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बोलो, किसकी लाठी बड़ी!

कानून के लंबे हाथ आखिरकार राजद नेता और सांसद लालू प्रसाद यादव तक पहुंच ही गए। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) प्रमुख लालू प्रसाद यादव को सीबीआई की अदालत ने अपने फैसले में अन्य 44 लोगों के साथ चारा घोटाले में दोषी पाया है जिसके बाद बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री को रांची की जेल में भेज दिया गया। यह कुछ ऐसे विरले उदाहरणों मे है जब किसी राजनेता को किसी घोटाले में सजा सुनाई गई हो। और राहुल गांधी द्वारा सजा पाए सांसदों और विधायकों की अयोग्यता को खत्म करने के संदर्भ में लाए गए अध्यादेश के नाटकीय विरोध के बाद सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का पहला शिकार लालू के होने की ही संभावना है। इससे राजनीति के अपराधीकरण का मुकाबला करने के लिए कानून बनाए जाने की जरूरत का औचित्य साबित होता है। लेकिन न्याय में 17 साल लग गए। और वर्तमान परिदृश्य में राजनीति में भ्रष्ट राजनेताओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। सिर्फ एक बिहार के दबंग को सजा मिलना काफी नहीं है। ऐसे भ्रष्ट राजनेताओं को भी सजा मिलनी चाहिए जिनके खिलाफ विभिन्न अदालतों में लंबे समय से मुकदमे लटके हुए हैं। चारा घोटाले के मामले में विशेष अदालत के फैसले से आम आदमी के इस विश्वास को बल मिलता है कि न्यायपालिका ही देश की रक्षक है। 1990 से 2005 तक लालू प्रसाद यादव और उनकी पार्टी ने बिहार को सबसे खराब सरकार दी।

दरअसल, इस सरकार के जमाने को ‘जंगल राज’ कहा जाता रहा है। बिहार में अनेक ऐसे मामले हुए हैं जिनमें राजनेताओं और अफसरों ने इस राज्य की संपत्ति को लूटकर अपने घर भरे हैं। लालू प्रसाद यादव के राज में कुशासन, भ्रष्टाचार और अपहरण का बोलबाला था। लालू प्रसाद यादव जैसे लोगों की वजह से विकास के पैमाने पर यह राज्य वैसे ही पारंपरिक रूप से पिछड़ा रहा है। लेकिन लालू का पतन भी उनके उदय की ही तरह नाटकीय रहा। मई 1997 से ही लालू की गर्दन सीबीआई के हाथों में थी। उसी साल उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था और पद से हटने पर मजबूर कर दिया गया था। उस समय पार्टी में उनका कोई उत्तराधिकारी नहीं था। उनकी पत्नी को मुख्यमंत्री बना दिया गया था और जाति आधारित राज्य में उन्हें इस पद पर स्वीकार भी कर लिया था। फिर 2005 में मतदाताओं ने उनके राज को एक जोर का झटका दिया लेकिन लालू केंद्र में मंत्री बन गए। लेकिन आखिरकार कानून की जीत हुई।

