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गंगा हाईजैक ऑपरेशन विश्व का सबसे गुप्त अभियान

गंगा हाईजैक ऑपरेशन विश्व का सबसे गुप्त अभियान

By अनिल धीर

चक्रवात के बीज से एक मुल्क का जन्म हुआ। 11 नवंबर 1970 को आए चक्रवात भोला के कारण पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) भीषण बाढ़ की चपेट में आ गया। लहरें 20 से 30 फीट ऊंची उठ रही थीं, जिसके कारण निचले क्षेत्रों में रहने वाले लगभग 3 लाख लोग बाढ़ की चपेट में आकर मौत के मुंह में समा गए। चक्रवात के इतिहास में यह अब तक की सबसे भीषण आपदा थी। मरने वाले लोगों की वास्तविक संख्या 5 लाख से भी ऊपर थी।

भोला ने इतिहास बदल दिया था। उस समय बांग्लादेश पूर्वी पाकिस्तान था, जो भौगोलिक रूप से जमीनी तौर पर भारत द्वारा विभाजित था। पूर्वी पाकिस्तान के निवासी कुछ हद तक अपनी स्वायतता के लिए संघर्ष कर रहे थे, जो मानते थे कि वो अपने पश्चिमी भाईयों से भौगोलिक रूप से ही नहीं, बल्कि अन्य मामलों में भी अलग हैं। उनका मानना था कि पश्चिम सिर्फ उन पर ही नहीं नियंत्रण रखा रहा है, बल्कि उन नीतियों को भी यहां लागू किया जा रहा है जो पूर्वी पाकिस्तान के बजाय पश्चिमी पाकिस्तान के हित में हैं। चक्रवात आने के बाद सरकार की प्रतिक्रिया बेहद धीमी और अपर्याप्त थी। पूर्वी पाकिस्तान के लोगों को लगा कि पश्चिमी पाकिस्तान उनका दमन कर रहा है। इन कारणों से उनमें असंतोष और आक्रोश पनपने लगा। भोला चक्रवात लाखों लोगों को मौत के मुंह में सुलाकर पूरे तटीय क्षेत्र को तहस-नहस कर चुका था।

चक्रवात के तुरंत बाद ही चुनाव होने थे। इन चुनावों में आवामी लीग के शेख मुजीबुर्रहमान ने न सिर्फ प्रांतीय एसेंबली में जबरदस्त जीत हासिल की, बल्कि पाकिस्तान नेशनल एसेंबली में भी अप्रत्याशित सफलता हासिल की। पूर्वी क्षेत्र को आवंटित 162 सीटों में से 160 सीटों पर आवामी लीग जीत गया, जिसके कारण संयुक्त पाकिस्तान की 313 सीटों वाली नेशनल एसेंबली में वह बहुमत वाली पार्टी बन गई। अब सत्ता का हस्तांतरण निश्चित माना जा रहा था। पूर्वी पाकिस्तान के नेता शेख मुजीबुर्रहमान पूरे देश के नेता चुन लिए गए थे। लेकिन,पाकिस्तानी राष्ट्रपति जनरल याहया खान ने एक बंगाली को देश पर शासन करने की अनुमति नहीं दी। 2 मार्च 1971 को ढांका में नेशलन एसेंबली का शुरू होने वाला पहला सत्र स्थगित हो गया था। पाकिस्तानी प्रतिष्ठान और उनके राजनीतिज्ञ बंगाली नेतृत्व वाली सरकार को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे। इसके कारण राजनीतिक अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो गई। पूर्वी पाकिस्तान में स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई। इससे साफ संकेत मिल गया कि आवामी लीग स्वायतता की घोषणा के लिए तैयार दिख रही थी और संभव हुआ तो पूर्वी पाकिस्तान की स्वतंत्रता के लिए भी।

इंदिरा गांधी के राजनीतिक सचिव कश्मीरी पंडित डी.पी. धर ढाका की पल-पल की जानकारी इंदिरा गांधी को दे रहे थे। पाकिस्तानी प्रतिष्ठान ने प्रंधानमंत्री पद पर मुजीबुर्रहमान के दावे को देखा और आसन्न अलगाव वाले ‘छह सूत्रीय कार्यक्रम’ के हठ को भी। आवामी लीग की बात को दिल्ली में बहुत गंभीरता से सुना जा रहा था।

