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संपूर्ण ‘मां’ थीं लीला चिटणिस

मां के रूप में लीला चिटणिस ने हिंदी सिनेमा को एक ऐसा मानक चरित्र दिया, जो आज भी रूपहले परदे पर साकार किया जाता है। उनके साथ मां की भूमिकाओं में ललिता पवार और दुर्गा खोटे ने भी अपनी पहचान बनाई, लेकिन लीला चिटणिस वाला जादू वे नहीं बिखेर सकीं। देविका रानी के बाद बॉम्बे टॉकीज की सबसे सफल हीरोइन रही है लीला चिटणिस। लीला चिटणिस ने इनके लिए नायिका के रूप में चार फिल्में की थीं और चारों ही सफल रही थीं। लीला चिटणिस का जन्म कर्नाटक के धारवाड़ जिले में हुआ था। उनके पिता अंग्रेजी के प्रोफेसर थे और ब्रह्म समाज को मानने वालों में से थे। उनकी एक थिएटर कंपनी थी मन्वंतर। लीला चिटणिस भी उसमें काम करने लगीं। उन्होंने 1934 में मराठी नाटक ‘उसना नवरा’ में काम करके अपने अभिनय की शुरुआत की। फिर ‘उदयाचा संसार’ में काम किया। 15 बरस की उम्र में उन्होंने अपने से काफी अधिक उम्र के डॉ. गजानन यशवंत चिटणिस से शादी कर ली। उनके चार बच्चे हुए। यह दंपती भारत के स्वाधीनता संग्राम का समर्थक था और गिरफ्तारी के खतरे के बावजूद उन्होंने वामपंथी क्रांतिकारी मानवेंद्रनाथ राय को शरण दी।

तलाक के बाद लीला चिटणिस ने नाटकों में काम करने के साथ-साथ स्कूल अध्यापिका का काम भी ले लिया। फिल्मों में उन्होंने शुरुआत ‘सागर मूवीटोन’ में एक्स्ट्रा के रूप में की और बाद में 1937 में उसी कंपनी की फिल्म ‘जेंटलमैन डाकू’ में काम किया। इस फिल्म में वह पुरुषों जैसी पोशाक में दिखीं। इस बीच लीला चिटणिस ने मास्टर विनायक की फिल्म छाया (1936) में एक ऐसी औरत की भूमिका की थी, जो उस समय अपने प्रेमी को छोड़ देती है जब उसे पता चलता है कि उसके पिता चोरी के अपराध में जेल गए हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया ने उनकी तारीफ में उन्हें महाराष्ट्र की पहली ग्रेजुएट सोसायटी लेडी बताया था। उन्होंने पुणे के प्रभात पिक्चर्स और रंजीत मूवीटोन की कुछ फिल्मों में बतौर नायिका भी काम किया था। रंजीत मूवीटोन की फिल्म ‘संत तुलसीदास’ (1939) में रत्नावली की भूमिका की।
लेकिन उनकी असली पहचान तब बनी, जब बॉम्बे टॉकीज की देविका रानी की नजर उन पर पड़ी। देविका रानी ने उन्हें पहली भूमिका दी फिल्म ‘कंगन’ (1939) में अशोक कुमार के साथ। यह जोड़ी बहुत लोकप्रिय हुई और बॉम्बे टॉकीज ने इसके साथ तीन और फिल्में आजाद (1940), बंधन (1940) और झूला (1941) बनाई। नायिका के रूप में यह उनके फिल्मी करिअर का सबसे अच्छा समय था। 1940 के दशक के मध्य तक आते-आते उनका जादू खत्म हो गया था और 1944 में अशोक कुमार के साथ बनी उनकी फिल्म ‘किरण’ असफल रही थी।

इसके बाद का दौर लीला चिटणिस का मां की भूमिका का है, जो 1948 में फिल्मिस्तान की फिल्म ‘शहीद’ से शुरू हुआ था। इसमें लीला चिटणिस ने दिलीप कुमार की मां की भूमिका निभाई थी। मां के रूप में लीला चिटणिस ने हिंदी सिनेमा को एक ऐसा मानक दिया, जो आज भी अपनाया जाता है। हालांकि उनके साथ-साथ मां की भूमिकाओं में ललिता पवार और दुर्गा खोटे ने भी अपनी पहचान बनाई, लेकिन लीला चिटणिस वाला जादू वे नहीं बिखेर सकीं। ललिता पवार में एक कठोर अनुशासन वाली या फिर थोड़ी नकारात्मक छवि वाली मां दिखाई देती है, जबकि दुर्गा खोटे के साथ शुरू से ही एक आभिजात्य नजर आता है। लीला चिटणिस इन दोनों के विपरीत प्यार और दुलार से भरपूर मां हैं और मां के अलावा कुछ नहीं हैं।

