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भारत-पाक रिश्ता और दाऊद

दाऊद को पकड़वाना नवाज के बूते की बात नहीं है, क्योंकि पाक सेना और आईएसआई से दाऊद के गहरे रिश्ते हैं। कभी मुंबई की चाल में रहने वाला दाऊद आज एक मामूली तस्कर नहीं, बहुत बड़ा आतंकवादी बन चुका है। अल कायदा और तालिबान से उसके गहरे रिश्ते हैं। उनकी गतिविधियों के लिए वह पैसा और अन्य सुविधाएं मुहैया कराता है।

किस्सा करीब बारह बरस पुराना है। पाकिस्तानी आतंकवादियों ने 13 दिसंबर 2001 को नई दिल्ली में संसद भवन पर हमला कर भारत सरकार को सीधे चुनौती दी थी। इस हमले से देश में भारी रोष के कारण पश्चिमी सीमा पर सेना को युद्ध की स्थिति का सामना करने को तैनात किया जा चुका था। स्थिति विस्फोटक थी। दुनिया के सामने पड़ोसी देश की काली करतूत का कच्चा- चिट्ठा रखने के लिए भारत सरकार ने कूटनीतिक अभियान छेड़ दिया था। इसी सिलसिले में हमारे अधिकारियों ने वाशिंगटन में अमेरिका की तत्कालीन विदेश मंत्री कोंडलिजा राईस और रक्षा मंत्री कॉलिन पावेल से मुलाकात की। पाकिस्तान में बैठकर भारत विरोधी गतिविधियां चला रहे 20 आतंकवादियों की सूची अमेरिकी सरकार को भी दी गई। भारत चाहता था कि सभी आतंकवादियों को उसे सौंपा जाए ताकि देश के कानून के अनुसार उनके खिलाफ कार्रवाई की जा सके। इन आतंकवादियों की सूची में पहला नाम दाऊद इब्राहिम का था, जो 1993 के मुंबई विस्फोट के बाद दुबई से भागकर पाकिस्तान चला गया था और वहां बैठकर पड़ोसी देश की खुफिया एजेंसी आईएसआई के सहयोग से भारत विरोधी गतिविधियां चला रहा था। अमेरिका के दबाव में पाकिस्तान दाऊद को कुछ शर्तों के साथ भारत को सौंपने को राजी हो गया, लेकिन कुछ दिन बाद ही अडंग़ेबाजी शुरू हो गई। तत्कालीन वाजपेयी सरकार के गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी के अनुसार मामला ठंडा पड़ते ही अमेरिकी सरकार पलट गई। दाऊद के प्रत्यर्पण पर बहानेबाजी शुरू हो गई। अफसरशाही का रवैया भी सहयोगी नहीं था। बात आई गई हो गई और दाऊद का कारोबार बदस्तूर चलता रहा। हमारे देश को इस घटना की आज तक कीमत चुकानी पड़ रही है।

सीमा पर भारत के पांच सैनिकों की निर्मम हत्या के बाद, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के विशेष दूत शहरयार खान ने लंदन में पत्रकारों को यह कह कर चौंका दिया कि दाऊद उनके देश से खदेड़ा जा चुका है और संभवत: अब संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में है। पड़ोसी देश के किसी प्रवक्ता ने पहली बार औपचारिक तौर पर अपने यहां दाऊद की मौजूदगी को माना है। हालांकि 24 घंटे बाद शहरयार अपने बयान से पलटी मार गए, लेकिन तीर तो कमान से निकल चुकी थी। सैनिकों की हत्या के बाद आज फिर भारत में पाकिस्तान के खिलाफ जन-आक्रोश चरम पर है। मनमोहन सिंह सरकार पर पड़ोसी देश से बातचीत के सारे द्वार बंद करने के लिए दबाव डाला जा रहा है। उधर, हाल ही में सत्ता में आए नवाज शरीफ अपनी साख के लिए भारत से वार्ता का सिलसिला जोडऩा चाहते हैं। शायद उनके इशारे पर ही शहरयार ने दाऊद से जुड़ा बयान देकर आपसी तनाव कम करने का प्रयास किया, लेकिन बाद में सेना और दहशतगर्दों के दबाव में पलट गए।
आज पाकिस्तान गहरे आर्थिक संकट में घिरा है। बिजली की कमी से देश के उद्योग-धंधे और विकास का चक्का थमा हुआ है। मई महीने में चुनाव जीतकर नवाज शरीफ ने तीसरी बार प्रधानमंत्री की कुर्सी पाई है। चुनावों से पहले और बाद में वह भारत के साथ रिश्ते सुधारने के लंबे-चौड़े दावे करते आए हैं। उनकी नीयत पर शक न कर उनकी मजबूरी को समझा जाना चाहिए। शरीफ को पता है कि भारत से रिश्ते अच्छे बनाकर ही पाकिस्तान अपने आर्थिक संकट से निकलने के लिए दुनिया से जरूरी कर्जा जुटा सकता है। मजबूरी यह है कि सत्ता का असली केंद्र आज भी पाकिस्तानी फौज है। रक्षा और विदेश नीति में निर्वाचित सरकार का दखल न के बराबर है। पाकिस्तानी फौज और आईएसआई के हुक्मरान किसी भी सूरत में हिंदुस्तान से अच्छे रिश्ते रखने के कायल नहीं हैं। यदि रिश्ते अच्छे हो जाएं तो सेना की सत्ता पर पकड़ ढीली हो जाएगी और चुनी हुई सरकार ताकतवर बन जाएगी। इसीलिए पाक सेना और उसके इशारे पर नाचने वाले आतंकवादी संगठन निरंतर भारत के भीतर और सीमा पर हमले करते रहते हैं। उन्हें पता है कि हमलों से आपसी रिश्ते सामान्य बनाने की प्रक्रिया को गहरा धक्का पहुंचेगा और बातचीत का द्वार बंद हो जाएगा। हाल ही में सीमा पर 5 भारतीय सैनिकों की हत्या और पिछली जनवरी में दो सिपाहियों को मारने की घटना पाक सेना की सोची-समझी रणनीति का एक हिस्सा है। इसी रणनीति के तहत अमेरिका में मनमोहन-नवाज वार्ता को पलीता लगाने के लिए जम्मू के केरन सेक्टर में पाकिस्तानी सैनिकों और आतंकवादियों ने जमावड़ा लगा दिया और घुसपैठ की कोशिश की।
नवाज शरीफ सरकार के पास दाऊद का शगूफा छोडऩे के अलावा अन्य विकल्प नहीं था। नवाज को पता है कि दाऊद का नाम भारत की जनता के लिए घृणा का पर्याय है। उसे अपने देश से भगा देने या पकड़वाने में मदद का भरोसा दिलाकर वह मौजूदा तनाव को कुछ कम कर सकते हैं। वैसे, दाऊद को पकड़वाना उनके बूते की बात नहीं है, क्योंकि पाक सेना और आईएसआई से दाऊद के गहरे रिश्ते हैं। कभी मुंबई की चाल में रहने वाला दाऊद आज एक मामूली तस्कर नहीं, बहुत बड़ा आतंकवादी बन चुका है। अल कायदा और तालिबान से उसके गहरे रिश्ते हैं। उनकी गतिविधियों के लिए वह पैसा और अन्य सुविधाएं मुहैया कराता है। जाली करेंसी, हवाला, तस्करी, नशीले पदार्थों की सप्लाई, हथियारों की आपूर्ति, बॉलीवुड सहित कई माध्यमों से कालाधन को सफेद करने और क्रिकेट मैच फिक्स करने का उसका अरबों रुपयों का कारोबार दक्षिण एशिया, मध्य-पूर्व, अफ्रीका ही नहीं, यूरोपीय देशों तक फैला है। उसकी ताकत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि संकट में फंसने पर पाकिस्तान के बैंकों ने उसके आगे हाथ पसारा था। दुनिया के कुख्यात अपराधियों की सूची में उसका नाम चौथे स्थान पर दर्ज है। अमेरिका ने उसके सिर पर इनाम घोषित कर रखा है और इंटरपोल गिरफ्तारी का वारंट जारी कर चुका है। इसके बावजूद उसका काला कारोबार फल-फूल रहा है। भारत सरकार और उसके गुप्तचर संगठन रॉ को वर्षों से दाऊद के कराची और इस्लामाबाद के ठिकानों का पता है, लेकिन उसके सुरक्षा घेरे को आज तक तोड़ा नहीं जा सका है।

