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आज भी गणतंत्र की स्थापना का स्वप्न अधूरा क्यों…?

आज भी गणतंत्र की स्थापना का स्वप्न अधूरा क्यों…?

By अनामिका प्रकाश श्रीवास्तव

भारतीय राष्ट्र के सम्मान, स्वाभिमान और स्वतंत्रता का प्रतीक वर्ष गणतंत्र दिवस (26 जनवरी) अपनी एक और सालगिरह मनाने फिर आ गया है। इस पुनीत पर्व पर दिल्ली के ऐतिहासिक राजपथ पर देश के प्रथम नागरिक महामहिम राष्ट्रपति गर्वोन्नत हो सैनिक सलामी ले रहे हैं, हषोल्लास से विविध प्रांतों की संस्कृति झलकाती झांकियां जनता का मन मोह रही हैं, स्कूली बच्चों के उत्साह और उमंग की अलग ही बानगी देखने को मिल रही है और राजपथ पर विविध मॉडल्स के जरिये जनता सैन्य सुरक्षा का जायजा ले रही है।

कुल मिलाकर पूर्ण आजादी के अमृतपान का प्रतीक दिवस है 26 जनवरी। इस दिन हमने अधूरी आजादी की त्रासदी से मुक्ति पाई और अपने देश की जनता के हित चिन्तन को ध्यान में रखकर बनाये गये संविधान को लागू किया।

संविधान निर्माण उन राज पुरोधाओं ने किया था, जिन्होंने गुलामी की दहशत और बेबसी झेली थी। जिन्हें अंग्रेजों के काले कानूनों ने कदम-कदम पर यंत्रणा के सौ-सौ जख्म दिये थे। इसलिए आजाद भारत के रूप में उन्होंने इतनी लचीली कानून-व्यवस्था लागू करने की ठानी, जिससे देश का कोई भी व्यक्ति अन्याय का शिकार न होने पाये।

लेकिन शनै: शनै: सत्ता और कानून का हस्तांतरण एक ऐसी पीढ़ी के जिम्मे होने लगा जिसने खोया कुछ भी नहीं, पाया ही पाया। दासता की पीड़ा का उन्हें सिद्धांत रूप में भी भान न था। ऐसे लोगों के हाथों में कानून की बागडोर ने हमारे गणतंत्र की नींव हिला दी है और वह कभी भी भरभरा कर गिरने को तैयार है।

आज किसी भी राष्ट्रीय पर्व पर आयोजित समारोह की चमक-दमक और राजनेताओं के खोखले वादे-इरादों को देख-सुनकर औसत दर्जे के पढ़े-लिखे आदमी की प्रतिक्रिया इतनी तीखी और नकारात्मक होती है कि उसका वश चले तो वह सारी व्यवस्था को ही बदल डाले।

सवाल यह है कि आजादी का अद्र्धशतक भी पार न करने वाले हमारे गणतंत्र को ऐसा कौन सा घुन लग गया कि वह अंदर ही अंदर खोखला होता गया। क्यों एक अजीब किस्म की असुरक्षा, दहशत और असमंजस के माहौल में आदमी जी रहा है। प्रशासनिक और राजनीतिक दमन का खौफ क्यों इस कदर बढ़ रहा है कि आदमी के मौलिक अधिकार तक उससे प्रभावित हो रहे हैं? सम्मान से जीने की हकदार नारी आज बहुत कुछ पा लेने के बाद भी क्यों अव्यक्त कुंठा, असुरक्षा और बेचैनी का अनुभव कर रही है? क्यों सिसकियों में डूबा बचपन बाल मजदूरों के रूप में शोषित हो रहा है?

