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समंदर चुनाव का नौका सिद्धांत की

चुनाव को त्यौहार का रूप दिया जाए तो उसके कानून-कायदों को भी ध्यान में रखना जरूरी है। किन्तु सिद्धांतों की नाव पर सवार होकर चुनाव का समंदर पार करने का जमाना शायद बीत गया है। इसलिए सत्ता के गलियारे में घुसपैठ करने के लिए नए-नए तरीके खोजे जा रहे हैं।चुनाव को त्यौहार का रूप दिया जाए तो उसके कानून-कायदों को भी ध्यान में रखना जरूरी है। किन्तु सिद्धांतों की नाव पर सवार होकर चुनाव का समंदर पार करने का जमाना शायद बीत गया है। इसलिए सत्ता के गलियारे में घुसपैठ करने के लिए नए-नए तरीके खोजे जा रहे हैं।

भारतीय राजनीति में तीन प्रकार की शासन-प्रणालियां प्रचिलित रही हैं – ‘एकतंत्र, गणतंत्र और लोकतंत्र’। तीनों प्रणालियों के अपने गुण-दोष हैं। किसी भी प्रणाली को पूर्ण रूप से सही या गलत प्रमाणित करने वाले ठोस आधार अभी उपलब्ध नहीं हैं। वर्तमान में भारतीय शासन-व्यवस्था का संचालन किसी एक व्यक्ति के हाथ में नहीं है। एकतंत्रीय शासन-प्रणाली से पनपी विसंगतियों ने उसको धराशायी बना दिया। भगवान महावीर के युग में यहां गणराज्य व्यवस्था चल रही थी। समय की धूल ने उस व्यवस्था का भी लोप कर दिया। एक समय ऐसा आया, जब भारत की बागडोर विदेशी हाथों में चली गई। कठिन संघर्ष और बलिदान के बाद देश आजाद हुआ। उसके साथ ही यहां लोकतंत्र की बुनियाद रखी गई। लोकतंत्र में किसी व्यक्ति, दल या समूह को परम्परा से सत्ता के शिखर तक पहुंचने का अवसर नहीं मिलता। इस पद्धति के अनुसार सत्ता में जाने वाले व्यक्तियों का चयन होता है। चयन की पूरी प्रक्रिया जनता से जुड़ी हुई है। इस दृष्टि से कहा जाता है कि चुनाव लोकतंत्र है और जनता चुनाव का आधार है।

भारतीय संस्कृति में त्यौहार मनाने की परंपरा प्राचीनकाल से चली आ रही है। यहां त्यौहारों की सूची बहुत लंबी है। हर त्यौहार के अपने कानून-कायदे होते हैं। कानून कायदे न हों तो किसी भी त्यौहार की परंपरा आगे चल ही नहीं सकती। कुछ लोग चुनाव को लोकतंत्र का त्यौहार मानते हैं। चुनाव को त्यौहार का रूप दिया जाए तो उसके कानून-कायदों को भी ध्यान में रखना जरूरी है। किन्तु सिद्धांतों की नाव पर सवार होकर चुनाव का समंदर पार करने का जमाना शायद बीत गया है। इसलिए सत्ता के गलियारे में घुसपैठ करने के लिए नए-नए तरीके खोजे जा रहे हैं।

राष्ट्र-हित और जन-हित की महत्वाकांक्षा, व्यक्ति हित और पार्टी हित के दबाव से नीचे बैठती जा रही है। सेवा के स्थान पर स्वार्थ आसीन हो रहा है। जनता के दु:ख-दर्द को दूर करने के वादे चुनावी घोषणा-पत्र की स्याही, सूखने से पहले ही विस्मृति के गले में टंग जाते हैं। जनता और जन-नेता के बीच आत्मीय रिश्ते स्थापित हों, उससे पहले ही उनमें गहरी दरारें पड़ जाती हैं। ऐसी स्थिति में चुनाव की संस्कृति अपना अर्थ खोती जा रही है।

लोकतंत्रीय शासन-प्रणाली में जनता की सबसे बड़ी संपत्ति है, उसका ‘मत’ (वोट)। ‘मत’ का अर्थ है– ”देश के भविष्य को उज्ज्वल करने के लिए किया गया स्वतंत्र चिंतन’’। जब ‘मत’ के साथ प्रलोभन और भय जुड़ जाता है, तब वह खरीद-फरोख्त की वस्तु, मार-पीट, लूट-खसोट और छीना-झपटी की वस्तु बन जाती है। यह सब क्या है? क्या आजादी की सुरक्षा ऐसे कारनामों से होगी? क्या ये सब देश की जनता के लिए निश्चिंत भविष्य के आश्वासन बन पाएंगे? ऐसे घिनौने तरीकों से विजय पाना और फिर विजय की दुन्दुभि बजाना, क्या यह लोकतंत्र की विजय है? ऐसी विजय से तो हार भी क्या बुरी है?

