछ ऐसे वक्तव्य, जो आज भी लोगों के चेहरे पर मुस्कुराहट बिखेर देते हैं।

• जब तक समोसे रहेगा आलू, बिहार में रहेगा लालू (बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान)
• मैं बिहार की सड़कों को हेमा मालिनी की गाल की तरह बना दूंगा। (बिहार के सड़कों की जर्जर स्थिति के बारे में पूछे गए एक प्रश्र के जवाब में)
• अगर हेमा मालिनी मेरी फैन हैं तो मैं उनका एयरकंडीशनर हूं। (एक पत्रकार द्वारा यह बताए जाने पर कि हेमा मालिनी आपकी फैन हैं)
• भारतीय रेल का दायित्व भगवान विश्वकर्मा पर है। इसलिए यात्रियों की सुरक्षा का दायित्व उनका है, मेरा नहीं। मैं उनके काम को संभालने के लिए विवश हूं। (रेल हादसों की बढ़ती संख्या पर)
• मैं बहुत काम करता हूं। अगर मुझे सुविधाएं नहीं मिलीं तो मैं पागल हो जाऊंगा। (विशेष कोच में यात्रा करने के आलोचना पर)
• अगर गाय को पूरी तरह नहीं दुहेंगे तो वह बीमार पड़ जाएगी। (रेलवे को फायदे में लाने पर)
• मेरी मां हमेशा कहा करती थी कि भैंस को पूंछ से नहीं, सिंग की तरफ से पकड़ो। और इस पाठ को रेलवे सहित अपनी जिंदगी में हर जगह इस्तेमाल किया। (यूपीए सरकार में रेलमंत्री रहने के दौरान)
• पूरी दुनिया के लोग जानना चाहते हैं कि एक ग्वाला का बेटा इतनी ऊंचाई पर कैसे पहुंच गया। मुझ में लोगों की इतनी रुचि, भारतीय लोकतंत्र की जीत है। (एक प्रश्र के जवाब में)
• नरेन्द्र मोदी अगले कुछ दिनों में पागल हो जाएंगे। हमारे देश के प्रधानमंत्री बनने के लिए वे पागल हुए जा रहे हैं। (पिछले साल सितंबर में छत्तीसगढ़ में आयोजित एक रैली में)
• डकैती तो होता रहता है। (रेलवे में बढ़ती चोरी की घटना पर)

2005 में जदयू और भाजपा ने हाथ मिलाकर नया राजनीतिक समीकरण तैयार किया और लालू प्रसाद को गद्दी गंवानी पड़ी। इस नए समीकरण से बिहार में लालू का अभेद्य गढ़ धराशायी हो गया। उनके एमवाई समीकरण में भी दरारें आ गईं। लेकिन वे अपने यादव जनाधार के बूते रेल मंत्री बने। उस दौर में भी बिहार की राजनीति के वे धुरी बने रहे।

लेकिन अब क्या होगा? पहले जब भी वे जेल गए। उनकी सत्ता उनके साथ थी लेकिन इस बार वे जेल के भीतर से अपनी पार्टी और राजनैतिक गतिविधियों को संचालित नहीं कर सकते। कुछ लोग अब कहने लगे हैं कि राजद और लालू प्रसाद के दिन लद गए। हालांकि कुछ यह भी आगाह करते हैं कि अभी उनको समाप्त मान लेना जोखिम भरा है। कुछ का कहना है कि वे फिर जोर-शोर से लौटकर आएंगे। फिर भी बिहार की राजनीति को गहराई से परखने वाले राजनीतिक पर्यवेक्षकों और पंडितों का यह तो मानना है ही कि लालू प्रसाद को अब गहरा झटका लगा है और शायद वे इस झटके से न भी उबर पाए। इस बीच बिहार की राजनीति में एक बार फिर नए सामाजिक समीकरण बनने-बिगडऩे शुरू हो गए हैं। राजद के महराजगंज से सांसद प्रभुनाथ सिंह कहते हैं, ‘हम और मजबूत होकर आएंगे। जब-जब हमारे नेता लालू प्रसाद जेल गए हैं। पार्टी का चुनावी प्रदर्शन और बेहतर हुआ है। इस बार भी ऐसा ही होगा।’ प्रभुनाथ सिंह की हाल ही में उप चुनाव में जीत से पार्टी को पिछले आठ साल में सबसे अधिक मजबूती मिली थी। पार्टी के ही वैशाली से सांसद रघुवंश प्रसाद सिंह ने कहा कि पार्टी में थोड़ी निराशा जरूर है, लेकिन हम हताश नहीं हुए हैं। वे कहते हैं, ‘अब हर पार्टी कार्यकर्ता लालू प्रसाद बन जाएगा। जब हमारे नेता मुश्किल में हैं तो हम उतनी ही ताकत से वापस आएंगे।’ राजद की चर्चाओं पर गौर करें तो लालू प्रसाद की गैरमौजूदगी में पार्टी के संचालन के लिए राबड़ी देवी और बेटे तेजस्वी को मिलाकर एक कमेटी बनेगी, जिसका नेतृत्व रघुवंश प्रसाद सिंह करेंगे।