दिलचस्प इतिहास है राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा का…

07-02-2015

किसी भी देश की जनता के लिए अपने देश का राष्ट्रीय ध्वज  सबसे अधिक गौरव का प्रतीक होता है। वह अपने राष्ट्रीय ध्वज को गौरव आदर, श्रद्धा एवं सम्मान का स्थान देता है। अपने देश का इतिहास झण्डे की रक्षा, गौरव एवं सम्मान करने के तथ्यों से भरा हुआ है।

झण्डा पवित्रता, त्याग, बलिदान और राष्ट्रीय सम्मान के रूप में भावनाओं के भव्य रंग का छोटा सा कपड़ा है जिसके उन्नत स्थल पर स्थिति से महानता और सम्मान, फहराने से चेतना और उत्साह एवं जिनके डण्डे एवं रस्सी से राष्ट्र की प्रतिभा सम्पन्नता और शक्ति का समन्वित आधार साबित होता है। यह झंडा हमारी  शक्ति, हमारी चेतना का और हमारी दृढ़ता का संदेश गुंजाता रहेगा। यह झंडा हमारे त्याग, साहस, बलिदान और हमारी आशाओं का केन्द्रीभूत आकार है।

भारतीय राष्ट्रीय झंडे के निर्माण में फ्रांस के राष्ट्रीय झंडे का बहुत बड़ा हाथ रहा है। भारतीयों ने अपने राष्ट्रीय झंडे से प्रेरणा ली है। आधुनिक भारत का पहला झंडा 1906 ई. में कलकत्ता के ग्रीन पार्क में फहराया गया था। इस झंडे में हरे, पीले और लाल रंग की तीन पट्टियां थीं। सबसे ऊपर की पट्टी पर आठ श्वेत कमल एक ही पंक्ति में छपे हुए थे। पीली पट्टी पर गहरे नीले रंग से ‘वंदेमातरम्’ शब्द लिखा हुआ था। लाल रंग की पट्टी पर बायीं ओर एक श्वेत रंग का सूर्य और दायीं आरे दूज का चांद एवं उसके ऊपर एक तारा बना हुआ था। दूसरा झंडा भी इसी तरह का था, जिसे मैडम भीकाजी कामा ने बनाया था उसमें पट्टियां क्रमवार थीं और ऊपर बायीं ओर छोटा-सा यूनियन जैक तथा उनके नीचे सप्तर्षि के सात तारे अंकित थे। आंदोलन के समाप्त होते ही यह झण्डा भी लोगों की स्मृति से विलीन हो गया। 1917 के बाद देश की राजनीतिक परिस्थिति में शीघ्रता के साथ बदलाव आया।

सन् 1920-21 के अहिंसात्मक सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा आंदोलन के समय महात्मा गांधी ने झंडे की आवश्यकता महसूस की और 1926 में गांधी जी द्वारा राष्ट्रीय तिरंगे का चौथा पुनरजन्म हुआ। जुलाई 1931 ई. में कांग्रेस ने राष्ट्रीय तिरंगे झंडे को स्वीकार किया और इस झंडे में केसरिया,सफेद तथा हरा रंग क्रम से समाहित किया गया। मध्य की सफेद पट्टी पर नीले रंग में चर्खी अंकित की गयी।

राष्ट्रीय झंडे की लम्बाई और चौड़ाई का अनुपात 3:2 का था। यह झंडा स्वतंत्रता प्राप्ति तक राष्ट्रीय झंडे के रूप में रहा। देश स्वतंत्र होने के पूर्व 22 जुलाई 1947 को भारत की संविधान सभा ने इसी तिरंगे झंडे को कुछ बदलाव के साथ देश के राष्ट्रीय झंडे के रूप में स्वीकार कर लिया और 14 अगस्त 1947 को संविधान सभा ने रात्रिकालीन अधिवेशन में यह झंडा राष्ट्र को समर्पित किया। इसमें चर्खे की जगह चक्र परिवर्तित कर दिया गया। यह चक्र सारनाथ के सिंह स्तम्भ वाले धर्म चक्र की बनावट का है। इसमें चौबीस तीलियां हैं। गहरा केसरिया रंग जागृति, शौर्य और त्याग का प्रतीक, सफेद रंग-सत्य एवं पवित्रता का सूचक था, हरा रंग-वीरता एवं श्रद्धा का प्रतीक है, नीला चक्र- धर्म तथा ईमानदारी के रास्ते पर चलकर देश की उन्नति की ओर ले जाने की प्रेरणा देता है। स्वदेशी भावना तथा आंदोलन के परिणामस्वरूप झंडे का कपड़ा खद्दर ही चुना गया।