भारत की खुफिया एजेंसियां अपने पड़ोसियों पर पैनी निगाह रख रही थी। उन्हें पता चल चुका था कि क्रांति की लपटें उठ रही हैं और भारत इससे बहुत बड़े पैमाने पर प्रभावित होगा। भारत इस बात से बखूबी परिचित था कि अपने संसाधनों के माध्यम से गृहयुद्ध को हवा देकर पाकिस्तान बांग्लादेश की स्वतंत्रता की मांग में उठे जनविद्रोह को दबाने की कोशिश कर रहा है। नागरिक भेष में नागरिक विमानों के जरिए सैनिकों और हथियारों को पूर्वी पाकिस्तान में भेजा जा रहा था। पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान के बीच सबसे छोटा हवाई मार्ग भारतीय क्षेत्र से गुजरने वाला हवाई मार्ग ही था। भरतीय वायु क्षेत्र के अलावा अन्य हवाई मार्ग इससे तीन गुणा अधिक समय लेते थे। खुफिया एजेंसियां पाकिस्तान द्वारा भारतीय वायुमार्ग के प्रयोग के खिलाफ थीं।

30 जनवरी 1971 को भारतीय विमान फोक्कर गंगा (वीटी-डीएमएम) के अपहरण ने पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिमी पाकिस्तान के विभाजन का बीज बो दिया। हालांकि इस अपहरण गाथा का इतिहास कोई विश्वसनीय प्रमाण नहीं देता, लेकिन उस दुर्भाग्यपूर्ण घटना के 44 साल बाद भी प्रश्र उठते रहे हैं, जिसके उत्तर की जरूरत है। कुछ लोग घटना को याद करते हुए कहते हैं वह विश्व में हुए पहले विमान अपहरणों में से एक था, जिसे खिलौने वाली पिस्तौल से एक 16 वर्षीय कश्मीरी लड़के द्वारा अंजाम दिया गया था। लेकिन इस अपहरण का मास्टरमाइंड कौन था, भारत या पाकिस्तान? या फिर वो दो कश्मीरी, हाशिम कुरैशी और अशरफ कुरैशी, जो अपनी राजनीतिक जमीन तलाश कर रहे थे  और जेकेएनएलएफ के इशारे पर काम कर रहे थे? बी.एम. सिन्हा ने अपनी पुस्तक ‘द सांबा स्पाई केस’ में हाशिम और अशरफ कुरैशी द्वारा गंगा के अपहरण को विस्तार से बताया गया है, जिसके कारण पाकिस्तान में ऐसे घटनाक्रम बनते चले गए जिसके कारण उसके टुकड़े हो गए।

पाकिस्तान का हमेशा से दावा रहा है कि गंगा के अपहरण के पीछे भारत का हाथ रहा है। कुछ खास करणों से भारत ने आरोप को न ही कभी खारिज किया है और न ही स्वीकार। पाकिस्तानी आरोप को स्वीकार नहीं करने का सबसे बड़ा कारण अभियान की असफलता होती, जिसमें कई लोग मारे जाते। खुफिया एजेंसी अपने गुप्त अभियानों के दौरान अपने लोगों को मौत के मुंह में नहीं छोड़ सकती थी। हालांकि ऐसे बहुत से सबूत हैं जो यह जाहिर करते हैं कि यह एक सुनियोजित कारनामा था।

