ब्रेकिंग न्यूज़ 

चीड़ की पत्तियों से तैयार होगा कोयला आरती एकहिती समूह- कमाह ने विकसित की अनूठी तकनीक

आरती एकहिती समूह – कमाह ने चीड़ की पत्तियों से कोयला तैयार करके रोजमर्रा में प्रयोग किए जाने वाले ईंधन के लिए नई तकनीक के विकास की अनूठी पहल की गई है। इससे जहां रसोई गैस की खपत कम होगी, वहीं वनों पर बढ़ते ईंधन का दबाव भी कम होगा और वन में बेकार पड़ी चीड़ की पत्तियों का भी सदुपयोग होगा। पच्छाद तहसील के गांव बजगा की 16 महिलाओं द्वारा गठित आरती एकहिति समूह-कमाह ने विभिन्न जीविकोपार्जन तकनीक को अपनाकर जहां स्वावलंबन की ओर कदम बढ़ाया है, वहीं पर यह समूह अन्य महिलाओं के लिए एक प्रेरणास्रोत बन गया है।

मध्य हिमालय जलागम विकास परियोजना के सौजन्य से इस स्वयं सहायता समूह की महिलाओं ने चीड़ की पत्तियों से कोयला बनाने की नई तकनीक विकसित की है। समूह की प्रधान जयवंती एवं सचिव कमलेश शर्मा ने बताया कि इससे पहले उनका समूह केंचुआ खाद तैयार कर रहा था। समूह ने 50 ङ्क्षक्वटल से अधिक केंचुआ खाद तैयार करके रेणुका वन मण्डल को भेजा, जिससे समूह की 16 महिलाओं को काफी लाभ पहुंचा है।

मध्य हिमालय जलागम विकास परियोजना के मण्डलीय अधिकारी एस.आर. राणा के मार्गदर्शन मंम समूह की महिलाओं को उतराखंड के ग्राम्या परियोजना, टीहरी के कौशल पंचायत में भ्रमण एवं प्रशिक्षण पर भेजा गया। वहां चीड़ की पत्तियों से महिलाओं द्वारा तैयार कोयला बनाने की विधि की जानकारी प्राप्त की और वापस आकर परियोजना अधिकारी ने इस समूह को कोयला बनाने की एक मशीन, चार चारिंग डम, सोलह स्टाक चुल्हें एवं अन्य सामान उपलब्ध करवाने के साथ एक दिन का प्रशिक्षण भी दिया।

चीड़ की पत्तियों को ऑक्सीजन रहित जलाकर कोयला तैयार किया जाता है तथा एक क्विंटल कोयले में दस किलो गोबर का घोल मिलाया जाता है। इसके उपरान्त कोयले को तीन दिन सुखाकर इसका उपयोग ईंधन के रूप में रसोई में किया जा सकता है। एक किलोग्राम कोयला 60 से 90 मीनट तक आंच देता है और 50 किलो कोयला एक रसोई गैस सिलेण्डर के बराबर कार्य करता है। समूह की महिलाएं घर के रोजमर्रा कार्यों से निपटने के बाद चीड़ की पत्तियों को एकत्रित करके मशीन के द्वारा कोयला तैयार करती है।

परियोजना की आजीविकाकर्ता रीना शर्मा के अनुसार, जहां इस तकनीक से वनों को गर्मियों के मौसम में अचानक लगने वाली आग से बचाया जा सकेगा, वहीं पर्यावरण संरक्षण की दिशा में यह अहम पहल होगी। इसके अतिरिक्त ईंधन के लिए वनों की कटाई पर भी अंकुश लगेगा और समय व श्रम की भी बचत होगी। उन्होंने बताया कि इस कोयले के जलने से नीली धुंआरहित लौ निकलती है, जिससे धुएं से स्वास्थ्य पर कोई दुष्प्रभाव नही पड़ता है।

मण्डलीय परियोजना अधिकारी एस.आर. राणा के अनुसार एक किलो कोयले में 5885 किलो कैलरी होती है। यह योजना काफी कारगर सिद्घ हो रही है। परियोजना द्वारा इस समूह को अपना स्वरोजगार आरंभ करने के लिए 90 प्रतिशत अनुदान दिया जाता है, जबकि 10 प्रतिशत हिस्सा महिलाओं द्वारा स्वयं वहन किया जाता है।

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में जिस प्रकार ग्रामीण क्षेत्र की महिलाएं रूढि़वादिता की चारदीवारी से बाहर निकलकर पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ रही हैं, इससे प्रतित होता है कि निकट भविष्य में महिलाएं आत्मसम्मान के साथ स्वावलंबी बनकर स्वस्थ समाज की नींव को और मजबूत करेंगी।

проверка позиции сайтаооо полигон киев

Leave a Reply

Your email address will not be published.