लोकतंत्र के कानून-कायदों के आधार पर सत्ता के संघर्ष में उतरा हुआ व्यक्ति स्वयं को राजनीति में स्थापित न कर पाए, तो उसका विस्थापित रहना भी अच्छा है। बजाय इसके कि वह अपनी मान-मर्यादा को ताक पर रखकर अनैतिक तरीकों से विजयश्री का वरण करे। इस संदर्भ में एडीसन का अभिमत माननीय है। उन्होंने लिखा है- ‘इज्जत को चोट पंहुचाने की अपेक्षा दस हजार बार मृत्यु को प्राप्त होना उत्तम है।’ गंभीरता से विचार किया जाए तो मौत का सही अर्थ है-‘अपने सिद्धांतों और नीतियों का पटरी से नीचे उतरना।’ जब लोकतंत्र का जनाजा निकल रहा होता है, ऐसे मे नीतिविहीन विजय के बाद किस खुशी में जश्न मनाया जाता है।

संसद देश की सर्वोच्च संस्था होती है। राज्यों में विधानसभाओं की भूमिका अहम होती है। इनमें आने वाले व्यक्ति भी नैतिक मूल्यों की फसल को उखाड़ देंगे तो उनकी सुरक्षा कौन करेगा? बाड़ द्वारा फल खाने की जनश्रुति ऐसे प्रसंगों पर ही सत्य प्रमाणित होती है। सत्ता की परिक्रमा में खड़े व्यक्ति, सत्तासीन हों या विपक्ष के दावेदार, आखिर वे चाहते क्या हैं, वोटों के गलियारों से सत्ता के शिखर पर पहुंचना या लोकतंत्र के आदर्शों की सुरक्षा करना? चुनावों में बरती जा रही धांधली को देखकर तो ऐसा लगता है कि वे घर-घर को मरघट में बदलने की प्रक्रिया अपना रहे हैं।

एक प्रत्याशी किसी गांव में वोट मांगने गया। एक व्यक्ति बोला-‘आपको क्या वोट दें। पिछले चुनाव में कहा गया था कि गांव में मरघट की व्यवस्था ठीक नहीं है। आपने चुनाव जीतने के बाद मरघट बनवाने का आश्वासन दिया। उस आश्वासन को 5 साल हो गए हैं। अब तक कहीं मरघट नहीं बना। यह बात सुन प्रत्याशी ने कहा- ‘आप मुझे एक मौका और दें। इस बार मैं घर-घर में मरघट बनवा दूंगा।’ ऐसे व्यक्ति और कुछ नहीं तो लोकतंत्र के लिए मरघट का निर्माण अवश्य कर रहे हैं। लोकतंत्र को बचाना है तो उसे ऐसे लोगों के हाथ में जाने से बचाना होगा।

चुनाव चाहे संसद के हों, विधानसभाओं के, महाविद्यालयों के हों या अन्य सभा-संस्थाओं के, जहां नीति की बात पीछे छूट जाती है, वहां महासमर मच जाता है। उसमें जन, धन, समय और शक्ति की जो हानि होती है, उसकी क्षतिपूर्ति कठिन ही नहीं, असंभव है। कार्यकर्ताओं का जनता के साथ सीधा संपर्क होता है। अत: उनके जीवन का सीधा प्रभाव समाज पर पड़ता है। इस अपेक्षा से उन पर जनता को प्रशिक्षित करने का गुरुत्तर दायित्व है। पर आज जनता की स्थिति देखकर ऐसा लगता है कि कार्यकर्ता अपना यह उत्तरदायित्व निभाने के प्रति जागरूक नहीं हैं। उनका जीवन सहज रूप से संयत होना चाहिए, पर यह बहुत स्पष्ट है कि आज ये संयताचरण से दूर हटते जा रहे हैं। वे केवल अधिकार चाहते हैं, पर उनका कुछ कर्तव्य भी है, इस ओर उनका ध्यान नहीं जाता।

सबसे पहले उन्हें अपनी कमियों से छुटकारा पाने के लिए कृत संकल्प होना होगा। जो व्यक्ति अपना उत्तरदायित्व नहीं समझता, समझता भी है तो उसे निभाने के प्रति जागरूक नहीं होता, वह क्या कभी सफल हो सकता है? जिस कार्यकर्ता का जीवन असंयत वृत्तियों से घिरा हो, वह क्या सुख और शांति की अनुभूति कर सकता है? क्या वह दूसरों के सुधार का मार्ग प्रशस्त कर सकता है? जो अपने कर्तव्य के प्रति उपेक्षा का भाव बरतता है, उसे अनदेखा करता है, वह क्या कोई उल्लेखनीय कार्य कर सकता है? बहुत स्पष्ट है, इन सबके उत्तर नकारात्मक हैं। उन्हें अपने जीवन और जीवन-शैली पर गंभीरता से ध्यान देना चाहिए। अवांछनीय तत्वों को एक-एक कर विदा करना चाहिए। असत्य, विश्वासघात, धोखा, उत्पीडऩ- जैसे जीवन-घातक तत्वों से अपना संबंध नहीं संजोना चाहिए, ताकि जीवन प्रेरक और आदर्श बने। जनता से सीधा संपर्क होने के कारण कार्यकर्ताओं का उस पर सीधा प्रभाव पड़ता है, ऐसी स्थिति में यदि उनका जीवन प्रेरक और आदर्श होता है तो जनता को सहज रूप से सद्गुणों का प्रशिक्षण मिलता है, प्रेरणा मिलती है।

(प्रस्तुति: ललित गर्ग)

 

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