उन दिनों हवाई अड्डों पर यात्रियों या उनके सामानों की तलाशी नहीं ली जाती थी। तब श्रीनगर से 27 यात्री विमान पर सवार हुए थे। इंजन स्टार्ट हुआ और पायलट ने विमान को रनवे पर दौड़ा दिया। दो पायलटों – कैप्टन कचरू और कैप्टन ओबरॉय तथा दो विमान परिचारिकाओं को आभाष नहीं था कि इस महाद्वीप के शतरंज के खेल का यह विमान मोहरा है। यह भारतीय वैमानिकी बेड़े के सबसे पुराने विमानों में से एक था और पहले ही उसे सेवा से निवृत किया जा चुका था। अपहरण के सिर्फ पांच दिन पहले ही उसे सेवा में दुबारा शामिल किया गया था। उड़ान भरने के सिर्फ 15 मिनट बाद ही एक अपहरणकत्र्ता ने लात मारकर कॉकपिट का दरवाजा खोल दिया और हाथ में लिए रिवॉल्वर को पायलट के सिर पर तान दिया। अपहरणकत्र्ता घबरा रहा था। उसके हाथ कांप रहे थे। बाद में पता चला कि कॉकपिट का दरवाजा खोलने वाले का नाम हाशिम कुरैशी था और कॉकपिट के दरवाजे पर जो लड़का पहरा दे रहा था, उसका नाम अशरफ कुरैशी था।

अशरफ ने सभी यात्रियों से अपने हाथ ऊपर उठाने को कहा। हाथ में ग्रेनेड लिए हुए अशरफ चिल्लाया, ”ज्यादा होशियारी दिखाने की कोई जरूरत नहीं है।’’ विमान ऊंचाईयों की ओर बढऩे लगा और इस तरह उपमहाद्वीप के नए इतिहास की यात्रा शुरू हो गई।

गंगा के अंदर शांतचित्त घबराहट और प्रतीक्षारत चिंता का माहौल था। अपहरणकत्र्ता विमान पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित कर चुके थे। हाशिम और पायलट के बीच हो रही गर्मागर्म बहस की आवाजें आ रही थीं। कुछ ही देर में बहस होने की आवाज आनी बंद हो गई और विमान का अवरोहन शुरू हो गया। कुछ ही देर में विमान हवाईपट्टी पर था। यात्रियों ने हवाई अड्डे पर पाकिस्तानी निशान वाले विमानों को देखा और समझ गए कि वे पाकिस्तान में हैं। सुरक्षाबलों ने विमान को घेर लिया। बाद में यात्रियों को पता चला कि वे पाकिस्तान के लाहौर में हैं। विमान के इंजन के बंद होने के कुछ ही मिनट बाद विमान का मुख्य दरवाजा खुला और एक अपहरणकत्र्ता नीचे कूदकर किसी से बात करने लगा। कुछ मिनट बाद घोषणा हुई कि अगर चाहें तो महिलाएं और बच्चे विमान से नीचे उतर सकते हैं।

इसके बाद चाय और लाहौरी स्पेशल ब्रेड के साथ लाहौरी मेहमान नवाजी शुरू हो गई। उत्सुक सुरक्षाबल के जवान यात्रियों से बातचीत करने के लिए हाथ-पांव मार रहे थे। वे उनके परिवार, कश्मीर और यात्रा के अनुभवों के बारे में जानना चाह रहे थे।

गंगा के आगमन पर लाहौर में उत्साहित लोगों की जबरदस्त प्रतिक्रिया हुई। हजारों लोगों की भीड़ सड़कों पर उस साक्ष्य को देखने के लिए आ गई, जो 1965 की हार और ताशकंद की असफलता के बावजूद हवाई मार्ग से कश्मीर के लिए  संघर्ष के रूप में जारी था। उन दोनों अपहरणकत्र्ताओं के साथ राष्ट्रीय हीरो की तरह व्यवहार किया जा रहा था।

यात्रियों से मिलने के लिए जल्दी ही पाकिस्तानी अधिकारी आ गए। अधिकारियों की इस टीम का नेतृत्व पाकिस्तान के तत्कालीन विदेश मंत्री और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के अध्यक्ष जुल्फीकार अली भुट्टो कर रहे थे, जो अभी-अभी ढाका से लाहौर पहुंचे थे। ढाका से लाहौर पहुंचने के लिए भुट्टो के विमान ने भारतीय हवाई मार्ग को ही अपनाया था, जो उस समय पाकिस्तानी विमानों द्वारा आमतौर पर अपनाया जाता था।

