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सौभाग्य का महापर्व करवा चौथ

करवा चौथ के व्रत को करक चतुर्थी भी कहते हैं। यह व्रत सुहागिन स्त्रियां अपने स्वस्थ और दीर्घायु सुहाग की कामना के साथ करती हैं। अविवाहित लड़कियां सुन्दर, स्वस्थ एवं भाग्यशाली पति की प्राप्ति की कामना के लिए यह व्रत रखती हैं। इसमें कष्टविनाशक गणपति की विधि एवं अनुष्ठानपूर्वक पूजा की जाती है।

सुहागिनों के अखंड सुहाग एवं सौभाग्य का प्रतीक है करवा चौथ। देवों के देव भगवान आशुतोष की लीला अपरम्पार रही है। कहते हैं कि एक बार शिव पुत्रों, श्री कार्तिकेय तथा श्री गणेश के बीच एक स्पर्धा हुई कि ब्रह्मांड के तीन चक्कर सबसे पहले कौन लगा पाता है। कार्तिकेय अपने वाहन, मयूर पर सवार होकर पृथ्वी की परिक्रमा करते रहे, जबकि सिद्धि विनायक लंबोदर भगवान अपने माता-पिता, भोले शंकर तथा पार्वती के ही तीन चक्कर लगा लिए। उनका मानना था कि माता-पिता के ही चरणों में इस संसार का समस्त लोक बसता है और यदि उन्होंने अपने पूज्य माता-पिता के ही चारों तरफ घूम लिया तो इसका अर्थ यह हुआ कि समस्त जगत की परिक्रमा संपन्न हो गई। श्रीगणेश की बुद्धि तथा विवेक की इस कुशाग्रता पर भोले शंकर तथा मां पार्वती प्रसन्न हुए और उन्हें आशीर्वाद दिया कि किसी भी पूजा, यज्ञ या अनुष्ठान के पूर्व, सबसे पहले गणेश की ही पूजा होगी। तभी से किसी पूजा में सबसे पहले श्रीगणेश की ही पूजा करने की परंपरा का शुभारम्भ हुआ। सौभाग्यवती तथा सुहागिन स्त्रियों के द्वारा करवा चौथ का व्रत भी मंगलकारी तथा कष्टविनाशक भगवान श्रीगणेश जी की पूजा से जुड़ा हुआ है। करवा चौथ के व्रत को करक चतुर्थी भी कहते हैं। यह व्रत सुहागिन स्त्रियां करती हैं। वैसे अविवाहित लड़कियां भी सुन्दर, स्वस्थ एवं भाग्यशाली पति की प्राप्ति की कामना में यह व्रत रखती हैं। मान्यता यह भी है कि इस व्रत के पूजन से स्त्रियों के सुहाग की उम्र लम्बी होती है तथा उनका जीवन निष्कंटक बना रहता है। धन-दौलत की बेशुमार वृद्धि होती है तथा जीवन में कोई कष्ट नहीं रह जाता है। दाम्पत्य जीवन सुखमय तथा दीर्घायु होता है। इस व्रत को कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाए जाने के कारण ही यह करवा चौथ कहलाता है। इस दिन सुहागिन स्त्रियां श्रीगणेश का अनुष्ठानपूर्वक पूजा करती हैं। धार्मिक भाव तथा विधानपूर्वक निराहार तथा निर्जला व्रत रखा जाता है। चूंकि श्रीगणेशजी विघ्न-विनाशक एवं मंगलकारी भगवान हैं, अत: किसी भी अनुष्ठान की सफल पूर्णाहुति के लिए सर्वप्रथम मोदकप्रिय श्रीगणेश भगवान की पूजा करने की परम्परा रही है। यही कारण है कि करवा चौथ के इस पावन अवसर पर भी अपने सुहाग-सिन्दूर की चिरंजीवी होने के लिए की गयी प्रार्थना में भी सबसे पहले श्रीगणेश भगवान की ही आराधना होती है।