हालांकि लालू प्रसाद यादव के खिलाफ आए इस फैसले का स्वागत होना चाहिए लेकिन इसे यहां तक आने में 17 साल का लंबा समय लग गया। इस देरी के लिए कई कारक जिम्मेवार हैं। एक तो न्यायिक प्रक्रिया में कई छेद हैं जिनका इस्तेमाल लालू प्रसाद यादव ने किया, इन छेदों को बंद किया जाना चाहिए। विभिन्न समय में शासक दल पर आए संकटों के चक्कर में उन्होंने राजनीतिक दखल का भी इस्तेमाल किया। न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने में अब भी काफी लंबा रास्ता तय किया जाना है। लालू प्रसाद यादव ऊपर की अदालतों में जा सकते हैं। इस देश के लोग इस तरह की लंबी खिंचनेवाली न्यायिक प्रक्रिया से ऊब गए हैं। यह गरीब देश अब इसका बोझ नहीं उठा सकता। उम्मीद की जा सकती है कि लालू प्रसाद के मामले में कानूनी लड़ाई के आगे के कदम ज्यादा तेजी से उठाए जा सकेंगे। एक साल में इन अपराधियों को सजा मिल सकेगी। उम्मीद की जा सकती है कि बाकी मामलों में भी इन्साफ जल्दी हो सकेगा और जिन लालची राजनेताओं व अफसरों ने देश का पैसा लूटा है, उसे उनसे वसूला जा सकेगा। यह उन लोगों के लिए एक उदाहरण बन जाना चाहिए जिनके ऊपर इसी तरह के आरोप हैं। और यह भी अफसोस की बात है कि ऐसे भ्रष्ट लोगों को बचाने के लिए यूपीए सरकार एक अध्यादेश ले आई थी। मैं यह पूछना चाहता हूं, क्यों सरकार अपवित्र राजनीतिक हिस्सेदारी के कारण ऐसी बातें मान लेती है कि पूरी व्यवस्था ही चरमरा जाती है। यह सवाल हर भारतीय के मन में उठना चाहिए। मेरे ख्याल से सरकार के पास इसका कोई जवाब नहीं है सिवाय इसके कि इस अध्यादेश को बकवास बताते हुए राहुल गांधी अचानक अवतरित हो गए। यह कहना उचित नहीं होगा कि राहुल गांधी की घुड़की की वजह से सजा प्राप्त नेताओं के लिए लाया जाने वाला यह अध्यादेश अपनी नियति को प्राप्त हुआ। इससे पहले राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने तीन केंद्रीय मंत्रियों को बुलाकर अपनी असहमति के साफ संकेत दे दिए थे जब उन्होंने उनसे पूछा था कि इस अध्यादेश को लाने की इतनी भी क्या जल्दी है। मेरे ख्याल से राष्ट्रपति के इस संकेत के बाद ही राहुल गांधी ने अपना नैतिक आधार बनाने के लिए जनता के बीच आकर यह घुड़की दी। अब हमें दूर देश से लौट कर आए अपने प्रधानमंत्री से पूछना चाहिए कि वे और उनके मंत्रिमंडल के सदस्य क्यों भ्रष्टों और अपराधियों को बचाने की कोशिश कर रहे थे।

इसके अलावा, सीबीआई, जिसका इस्तेमाल सरकार अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ एक हथियार के रूप में करती है, इस तरह की देरी का कारण बनती है। केंद्र सरकार विश्वसनीयता के संकट से गुजरते हुए भी इस तरह के अध्यादेश ला रही है। ऐसे में अगर हम भ्रष्टाचारमुक्त भारत का सपना देखते हैं तो इसके लिए एक नवजागरण की जरूरत होगी। लोकतंत्र के मजबूत खंबों में एक खंबा न्याय का भी है। चुने हुए प्रतिनिधि संसदीय लोकतंत्र के वाहक होते हैं। यह धारणा कि राजनेता कुछ भी करने के बाद बच सकते हैं, तो यह लोकतंत्र और इसकी संस्थाओं को नुकसान ही पहुंचाती है। आम लोगों के विश्वासों और न्यायिक सजा के बीच का अंतर कम होना लोकतंत्र की सेहत सुधरने के लक्षण हैं।इसके अलावा, सीबीआई, जिसका इस्तेमाल सरकार अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ एक हथियार के रूप में करती है, इस तरह की देरी का कारण बनती है। केंद्र सरकार विश्वसनीयता के संकट से गुजरते हुए भी इस तरह के अध्यादेश ला रही है। ऐसे में अगर हम भ्रष्टाचारमुक्त भारत का सपना देखते हैं तो इसके लिए एक नवजागरण की जरूरत होगी। लोकतंत्र के मजबूत खंबों में एक खंबा न्याय का भी है। चुने हुए प्रतिनिधि संसदीय लोकतंत्र के वाहक होते हैं। यह धारणा कि राजनेता कुछ भी करने के बाद बच सकते हैं, तो यह लोकतंत्र और इसकी संस्थाओं को नुकसान ही पहुंचाती है। आम लोगों के विश्वासों और न्यायिक सजा के बीच का अंतर कम होना लोकतंत्र की सेहत सुधरने के लक्षण हैं।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

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