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विधायिका का काम न्यायपालिका के जिम्मे

शायद बहुत कम लोगों को याद होगा कि बिहार के सिवान जिले से कुख्यात लोकसभा सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन केंद्र में देवेगौड़ा सरकार के कार्यकाल में गृह राज्यमंत्री थे और पुलिस महकमा उनके अधीन था। हत्या के अपराध में आज वह जेल में सजा काट रहे हैं। जब शहाबुद्दीन मंत्री थे, तब भी उनके खिलाफ हत्या, अपहरण, गैर-कानूनी हथियार रखने तथा तस्करी जैसे संगीन अपराधों में गैर-जमानती वारंट जारी थे। पिछले एक हफ्ते के भीतर लालू प्रसाद यादव, जगन्नाथ मिश्र, रशीद मसूद को अपराधी घोषित कर अदालत ने जेल की सजा सुनार्ई है। राजनीतिक हलकों में तीनों भारी-भरकम नाम है। लालू और जगन्नाथ मिश्र तो बरसों बिहार के मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं, जबकि रशीद मसूद केंद्र सरकार में कैबिनेट मंत्री पद की शोभा बढ़ाने के अलावा उपराष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ चुके हैं। लगभग दो दशक तक चली लंबी कानूनी लड़ाई के बाद ही लालू, मिश्र और मसूद को सजा हो पायी है। सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के कारण लालू और मसूद को अपनी संसद सदस्यता से भी हाथ धोना पड़ेगा। सजा काटने के छह साल बाद ही वे कोई चुनाव लड़ पायेंगे।

जब सुप्रीम कोर्ट ने सजायाफ्ता सांसदों और विधायकों की सदस्यता समाप्त करने का निर्णय दिया तब अधिकांश राजनीतिक दलों ने खुलकर इसकी आलोचना की थी। केंद्र सरकार ने तो इसे उलटने के लिए अध्यादेश तक जारी कर दिया, लेकिन प्रबल जन-विरोध और आसन्न चुनावों के कारण उसे अपना फैसला वापस लेना पड़ा। दुख की बात यह है कि जो निर्णय सरकार को लेने चाहिए, आज वे अदालत के जरिए आ रहे हैं। न्यायपालिका की सक्रियता पर उंगली उठाने वाली विधायिका और कार्यपालिका की निष्क्रियता का बचाव ही कर रहे हैं। यह कड़वा सच है कि हमारी संसद और विधानसभाओं में अपराधियों और थैलीशाहों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है। यथास्थिति बनाए रखना उनके हित में है, इसलिए चुनाव प्रणाली सुधारने के लिए कोई कदम नहीं उठाया जाता।

जुलाई माह में पहले सर्वोच्च न्यायालय ने अपराधी सांसदों और विधायकों की सदस्यता समाप्त करने का फैसला सुनाया था और फिर सितंबर के अंत में मतदाताओं को चुनाव में खड़े प्रत्याशियों को रिजेक्ट (खारिज) करने का अधिकार दे दिया। इन फैसलों से चुनाव आयोग को शक्ति मिलेगी तथा राजनीति में उच्च नैतिक मूल्यों की वकालत करने वाली बिरादरी को बल। धनबल, बाहुबल और परिवारवाद के कीचड़ में धंसते देश की मौजूदा लोकतांत्रिक व्यवस्था को मुख्य सूचना आयुक्त के एक हालिया आदेश से भी सहारा मिला है। इस आदेश के अनुसार सभी राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार की हद में बांध दिया है। देश का कोई भी नागरिक अब पार्टियों से उनकी आय-व्यय तथा आंतरिक कार्य-प्रणाली के बारे में प्रश्न पूछकर जानकारी जुटा सकता है।

जब राजनीति में पूरी तरह घटाटोप छाया हो तब चुनाव प्रणाली में सुधार और भी जरूरी हो जाता है। देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में जन विश्वास बहाली के लिए तुरंत कुछ कदम उठाए जाने जरूरी हैं। उच्चतम न्यायालय के ताजा आदेश इस दिशा में अच्छी पहल है, लेकिन सड़े सिस्टम को सुधारने के लिए बहुत कुछ किया जाना बाकी है। राइट टू रिजेक्ट का अधिकार तो सुप्रीम कोर्ट से मिल गया है, अब राइट टू रिकॉल लागू करने पर विचार किया जाना चाहिए। न्यायपालिका को अपराधी जन प्रतिनिधियों पर लगे गंभीर आरोपों की सुनवाई के लिए तुरंत फास्ट ट्रैक कोर्ट भी गठित करने चाहिए। जब आरोप लगने के एक साल के भीतर ही फैसला आने लगेगा तभी दागी नेताओं की लगाम कसी जा सकेगी। मिले मत प्रतिशत के आधार पर पार्टियों के विधायक व सांसद विधायक चुने जाने, सत्तारूढ़ पार्टी द्वारा अपनी सरकार का गुणगान करने वाले विज्ञापनों पर रोक लगाने, पेड न्यूज व चुनावी सर्वेक्षणों पर लगाम कसने की भी जरूरत है। चुनाव आयोग लंबे समय से इन सुधारों पर अमल की अनुमति मांग रहा है, लेकिन सरकार कोई न कोई बहाना बनाकर उसकी सिफारिशें दबाए बैठी है। लगता है कि जनता के दबाव और अदालती आदेशों से ही उसके कानों पर जूं रेंगती है।

 

धर्मेंद्रपाल सिंह

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