राष्ट्रीय तिरंगा फहराने के संबंध में भारत सरकार ने कुछ नियम बनाये हैं जिनका पालन करना हम भारतीय नागरिकों का परम कर्तव्य एवं धर्म है –

राष्ट्रीय तिरंगा फहराने के समय यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि राष्ट्रीय झंडे के दाहिनी ओर और इसके ऊपर कोई अन्य झंडा न फहर रहा हो। झंडे को लिटाकर या झुकाकर नहीं ले जाना चाहिए। जुलूस में तिरंगा ध्वजवाहक के दायें कंधे पर रहना चाहिए। भवन आदि पर डंडे के सहारे ध्वज फहराना हो तो केसरिया भाग ऊपर रहना चाहिए।

आज भी और भविष्य में भी हमारा झंडा उन्नत शिखर पर फहराते हुए हमारी शक्ति, दृढ़ कर्तव्य-निष्ठा और स्वाधीनता की प्रतिज्ञा याद दिलाता रहेगा। एकता, रचनात्मक कार्यक्रम के रास्ते पर अहिंसा और सत्य का आधार लिए हुए भारतवासी एक के बाद दूसरी परंपरा को झंडे के रूप में अपनी थाती सौंपते जाएंगे।

07-02-2015

ऐसे हजार-हजार प्रश्न हैं जो आज हमारी गणतंत्रीय व्यवस्था के लिए अनुत्तरित यक्ष-प्रश्न बन गये हैं। इन हजार-हजार प्रश्नों की जड़ में एक ही कारण छिपा नजर आता है स्वार्थ की अंधी दौड़ और सत्ता का मद।

यूं तो सांस्कृतिक अवमूल्यन के दौर से सारा विश्व ही त्रस्त है, लेकिन अपने देश में यह अवमूल्यन कुछ ज्यादा ही मुखर हो रहा है। व्यक्ति के सांस्कृतिक और नैतिक पतन की मिसालें जहां-तहां बिखरी पड़ी हैं।

शहीदों का बलिदान इन मदांध नेताओं के मद तले दबा-कुचला जा रहा है। भारतीय गणतंत्र अपने उद्देश्य से एकदम विपरीत दिशा की ओर मुड़ रहा है। परिणामस्वरूप नागरिक जीवन अस्त-व्यस्त हो गया है।

चिंतन के धरातल पर अजीब किस्म की विचार शून्यता और रिक्तता व्यथित कर रही है। ऐसा कोई नाम शायद आज नहीं जो नि:स्वार्थ भाव से केवल हित-चिंतन की सोचे और जिसके कहने का कोई अर्थ हो।

बहुभाषी, बहुधर्मी इस देश के धर्म और भाषाओं की खिल्ली सत्ता पक्ष के गलियारों में सरेआम उड़ाई जा रही है, धर्म के नाम पर राजनीति का क्षुद्र खेल खुलकर खेला जा रहा है। गणतंत्र के 7 दशक में ही अम्बेडकर और गांधी राजनीति के कठघरे में खड़े कर दिये गये हैं, उन्हीं तथाकथित राजनेताओं द्वारा जिन्हें देश की बागडोर सौंपी गयी थी। दो अलग-अलग ध्रुवों पर खड़े होने के बावजूद दोनों ही राष्ट्र उन्नायक एक ही सोच के पक्षधर थे, लेकिन अपने-अपने पाले वोट खींचने की खातिर नेताओं ने इन्हें भी कट्टर बना दिया। काश आज वे मौजूद होते तो समझाते…।