07-02-2015

संध्या होते ही सभी यात्रियों को दो बसों के माध्यम से होटल में पहुंचाया गया। लाहौर की सड़कों से गुजर रही बसों के साथ सुरक्षाबलों का काफिला भी साथ चल रहा था। यात्रियों को होटल के सबसे ऊपरी तले पर ठहराया गया, जहां एक कमरे में दो लोगों के रहने की व्यवस्था थी। वहां जरूरत की सारी सुविधाएं उपलब्ध थीं, लेकिन यात्रियों के सामान गंगा में ही रखवा लिए गए थे। पाकिस्तानी अधिकारियों ने यात्रियों से कहा कि बिना निर्देश के किसी अन्य कमरे में जाकर दूसरे व्यक्ति से मिलना निषेध है। थकान से चूर और अपने भाग्य से अनजान यात्रियों की रातें करवटें बदलते हुए गुजरीं। सुबह होते ही उन्होंने पाकिस्तानी अधिकारियों से रेडियो और समाचार-पत्रों की मांग की, जिसमें सिर्फ समाचार-पत्र ही उन्हें उपलब्ध कराया गया। आने वाले दिनों में यात्रियों को और भी आश्चर्यों का सामना करना था। कैरम बोर्ड, शतरंज, ताश और अन्य इनडोर खेल सामग्रियों को यात्रियों के कमरों में पहुंचवा दिया गया था।

गंगा के यात्री होटल में प्रतीक्षा कर रहे थे और दूसरी तरफ गंगा को मुक्त कराने के लिए समझौता वार्ता चल रही थी। इस तरह यात्री अपहरणकर्ताओं और भारतीय अधिकारियों के बीच झूल रहे थे। अपहरणकर्ताओं ने यात्रियों सहित विमान को मुक्त करने के लिए जेल में बंद जेकेएनएलएफ के 36 सदस्यों को छोडऩे और उन्हें पाकिस्तान में राजनीतिक आश्रय देने की मांग कर रहे थे। वे इस बात की भी गारंटी मांग रहे थे कि इन दो अपहरणकर्ताओं के परिवार वालों को किसी तरह का कोई नुकसान नहीं पहुंचाया जाएगा।

हमेशा की तरह, दोनों देशों के बीच समझौता वार्ता आसान नहीं था। अभी कुछ ही साल पहले दोनों देशों के बीच 1965 में युद्ध हो चुका था। निराशा और अवसाद के दो दिनों के बाद गंगा के यात्रियों को मुक्त कर दिया गया। इस दुविधा के बाद कि गंगा के यात्रियों और क्रू-मेंबर को ले जाने के लिए लाहौर में भारतीय विमान को अनुमति मिलेगी या नहीं, उन्हें पाकिस्तान सीमा के पंजाब में लाया गया, जहां से उन्हें फिरोजपुर हवाई अड्डे से अमृतसर के लिए रवाना कर दिया गया। अमृतसर हवाई अड्डे पर यात्रियों को दो समूहों में बांट दिया गया, जहां से एक समूह को दिल्ली और दूसरे समूह को जम्मू भेज दिया गया। शायद यह पहला मौका था जब भारत में हवाई यात्रा के दौरान तलाशी लेने की शुरूआत की गई थी।

जम्मू हवाई अड्डे पर विमान के उतरते ही हजारों की संख्या में जुटी भीड़ ने अपहरणकर्ताओं के चंगुल से छूटकर आए लोगों का स्वागत किया। जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन मुख्यमंत्री गुलाम मोहम्मद सादिक उनकी आगवानी करने के लिए हवाई अड्डे पर मौजूद थे। यात्रियों के उतरते ही सादिक ने उनके गले में माला पहनाई। मुख्यमंत्री के साथ आए लोग नारे लगाकर यात्रियों का गर्मजोशी से स्वागत कर रहे थे।

