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ईश्वर

मनुष्य हमेशा आनंद की अनुभूति में लीन रहना चाहता है, जिसे प्राप्त करना आसान नहीं है। ऐसा तभी संभव है, जब हम स्वयं को पहचान जाएंगे। इस स्थिति में पहुंचने के लिए शास्त्रसम्मत कई विधियां हैं, जिसे ‘आत्मा’ कहा गया है। इस आत्मा को ज्ञापित करने के लिए ‘मडूकोपनिषद’ में चार स्थितियां बताई गई हैं – जागृत मुद्रा, स्वप्र, गहरी निद्रा और ध्यान (जाग्रत, स्वप्र, सुषुप्त एवं तुरिया)। तीन अवस्थाओं का विश्लेषण करने के बाद, जिस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं, वह चौथी अवस्था तुरिया है। यही तुरिया आत्मा है। आत्मा ब्रह्म है और इसका स्वर ‘ऊँ ‘ है।

इस उपनिषद के अनुसार, व्यष्टि और समष्टि में कोई विभेद नहीं है। सभी एक और इनके बीच हमने जो भी परिसीमाएं उत्पन्न बना रखीं हैं, वह कृत्रिम है। जागृत अवस्था में, जागृत व्यष्टि (विश्व) सकल भौतिक जगत (वैश्वानर) के समतुल्य है। स्वप्रास्वथा में स्वप्राद्रष्टा व्यक्ति (तैजस), परालौकिक मानस (हिरण्यगर्भ) से अलग नहीं होता। उसी तरह, गहरी निद्रा में सोने वाला व्यक्ति (प्रज्ञ) संपूर्ण से अलग नहीं होता। परालौकिक परिमापन के स्तर पर गहरी निद्रा में सोए व्यक्ति को ईश्वर कहा जाता है।

यह प्रज्ञ, जो ईश्वर है, सब का स्वामी (सर्वेश्वर) है। यह सर्वज्ञाता (सर्वज्ञ) और अंत:करण का नियंत्रणकर्ता (अंतर्यामी) भी है। यह सर्वस्व का प्रारंभिक स्रोत (योनि सर्वस्व) है। यह सभी प्राणियों के उत्पत्ति और विनाश का है।

प्रश्रोपनिषद के अनुसार, गहरी निद्रा मे सोने वाला व्यक्ति ईश्वर के समकक्ष होता है। प्रज्ञ और ईश्वर के बीच कोई विभेद नहीं होता। उदाहरण के माध्यम से इसे इस तरह समझा जा सकता है। मान लिया कि आपने अपनी एक उंगली को एक गहरी झील में डूबो दिया दिया। वास्तव में आपने अपनी उंगली को पूरी झील में डूबोया है। ठीक उसी तरह, जब हम गहरी निद्रा में होते हैं, तो ईश्वर में समाहित होते हैं। प्रज्ञ और ईश्वर में कोई विभक्ति नहीं है। इन्हें कोई विभाजित नहीं कर सकता। सभी विषय एक हो जाते हैं और इनमें किसी तरह का कोई विभाजन नहीं होता।

प्रज्ञ इस ब्रह्मांड के स्वामी हैं और अकेला उन्हीं से संपूर्ण प्राणी उत्पन्न हुए हैं। वह आरंभ स्रोत और नियंत्रणकर्ता है। इसे फिल्म स्क्रीनिंग के उदाहरण से आसानी से समझा जा सकता है। फिल्म को एक छोटे से छिद्र के माध्यम से प्रसारित किया जाता है, जिसे अपर्चर कहते हैं। यह अपर्चर ही मुख्य स्रोत है। अगर इसे बंद कर दिया जाय तो, फिल्म का प्रसारण बंद हो जाएगा। उसी तरह, ईश्वर ही सर्वस्व का स्रोत है, हमारे होने का मूल मर्म, जब हम गहरी निंद में होते हैं। जागृत अवस्था का मैं, वैस्वानर, स्वप्र की अवस्था में तैजस और गहरी निद्रा में प्रज्ञ है। यह प्रज्ञ, ईश्वर है, हमारा सर्वस्व, हमारा मालिक।

स्वामी निखिलानंद सरस्वती

(लेखक चिन्मया मिशन, दिल्ली के प्रमुख है)

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