संविधान में जो कुछ भी सिद्धान्त रूप में मौजूद था उस पर यदि उचित प्रकार से अमल किया जाता तो आजादी की अद्र्धशताब्दी पर करते-न-करते हम संभवत: विकसित राष्ट्र की श्रेणी में गिने जाने लगते, लेकिन संविधान के नियम, कायदे और कानूनों की खिल्ली उड़ाने वाले छोटे-बड़े नेता अपनी तिजोरियों को ही भरने की चिंता में सारी ऊर्जा होम कर देते हैं।

एक प्रभुता सम्पन्न गणतंत्र के मूलाधार होते हैं, उसकी व्यवस्थित संसद, न्यायपालिका और संघीय व्यवस्था। ये घटक जितने अनुशासित, सुदृढ़ और व्यवस्थित होंगे उतना ही गणतन्त्र का आधार मजबूत होगा, लेकिन आज इन घटकों में दरार नहीं खाईयां पड़ चुकी हैं जिन्हें पाटना नामुमकिन हो गया है। जिस संसद में सारे देश के लिए कायदे-कानून बनाये जाते हैं, वही राजनेताओं के बीच में जूते-चप्पल चल जाते हैं और नैतिकता की सारी परिभाषाएं बेमानी सिद्ध हो जाती हैं। अपने काले कारनामों को छिपाने के लिए सत्तारूढ़ दलों द्वारा अक्सर कानूनी फेरबदल कर सभी वर्जनाएं ताक पर रख दी जाती हैं। गणतंत्र दिवस का सबसे महत्वपूर्ण घटक (संसद) जब ऐसी चाल चलने लगे तो मुल्क किस ओर जाएगा कोई भी सोच-समझ सकता है।

संविधान निर्माताओं ने भले ही न्यायपालिका को व्यवस्थापिका या कार्यपालिका के बंधन में नहीं रखा है, लेकिन सत्तारूढ़ दल का अव्यक्त वर्चस्व सदैव ही न्यायपालिका पर रहा है और गाहे-बगाहे उसका दुरूपयोग होता ही रहा है।

07-02-2015

संविधान में वर्णित विभिन्न धाराओं को तोड़-मरोड़कर सत्तारूढ़ दल ने देश की संघीय व्यवस्था को निरंतर कमजोर किया है। बीते सालों में ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं जब केंद्र ने जरूरी न होते हुए भी अपने पार्टीगत स्वार्थों के खातिर राज्यों में राष्ट्रपति शासन द्वारा पर्याप्त दखल दिया और कभी बर्खास्तगी बहुत जरूरी होते हुए भी राज्य सरकार को अभय दान दे दिया। मीडिया को गणतंत्र या लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है और संविधान के मुताबिक संचार माध्यमों को किसी भी सरकारी दबाव में रखना गैर कानूनी है, लेकिन प्रत्यक्ष तौर पर सबसे अधिक दुरूपयोग टी.वी. और रेडियो जैसे माध्यम का ही हुआ है और जनता का किसी भी रूप में इस पर रत्ती भर विश्वास नहीं रहा।

निष्कर्ष रूप में यही कहा जा सकता है कि हमने आज से 65 वर्ष पहले जिस संविधान के माध्यम से एक प्रभुतासंपन्न गणतंत्र की  स्थापना  के  स्वप्न को साकार किया था, वह बिखर गया है। हमने उस संविधान में वर्णित सभी कायदे-कानून और धाराओं को तोड़-मरोड़कर छिन्न-भिन्न कर दिया है और सही मायनों में एक अराजक सत्ता के हाथों की कठपुतली बन गये हैं।

राष्ट्रीय पर्वों पर समारोह तो आयोजित होते ही रहेंगे और होते रहने भी चाहिए, लेकिन उनका तब तक क्या औचित्य जब तक मुल्क की जनता बिना किसी दहशत और असुरक्षा के सुकून से अपना गुजर-बसर न कर सके।кремовые румянакупить доску для рисования

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