शहरयार का यह कहना कि दाऊद संयुक्त अरब अमीरात में हो सकता है, गहरे कूटनीतिक संकेत देता है। अमीरात से भारत के मधुर संबंध हैं और वहां से किसी अपराधी को लाना हमारे अधिकारियों के लिए अधिक कठिन नहीं होगा। मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच 21 नवंबर, 2006 को यूएई से दाऊद गिरोह के 10 लोगों को गिरफ्तार कर भारत ला चुकी है। लेकिन दाऊद के गिरोह के लोगों को पकडऩे और दाऊद को गिरफ्तार करने में जमीन-आसमान का अंतर है। यह अंतर भारत और पाकिस्तान दोनों देश समझते हैं।

दो देशों के कूटनीतिक रिश्ते जन-भावनाओं के आधार पर तय करना दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति ही कही जाएगी। आज पाकिस्तान के खिलाफ कड़े कदम उठाने की मांग करने वाली जमात से दो-टुक पूछा जाना चाहिए कि कड़े कदम से उसका तात्पर्य क्या है? हमारे पास दो ही विकल्प हैं- युद्ध या वार्ता। भारत और पाकिस्तान दोनों परमाणु हथियारों से लैस हैं, ऐसे में युद्ध की कल्पना करना मूर्खता ही मानी जाएगी। दूसरा विकल्प वार्ता का है। वार्ता सशर्त हो सकती है और उसमें दाऊद इब्राहिम और हाफिज सईद के प्रत्यर्पण की शर्त को सख्ती से रखा जा सकता है। यह नहीं भूलना चाहिए की आज पकिस्तान की सेना का बड़ा हिस्सा अफगान सीमा पर तैनात है। तनाव बढऩे पर उसे हटाकर भारत सीमा पर लगा दिया जाएगा, जिसके बाद अफगानिस्तान से खूंखार आतंकवादियों की पाकिस्तान और भारत में आवाजाही आसान हो जाएगी। युद्ध उन्माद फैलाने वालों को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि भारत-पाक के बीच 2003 में हुए समझौते के बाद सीमा पर टकराव की घटनाओं में भारी कमी आई है। जहां 2003 से पहले सीमा पर हर साल 400 से 600 सैनिक शहीद हो जाते थे, वहीं यह संख्या घटकर अब दो अंकों में रह गई है। एक और तथ्य है जिसे नजरअंदाज करना मूर्खता मानी जाएगी। अमेरिकी फौज अगले वर्ष फरवरी माह से अफगानिस्तान से अपने देश लौटने लगेगी। तब वहां आतंकवादियों को काबू में रखना अकेले अफगान सरकार के वश में नहीं होगा। इस काम को भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान मिलकर ही कर सकते हैं। इतना सब जानकर पाकिस्तान से वार्ता के द्वार कैसे बंद किया जा सकता है, यह एक विचारणीय प्रश्र है।

उदय इंडिया ब्यूरो

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