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नकारात्मक वोटिंग सकारात्मक सुधार

मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, दिल्ली और मिजोरम के अगले महीने होने वाले चुनावों में मतदाताओं को ये अधिकार भी होगा कि वे हर प्रत्याशी को खारिज कर सकें। ईवीएम मशीन में ‘इनमें कोई नहीं’, यानी ‘नोटा’ का विकल्प भी चुनाव आयोग इस बार देने जा रहा है। यह एक बड़ा चुनाव सुधार है जो उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद आया है। इसके तहत भारत में अब गलत छवि वाले उम्मीदवारों को खारिज करने का अधिकार यानी ‘राइट टू रिजेक्ट’ लोंगों को मिल गया है।

यह अधिकार हांलाकि अभी अधूरा है। ऐसा नहीं होगा कि अगर किसी क्षेत्र के अधिकांश मतदाताओं ने खारिज करने का विकल्प चुना तो भी चुनाव रद्द हो जाएगा, बल्कि बचे हुए मतों में से जिस प्रत्याशी को ज्यादा वोट मिलेंगे वो जीता हुआ घोषित कर दिया जाएगा। उदहारण के लिए अगर किसी क्षेत्र में 90 प्रतिशत मतदाता अगर ‘इनमें कोई नहीं’ के विकल्प को अपना मत देते हैं तो बचे हुए 10 प्रतिशत वोटों में जो प्रत्याशी बहुमत पाएगा वह जीत जाएगा। होना तो यह चाहिए था कि मतदान ही रद्द हो जाता और दोबारा चुनाव होता। कई देशों में इस तरह की व्यवस्था है।

उच्चतम न्यायालय ने अपने निर्णय में उम्मीद जताई है कि इस विकल्प के बाद राजनीतिक दलों पर दबाव पड़ेगा और वे अपने प्रत्याशी चुनते हुए जनता की इच्छा का ध्यान रखेंगे और साफ-सुधरी छवि वाले लोंगों को ही अपना उम्मीदवार बनाएंगे। न्यायालय का मानना है कि यह नकारात्मक मतदान धीरे-धीरे भारतीय लोकतंत्र में एक व्यवस्थात्मक परिवर्तन लाएगा। हम उम्मीद करते हैं कि न्यायालय की यह आशा पूरी होगी, अन्यथा आज की राजनीतिक दलों की जो स्थिति है उसे देखते हुए तो लगता नहीं कि ऐसा जल्द ही होगा।

आज जिस तरह का भाई-भतीजावाद, धनबल और बाहुबल का बोलबाला राजनीतिक दलों के बीच है, उससे एक गहरी निराशा का भाव मन में आता है। सोचिये क्या मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी, करुणानिधि की डीएमके, शरद पवार की एनसीपी, बादल का अकाली दल, चौटाला का लोकदल और लालू यादव का राष्ट्रीय जनता दल अपने परिवार के प्रत्याशियों से बाहर आ पायेगा? कई बार कितना हास्यास्पद लगता है। इनके सब रिश्तेदार तो सांसद या विधायक हैं। बहू, बेटी, बेटा, पत्नी, भतीजा, भतीजी, भाई, चाचा, साला, मामा और न जाने कौन-कौन? जैसे कि इन्हें उम्मीदवार मिलते ही नहीं। इन जैसे दलों को अच्छे बुरे प्रत्याशियों से क्या लेना-देना? बस प्रत्याशी होने के लिए रिश्तेदारी जरूरी है।

और अगर आप इनके रिश्तेदार नहीं है तो फिर आपके पास मोटा पैसा होना चाहिए. चुनाव लडऩे के लिए और पार्टी को देने के लिए भी। किसी तरह टिकट मिल भी गया तो करोंड़ों रुपए लगते हैं एक पार्षद के चुनाव तक में। ऐसे में कोई आम आदमी चुनाव लडऩे की सोच भी कैसे सकता है?

अगर राजनीति के अपराधीकरण की बात करें तो मौजूदा लोकसभा में ही 162 सांसद ऐसे हैं, जिन पर अदालतों में आपराधिक मुकदमे चल रहे हैं। इनमें आधे से ज्यादा नेताओं पर हत्या, अपहरण, दंगा भड़काने, डकैती, चोरी, धोखाधड़ी, गबन, फिरौती मांगने और रिश्वत लेने जैसे संगीन जुर्म करने के आरोप हैं। राज्य विधानसभाओं की स्थिति तो और भी बदतर है। सवाल है कि क्या ये दल और ये बाहुबली चुनाव लडऩा छोड़ देंगे? बेहतर होता कि न्यायालय यह व्यवस्था भी करता कि यदि ‘इनमें कोई नहीं’ के विकल्प को किसी क्षेत्र में 50 प्रतिशत से ज्यादा वोट मिले तो वह चुनाव ही रद्द हो जाएगा। इससे स्वत: ही राजनीतिक दल ऐसे दागियों को टिकट नहीं देने के लिए मजबूर हो जाते।

फिर भी यह फैसला स्वागतयोग्य है, क्योंकि चुनाव सुधार की दिशा में यह एक बड़ा और सराहनीय कदम है। इसके लिए उच्चतम न्यायालय और चुनाव आयोग दोनों ही बधाई के पात्र हैं। न्यायालय के इस फैसले को जिस रफ्तार के साथ लागू किया गया है, उसके लिए चुनाव आयोग की जितनी भी सराहना की जाए कम है। उम्मीद है कि अब वे लोग भी वोट करने सामने आएंगे, जो मतदान के दिन यह सोच कर घर से बाहर नहीं निकलते कि किसे वोट दिया जाए। क्योंकि सभी प्रत्याशी उन्हें ‘चोर चोर मौसेरे भाई’ जैसे लगते थे। अब वे गलत प्रत्याशियों को खारिज कर अपना रोष जाहिर कर सकते हैं।

मगर राजनीति को साफ करने के लिए अभी बहुत कुछ करने की आवश्यकता है। जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन के प्रतिनिधि को वापस बुलाने का अधिकार यानी ‘राइट टू रीकॉल’ और चुनावों की राज्य द्वारा फंडिंग के मसले उठाए थे। चुनाव सुधार के ऐसे कई उपाय लंबित पड़े हुए है। सोशल मीडिया के इस युग में लोकतंत्र को सार्थक बनाए रखने के लिए इन्हें अविलंब लागू करने की जरूरत है। जब जनता के हाथ में इन अधिकारों की झाडू आ जाएगी तो देश की राजनीति में जो कूड़ा जमा हो गया है और उससे जो सड़ांध और बदबू निकल रही है, उसे साफ करना मुश्किल नहीं होगा।

 

उमेश उपाध्याय

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