इस व्रत के दिन व्रतधारिणी विवाहित महिलाएं दिन-भर निराहार रहकर भगवान श्रीगणेश की समर्पित होकर पूजा करती हैं तथा सुमिरन करती हैं। रात्रि में चन्द्रोदय के बाद ही व्रत का समापन करती हैं। व्रत के दिन घर के दीवाल को गोबर से लीपा जाता है, जिस पर श्रीगणेश जी, माता पार्वती, भगवान भोले शंकर तथा अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं बनायी जाती हैं। इस पर एक बरगद का पेड़ तथा एक मानवाकृति भी बनाई जाती है। इस मानवाकृति के हाथ में एक चलनी होती है। दीवाल पर उगते हुए चांद की प्रतिमा भी बनाई जाती है। जिस दीवाल पर ये सब प्रतिमाएं बनायी जाती हैं, उनके नीचे दो करवों में जल भरकर रखा जाता है। करवा मूल रूप से तांबा, पीतल या मिट्टी से निर्मित ऐसे पात्र होते हैं, जिनमें जल डालने के लिए टोंटियां बनी होती हैं। करवे के गले में कलावा लपेटा जाता है तथा इसका सिन्दूर से लेप कर सिन्दूर का पांच जगह टेक किया जाता है। करवे की टोटी में सरई नाम के घास की सिंक लगाई जाती है, जिसे सौभाग्य का द्योतक माना जाता है। करवे के ऊपर कटोरा रखा जाता है, जो चावल तथा सुपारी से भरा होता है। इस अवसर पर चावल के आटे, घी एवं शक्कर को मिलाकर लड्डू बनाया जाता है, जिसे शक्करपिंडी भी कहते हैं। इसके अतिरिक्त सिंघाड़ा, केला, नारंगी, गन्ना तथा मौसमी फलों के साथ भी इस व्रत में आराध्य देव की पूजा की जाती है। पुड़ी-खीर के अतिरिक्त चावल के आटे में उड़द की पिट्ठी भरकर एक विशेष प्रकार का व्यंजन बनाया जाता है, जिसे फारा कहते हैं। यह विशेष प्रकार का मिष्ठान्न जीवन में शुभकारी माना जाता है। करवा व्रत की कथा का व्रतधारिणी महिलाएं मनोयोगपूर्वक तथा भक्ति-भाव से श्रवण करती हैं तथा अपने सुहाग की लम्बी उम्र की प्रार्थना करती हैं। पूजा के इसी क्रम में करवों का स्थान की अदला-बदला कर, बांयी ओर के करवे को दांयी ओर तथा दांयी ओर के करवे को बांयी ओर बदलते हैं। इसे करवा फेरना कहते हैं। इस प्रकार श्री गणेशजी के पूजन से व्रतधारिणी अपने मनोवांछित कामनाओं के साकार होने की प्रार्थना करती हैं।
एक पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार एक साहूकार की पत्नी, उनकी सात बहुएं तथा उनकी एक पुत्री ने करवा चौथ का व्रत किया। संध्या के समय में श्रीगणेशजी की पूजा के उपरांत जब साहूकार के पुत्र रात्रि का भोजन करने लगे तो उन भाइयों ने अपनी बहन को भी भोजन करने के लिए कहा। लेकिन बहन ने यह कहते हुए भोजन करने से इंकार कर दिया कि जब तक वो चन्द्रमा का दर्शन नहीं कर लेतीं तब तक वो अन्न-जल कुछ भी ग्रहण नहीं करेंगी। इस इंकार को देखकर सभी सात भाइयों ने अपने घर के बाहर आग जला दीं तथा उसकी लौ को चलनी से देखते हुए कहा कि चंद्रोदय हो गया है, इसीलिए अब अन्न-जल ग्रहण कर लेने में कोई दोष नहीं है। किन्तु सभी बहुएं अपने पतियों की इस चालबाजी को भली-भांति समझती थीं, इसीलिए उन लोगों ने तब भी भोजन करने से इंकार कर दिया। किन्तु कन्या बहन भोजन करने लगी। कन्या के इस प्रकार विधिपूर्वक व्रत का समापन किये बिना अन्न-जल ग्रहण कर लेने के कारण श्रीगणेश जी काफी क्रोधित हुए तथा उनके कोप के कारण उस कन्या का पति कई जानलेवा बीमारियों से ग्रसित हो गया। दिन-प्रति-दिन उसका धन-वैभव खत्म होने लगा। उस कन्या पर मानो दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। हर रोज नई-नई मुसीबतों का सामना करना होता था। उसे समझ में नहीं आता था कि इस विपत्ति की घड़ी में उसका कौन उद्धार करेगा।
सोच-समझकर शीघ्र ही कन्या ने फिर अगले वर्ष करवा चौथ का अनुष्ठान पूरी तरह से विधिपूर्वक रखा। भक्तिभाव की सच्चाई तथा श्रद्धा से भगवान श्रीगणेश का पूजन किया तथा चन्द्रमा के दर्शन करने के बाद ही अन्न-जल ग्रहण किया। उसकी इस भक्ति से अत्यंत प्रसन्न होकर श्रीगणेश भगवान ने उस कन्या के सभी कष्ट हर लिए तथा उसका पति पुन: भला-चंगा हो गया। धन-संपत्ति पुन: घर में बहुरने लगा और जीवन की सारी खुशियां एक-एक कर वापस होती गयीं।

करवा चौथ की कथा का श्रवण करने के उपरान्त चंद्रोदय होने पर घी के दीप जलाकर चन्द्रदेव को अघ्र्य अर्पण किया जाता है। ‘ऊं चन्द्राय नम:’ के मंत्र का जाप करते हुए चंद्रदेव का अघ्र्य किया जाता है। ऐसा भी माना जाता है कि चंद्रदेव के अघ्र्य के बाद व्रतधारिणी सुहागिनें अपने पतियों को उदित चन्द्रमा के सामने खड़ी होकर चलनी से देखती हैं तथा उनके स्वस्थ एवं चिरंजीवी जीवन की कामना करती हैं।

 

श्रीप्रकाश शर्मा

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