लीला चिटणिस को बिमल रॉय ने अपनी फिल्म मां (1952) में शीर्षक भूमिका दी। राज कपूर की आवारा (1953), दिलीप कुमार की गंगा-जमुना (1961) और देव आनंद की गाइड (1965) में लीला चिटणिस ने अपने समय के इन तीन दिग्गज सितारों की मां की भूमिका निभाई है। देव आनंद की ज्यादातर फिल्मों में मां की भूमिका लीला चिटणिस ने ही निभाई है। इनके बाद के दौर की मां की भूमिका अपनाने वाली अचला सचदेव, सुलोचना, कामिनी कौशल और निरूपा रॉय ने भी मां की भूमिका करते हुए इन्हीं की शैली को अपनाया।

बॉम्बे टॉकीज की सबसे सफल फिल्म की बात अगर की जाए तो वह किस्मत (1943) थी। इसका निर्देशन ज्ञान मुखर्जी ने किया था और इसमें अशोक कुमार के साथ मुमताज शांति थी, जो उस समय तक दो फिल्में, बसंत (1942) और सवाल (1943) कर चुकी थीं, लेकिन उनकी ज्यादा पहचान नहीं बनी थी। हालांकि इस फिल्म में पूरी कहानी के केंद्र में अशोक कुमार ही थे, लेकिन मुमताज शांति को जो भी सीन मिले उनमें उन्होंने छाप छोड़ी। इस फिल्म का गाना ‘आज हिमालय की चोटी से दुश्मन को ललकारा है, दूर हटो ऐ दुनियावालो, हिंदुस्तान हमारा है’ मुमताज शांति पर ही फिल्माया गया था। उस जमाने में एक क्रांतिकारी कदम था। विश्वयुद्ध का समय था और दुश्मन को दूर हटने के लिए कहना अंग्रेज सरकार के प्रति सीधा विद्रोह था। सेंसर को यह कहकर चुप करा दिया गया था कि दूर हटने के लिए जापानियों से कहा जा रहा है, जो भारत की पूर्वी सीमा तक पहुंच गए थे। मुमताज शांति ने इस फिल्म में एक अपाहिज लड़की, शांति की भूमिका निभाई थी और पूरी फिल्म में बैसाखी के सहारे चलती रही। अपने करिअर की शुरुआत में ऐसी चुनौतीपूर्ण भूमिकाएं स्वीकार करना आज भी किसी नई अभिनेत्री के लिए आसान नहीं होता। मुमताज शांति की पहली फिल्म ‘बसंत’ थी, जिसमें मधुबाला ने उसके बचपन की भूमिका निभाई थी। इसमें एक और हीरोइन प्रमिला ने भी काम किया था। मुमताज शांति की महत्वपूर्ण फिल्मों में दिलीप कुमार के ‘साथ घर की इज्जत’ (1948) का उल्लेख भी किया जा सकता है। इसका निर्देशन राम दरियानी ने किया था। तब दिलीप कुमार एक नए कलाकार थे, लेकिन ‘शहीद’, ‘मेला’ आदि फिल्में देकर अपनी जगह बना चुके थे। बाद में मुमताज शांति पाकिस्तान चली गईं, जहां 1993-94 के आसपास गुमनामी की मौत मर गईं।

दिलीप कुमार को भी देविका रानी ने फिल्म ‘ज्वार भाटा’ (1944) में मौका दिया था। हालांकि उस फिल्म में मुख्य भूमिका में आगा और हीरोइन मृदुला थी, जिसे एक अमीर आदमी अपनी मंगेतर समझ लेता है, लेकिन वह एक दूसरे आदमी से प्यार करती है। इस दूसरे आदमी की भूमिका में दिलीप कुमार थे। बॉम्बे टॉकीज की महत्वपूर्ण हीरोइनों की परंपरा में मीना कुमारी का नाम भी आता है। मधुबाला कमाल अमरोही के निर्देशन में बनने वाली बॉम्बे टॉकीज की सर्वाधिक चर्चित फिल्मों में से एक, महल (1949) में अशोक कुमार की हीरेाइन रह चुकी हैं। मीना कुमारी ने बॉम्बे टॉकीज से बनी आखिरी फिल्म ‘तमाशा’ (1952) में अशोक कुमार और देव आनंद की नायिका बनी थी।

हिमांशु रॉय के दाएं हाथ, शशिधर मुखर्जी के बीच दूरियां बढ़ रही थीं और 1943 में उन्होंने अशोक कुमार, ज्ञान मुखर्जी और राय बहादुर चुन्नीलाला के साथ फिल्मिस्तान की नींव रखी। लेकिन देविका रानी बॉम्बे टॉकीज के लिए फिल्में बनाती रहीं। 1954 में बॉम्बे टॉकीज को आर्थिक संकट से गुजरना पड़ा और बाद में उसे बंद कर दिया गया।

सुरेश उनियाल

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