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औरतों की यातनाओं को वाणी

दामोदर खड़से की कहानियां पढ़कर लगता है कि वह अपने समाज, परिवेश और जीवन से उदासीन नहीं हैं। वह स्थितियों का विश्लेषण कर उन वजहों की खोज करते हैं, जिनके कारण समाज में विषमताएं बढ़ रही हैं। मानवीय मूल्यों का विघटन आखिर क्यों हो रहा है, आदमी-आदमी के बीच अविश्वास की खाई क्यों बढ़ रही है, दामोदर खड़से की कहानियां ऐसे ही सवालों का जवाब तलाशते हुए जीवन के प्रति पाठक को सकारात्मक दृष्टिïकोण सौंपती हैं। इन कहानियों में घर-परिवार के लोग हैं, समाज है, देश-काल है, और है समकालीन भारत का परिवेश। इनके पात्र ऐसे हैं, जो हमसे खुद ही बोलने-बतियाने लगते हैं। किसी भी लेखक के लिए यह गर्व की बात होती है कि उसके पात्र अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व हासिल कर लें। हाल ही में दामोदर खड़से की ‘संपूर्ण कहानियां’ का प्रकाशन हुआ है, जिसमें इनकी साठ कहानियां संग्रहीत हैं। इन कहानियों में भटकते कोलंबस, फिरौती, तेंदुआ, गाज, सुबह तो हुई, बगुले, सीढिय़ों के बीच तथा छड़ी जैसी इनकी महत्वपूर्ण और चर्चित कहानियां शामिल हैं, जिनकी चर्चा पत्र-पत्रिकाओं के आलोचनात्मक लेखों में होती रही है।

इनकी कहानी ‘फिरौती’ में बताया गया है कि सत्ता में बैठे लोग डाकू-लुटेरों से कम नहीं। वे भी लूटते हैं। लूटने का उनका तरीका जरा भिन्न होता है। ‘तेंदुआ’ इनकी एक प्रतीकात्मक कहानी है, जो बताती है कि खूंखार तेंदुए जंगल में ही नहीं, समाज में भी घात लगाकर बैठे हैं। मुंबई में अक्सर होने वाली जानलेवा बारिश से जुड़ी कई कहानियां खड़से ने लिखी हैं। ‘गाज’ में झोपड़पट्टी में रहने वाली औरत की कथा है, जिसे इस बात की चिंता नहीं कि पटरियां पानी में डूबी हुई हैं और ट्रेनें घंटों से रुकी पड़ी हैं। वह तो खुश है कि उसे ऊपर वाले की दया से पीने का शुद्ध पानी मिल रहा है। ‘सुबह तो हुई’ में बारिश में फंसी तीन स्त्रियों के भय, ऊहापोह और आशंकाएं चित्रित हुई हैं। इनकी एक और कहानी ‘साहब कब आएंगे’ में एक गरीब और सीधी-साधी औरत की दारुण यातना को वाणी मिली है, जिसमें उसके आगे कुछ टुकड़े फेंककर लोग स्वार्थ की पूर्ति के लिए उसका इस्तेमाल करते रहते हैं।

दामोदर खड़से की कहानी ‘बगुले’ उन लंपट अधिकारियों की कथा है, जो बड़ी बेशर्मी से महिला सहकर्मियों को अपनी हवस का शिकार बना लेते हैं। ‘सीढिय़ों के बीच’ मनुष्य के भीतर बैठे उस राक्षस की कथा है, जो उसे दुष्कर्म के लिए प्रेरित करता रहता है। ‘रेत की प्यास’ विश्वास-अविश्वास पर टिके पति-पत्नी संबंधों को प्रत्यक्ष करती है, तो ‘छड़ी’ पिता की पवित्र स्मृति कथा-सी बन गयी है। दामोदर खड़से की कहानियां जटिलता से मुक्त ऐसी कहानियां हैं, जिनका शिल्प सहज है और भाषा अत्यंत सरल है। इनके जरिये वह बड़ी-बड़ी बातें कह जाते हैं।

दामोदर खड़से को समग्रता में पेश करने की कोशिश सुनील देवधर और राजेंद्र श्रीवास्तव ने ‘कागज की जमीन पर’ जैसे ग्रंथ के जरिए की है। डॉ. खड़से की अन्य महत्वपूर्ण कहानियों में ‘आखिर वह एक नदी थी’, ‘जन्मांतर गाथा’, ‘पार्टनर’, ‘अंधी सुरंग’, ‘रेत की प्यास’, ‘जाने-अनजाने’, ‘दंगे’, ‘सवा सेर’ तथा ‘पिछले दिनों बहुत कुछ घटा है’ के नाम लिए जा सकते हैं।

 बलराम

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