लेकिन लालू के वारिश तेजस्वी का कुछ और ही कहना था। वे उनके साथ जेल के दरवाजे तक गए थे। वे कहते हैं, ‘मुझे समझ में नहीं आता कि यह बात कहां से उभरी थी कि पार्टी की अगुआई कौन करेगा जबकि हमारे नेता अभी हैं। हमें न्यायपालिका में पूरा विश्वास है। हम ऊपरी अदालतों में अपील करेंगे और हमारे नेता लालू प्रसाद जी फिर बाहर आएंगे।’ लालू हाल के दिनों में तेजस्वी को अपने राजनैतिक उत्तराधिकारी के रूप में तैयार करने लगे थे। क्रिकेटर से राजनीति में आए लालू के बेटे भी राज्य के हर कोने का दौरा करने लगे और लोगों से मिलने लगे। बहरहाल उनकी मां और बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी कुछ और संकेत देती हैं। उन्होंने कहा कि हम मां-बेटे उसी तरह पार्टी को चलाएंगे जैसे मैडम सोनिया गांधी अपने बेटे राहुल गांधी को साथ लेकर चलाती हैं।

एक समय लालू के सहयोगी रहे, अब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अदालत के फैसले पर कोई टिप्पणी तो नहीं की, लेकिन उनकी पार्टी के अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह ने कहा कि अदालत के इस फैसले से ताकतवर राजनीतिक नेताओं को भी सबक मिलेगा। चारा घोटाले के एक याचिकाकर्ता जदयू के नेता राजीव रंजन उर्फ लल्लन सिंह ने कहा कि अदालत के फैसले से अब यह साबित हो गया कि लालू प्रसाद ने करोड़ों रुपयों के घोटाले की साजिश में हिस्सेदारी की। लल्लन सिंह ने कहा, ‘लालू प्रसाद हम पर, सीबीआई पर भी यह आरोप लगाते रहे हैं कि हमने झूठा आरोप मढ़ा है। अब अदालती फैसले से उनके आरोप गलत साबित हो गए।’

जो भी हो अदालत के फैसले से सबसे ज्यादा खुश भाजपा के नेता लग रहे थे। पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी, जो चारा घोटाले में याचिकाकर्ता भी थे, ने चुटकी ली, ‘बोया पेड़ बबूल का, फूल कहां से होय। जो लालू ने किया उसका फल भुगत रहे हैं।’ मोदी ने इसके लिए सीबीआई के पूर्व अधिकारी यू.एन. बिस्वास को भी मजबूत केस बनाने का श्रेय दिया। बिस्वास अब पश्चिम बंगाल की ममता सरकार में मंत्री हैं।