भारतीय अधिकारियों ने पाकिस्तान से गंगा विमान को जल्दी से जल्दी वापस भेजने की मांग की, जो लाहौर हवाई अड्डे के कोने में खड़ा था। 2 जनवरी को इंटरनेशनल सिविल एविएशन ऑर्गनाइजेशन के अध्यक्ष वॉल्टर बिनागी ने पाकिस्तान से कहा कि विमान को तुरंत वापस करना चाहिए और अपहरणकर्ताओं के खिलाफ बिना किसी विलंब के कार्रवाई की जानी चाहिए।

घटना में नाटकीय मोड़ उस वक्त आया जब पाकिस्तानी सुरक्षाबलों ने अगले ही दिन गंगा विमान को आग के हवाले कर दिया। पाकिस्तान अपने ही जाल में फंस चुका था। अपहरणकर्ता राष्ट्रीय हीरो बन गए और विमान को जलाकर खाक कर दिया गया। गंगा के विनाश की घटना को भारत ने गंभीरता से लेते हुए 3 फरवरी को अपना विरोध जताया और अपहरणकर्ताओं को मदद पहुंचाने का पाकिस्तान पर आरोप लगाया। भारत ने पाकिस्तान से न सिर्फ विमान के लिए क्षतिपूर्ति की मांग की, बल्कि विमान में स्थित समानों की भरपाई के लिए भी कहा।

दिल्ली में पाकिस्तानी दूतावास के सामने प्रदर्शन हिंसक हो गया। जन संघ सहित विभिन्न राजनीतिक दलों से जुड़े सदस्यों के साथ लगभग दस हजार छात्रों ने पाकिस्तानी दूतावास परिसर पर पत्थरबाजी करनी शुरू कर दी और उसके गेट को तोडऩे का प्रयास किया। लाठी चार्ज कर और आंसू गैस के गोले छोड़कर पुलिस ने इस प्रदर्शन पर काबू पाया, जिसमें कई लोग गंभीर रूप से जख्मी हो गए।

4 फरवरी को भारत ने भारतीय हवाई मार्ग से पूर्वी पाकिस्तान के लिए गुजरने वाले सभी पाकिस्तानी विमानों पर प्रतिबंध लगा दिया। पाकिस्तानी विमानों को पूर्वी पाकिस्तान जाने के लिए श्रीलंका से होकर गुजरना पड़ता था, जिसके कारण पाकिस्तानी विमानों की यात्रा कई गुणा लंबी हो गई। 5 फरवरी को भारत ने पाकिस्तान से अपहरणकर्ताओं को भारत को सौंपने को कहा, ताकि भारतीय कानून के तहत उन पर कार्रवाई की जा सके।

भारतीय वायुमार्ग पर पाकिस्तानी उड़ानों पर प्रतिबंध के कारण गंगा के अपहरण में पाकिस्तान का षड्यंत्र नजर आने लगा। वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि पूर्वी पाकिस्तान में सैन्य अभियान को बाधित करने के लिए भारतीय हवाई मार्गों को पाकिस्तान के लिए प्रतिबंधित करने के बहाने के लिए गंगा अपहरण मूलत: भारतीय खुफिया एजेंसियों का अभियान था। हाशिम और अशरफ पर पाकिस्तान ने भारतीय खुफिया विभाग का एजेंट होने का संदेह जताया। बाद में हाशिम और अशरफ को गिरफ्तार कर भारतीय एजेंट होने का मुकदमा चलाया गया और उन्हें सजा दी गई। इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर नेशनल लिबरेशन फ्रंट के खिलाफ भी कार्रवाई करने की मांग उठी। राजद्रोह के आरोप के तहत मकबूल भट्ट सहित जेकेएनएलएफ के सभी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया।

जब 1971 के जाड़े तक पाकिस्तानी अधिकारी गंगा प्रकरण में व्यस्त थे, पूर्वी पाकिस्तान अपना इतिहास लिख रहा था। मार्च 1971 में शेख मुजीबुर्रहमान ने अपना ऐतिहासिक फ्रीडम स्पीच दिया और पाकिस्तानी सेना ऑपरेशन सर्चलाईट चलाकर उसकी प्रतिक्रिया दी। 26 मार्च 1971 को पाकिस्तानी सेना ने मुजीबुर्रहमान को गिरफ्तार कर लिया।