चारा घोटाला
• 1996 (27 जनवरी) चारा घोटाले का खुलासा। चाईबासा ट्रेजरी से 37.70 करोड़ रुपए की
अवैध निकासी।
• 1996 (11 मार्च) घोटाले की जांच के लिए पटना हाईकोर्ट का सीबीआई को निर्देश।
• 1996 (19 मार्च) सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाईकोर्ट की बेंच को घोटाले की जांच की निगरानी
आदेश।
• 1997 (10 मई) सीबीआई ने राज्यपाल से लालू के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति मांगी।
• 1997 (17 जून) सीबीआई को मुकदमा चलाने की अनुमति मिली।
• 1997 (21 जून) लालू और उनके रिश्तेदारों के घर छापा।
• 1997 (23 जून) लालू और अन्य 55 के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल।
• 1997 (27 जुलाई) लालू पर सीबीआई का शिकंजा।
• 1997 (30 जुलाई) सीबीआई कोर्ट में लालू यादव का समर्पण।
• 1998 (19 अगस्त) लालू यादव और राबड़ी देवी पर आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने का मामला दर्ज।
• 2000 (4 अप्रैल) लालू यादव के खिलाफ आरोप पत्र दर्ज, राबड़ी देवी सह- आरोपी।
• 2000 (5 अप्रैल) लालू यादव और राबड़ी देवी का समर्पण, राबड़ी देवी को जमानत।
• 2000 (9 जून) कोर्ट में लालू के खिलाफ आरोप तय।
• 2001 (अक्टूबर) सुप्रीम कोर्ट ने मामले को झारखंड स्थानांतरित किया। लालू का आत्मसमर्पण।
• 2006 (18 दिसंबर) आय से अधिक संपत्ति मामले में लालू यादव और राबड़ी देवी को क्लीन चिट।
• 2012 (17 मई) सीबीआई की विशेष अदालत ने दुमका कोषागार से 3.13 करोड़ रूपये की निकासी का आरोप तय किया।
• 2013 (17 सितंबर) चारा घोटाले में विशेष अदालत ने फैसला सुरक्षित रखा।
• 2013 (30 सितंबर) लालू यादव दोषी करार।
लेकिन अब राज्य में सबकी जबान पर यह सवाल है कि लालू के इस प्रकरण से अगले आम चुनावों में किस पार्टी को लाभ होगा और उनका यादव वोट बैंक किधर जाएगा? क्या बिहार में नीतीश कुमार के साथ गठजोड़ बनाकर कांग्रेस इससे फायदे में रहेगी? या भाजपा अपने प्रधानमंत्री पद के पिछड़ा उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के नाम पर फायदा उठा ले जाएगी? फिर, लालू के समर्थक मुसलमान मतदाता किस तरफ जाएंगे और क्यों?

भाजपा नेता और पूर्व मंत्री गिरिराज सिंह कहते हैं, ‘जो लोग यह सोचते हैं कि लालू प्रसाद का वोट बैंक दूसरे राजनीतिक दलों की ओर चला जाएगा, उन्हें राजनीतिक हकीकत नहीं मालूम। उनका वोटर उनके साथ ही बना रहेगा।’ एक-दूसरे राजनीतिक नेता भी कुछ-कुछ ऐसा ही कहते हैं, ‘यह कहना कठिन है कि यादव वोट बैंक लालू के पाले से बिछुड़ जाएगा। यादव उनके साथ मजबूती से खड़े हैं और आगे भी बने रहेंगे।’ हालांकि दूसरे राजनैतिक पंडित अभी साफ-साफ कुछ आकलन करने से हिचक रहे हैं। प्रोफेसर नवल किशोर चौधरी कहते हैं, ‘आगे आने वाला समय ही बताएगा कि इस झटके से लालू की पारी खत्म हो गई या वह और मजबूती से उभरेंगे। हालांकि इसमें दो राय नहीं है कि यह उनके राजनैतिक कैरियर में सबसे बड़ा झटका है।’ लालू की राजनीति से लंबे समय से परिचित एक वरिष्ठ पत्रकार का मानना है कि लालू राजनीतिक रूप से खत्म हो गए। वे कहते हैं, ‘वे अपनी पार्टी में अकेले नेता हैं जो वोटरों को आकर्षित कर सकते हैं। लंबे समय तक उनकी गैरमौजूदगी से जदयू जैसी पार्टियों को अपना आधार बढ़ाने में मदद मिलेगी।’

बहरहाल, रांची जेल की कोठरी में पड़े लालू प्रसाद को चार से सात साल के बीच कुछ भी सजा हो सकती है, इससे उनकी लोकसभा सदस्यता भी खत्म हो सकती है। और जेल में वे वापसी की उम्मीद ही कर सकते हैं। उनके राजनीतिक जीवन का अंत कह देना निश्चित रूप से अभी जोखिमभरा है। कौन जानता है, वे फिर बाहर निकलें और कहने लगें, दोस्तो पिक्चर अभी बाकी है।

 

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