26 मार्च को मेजर जिया उर रहमान ने बंगबंधु की ओर से रेडियो पर स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। अप्रैल में निर्वासित प्रांतीय बांग्लादेश सरकार का गठन कर दिया गया। 24 मई को कलकत्ता में स्वाधीन बांग्ला बेतार केन्द्र की स्थापना कर दी गई। उसके साथ बांग्लादेश को भारत का समर्थन मिल गया। और वही हुआ जिसका पाकिस्तानी सेना को डर था। 21 नवंबर 1971 को बांग्लादेश और भारत की सेना ने संयुक्त रूप से मुक्ति वाहिनी का गठन किया। दूसरे ही दिन पाकिस्तानी वायुसेना और भारतीय वायुसेना की लड़ाई की शुरूआत हो गई, जिसे बोयरा का युद्ध के नाम से जाना जाता है। पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी वायुसेना पश्चिमी पाकिस्तान से पूरी तरह कट चुकी थी, जिसका उसे बहुत बड़ा नुकसान हुआ।

3 दिसंबर 1971 को भारत और पाकिस्तान के बीच औपचारिक युद्ध की शुरूआत हो गई। बांग्लादेश वायुसेना ने पाकिस्तानी ऑयल डिपो को तबाह कर दिया। अगले ही दिन भारतीय सेना ने आधिकारिक रूप से पूर्वी पाकिस्तान पर आक्रमण कर दिया। 6 दिसंबर को बांग्लादेश को मान्यता देने वाला भारत पहला देश बन गया। 16 दिसंबर को वह दुर्भाग्यपूर्ण दिन आया जब पाकिस्तानी सेना ने औपचारिक रूप से भारतीय सेना के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। इस तरह ढाका के स्वतंत्रता की घोषणा होते ही एक नए देश का जन्म हो गया।

लेकिन जल्दी ही पाकिस्तान को यह अहसास हो गया कि मकबूल भट्ट और जेकेएनएलएफ के अन्य नेता इस षड्यंत्र का  हिस्सा नहीं थे। हालांकि उन्हें दो साल जेल की सजा हो चुकी थी, लेकिन लाहौर हाईकोर्ट ने उनकी नजरबंदी को चुनौती देते हुए उन्हें अपनी मातृभूमि के लिए लडऩे वाला स्वतंत्रता सेनानी बताया। मकबूल भट्ट और अशरफ कुरैशी सहित सभी जेकेएनएलएफ नेताओं को दोषमुक्त बताते हुए छोड़ दिया गया। हाशिम कुरैशी अकेला ऐसा व्यक्ति था जो जेल में रहा और 1980 में रिहा हुआ।

अपनी रिहाई के बाद हाशिम यूरोप चला गया, जबकि अशरफ पाकिस्तान का एक जाना माना शिक्षाविद् बन गया। फरवरी 2012 को हार्ट अटैक से 58 वर्ष की उम्र में उसकी मृत्यु हो गई। अगस्त 1986 में पाकिस्तान छोड़कर हाशिम हॉलैंड जा बसा और दिसंबर 2000 तक वहीं रहा। उसके बाद वो भारत आ गया। वह श्रीनगर के निशात क्षेत्र में डल झील के सामने स्थित अपने महल में रहता है। आज वो भारत और पाकिस्तान के बीच फैली घृणा को मिटाने के लिए कश्मीर मुद्दे को ठंडे बस्ते में डालने की वकालत करते हैं।

गंगा को अपहृत करने का परिणाम प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से बेहद गंभीर रहा। पाकिस्तानी विमानों पर प्रतिबंध लगाने की भारत की कार्रवाई को पाकिस्तान ने पूर्वी पाकिस्तान में अपनी स्थिति को एक चुनौती के रूप में लिया। बेशक, पाकिस्तान द्वारा कोलंबो के रास्ते अपने सैनिकों और अन्य साजो सामान को पूर्वी पाकिस्तान में भेजना, जिन्हें भारतीय सैनिकों द्वारा हरा दिया गया एक बड़ा कारक है। बाकी तो इतिहास है ही।

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