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…इसलिए राहुल को आता है गुस्सा

राहुल गांधी क्या अब एंग्री यंगमैन की भूमिका में आ गए हैं? क्या वह अपनी ही पार्टी से एक अलग लाइन खींचना चाहते हैं? क्या नौ साल के राजनीतिक जीवन में ही राहुल अपनी मां की छाया से निकल चुके हैं? और अब वह सियासत में भी जवान हो गए हैं? ऐसे न जाने कितने सवाल और सवालों पर भी सवाल, इन दिनों राजनीतिक गलियारों में हो रहे हैं। दरअसल यह बहस तब शुरू हुई जब कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने दागी नेताओं को बचाने के लिए कांग्रेस की अपनी ही सरकार के लाए गए अध्यादेश को बकवास बताते हुए इसे फाड़कर फेंकने की सलाह दी। वह भी सरेआम। प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में बेहद नाटकीय तरीके से पहुंचे कांग्रेस उपाध्यक्ष ने पहली बार सरकार के फैसले पर कोई प्रतिकूल टिप्पणी खुलकर की थी। प्रधानमंत्री विदेश में थे। कहा गया कि प्रधानमंत्री का अपमान हुआ। इसलिए हंगामा बरपना ही था और जमकर बरपा। मगर इस समूचे विवाद से इतर यह जानना जरूरी है कि राहुल गांधी का यह अंदाज क्या वाकई अनोखा है, अजूबा है या यह उनकी पर्सनालिटी का हिस्सा है। इसका जवाब अगर आपको हाल फिलहाल के किसी प्रामाणिक दस्तावेज में तलाशना है तो जयपुर के कांग्रेस चिंतन शिविर में कांग्रेस उपाध्यक्ष बनने के बाद दिया गया राहुल गांधी का पहला भाषण पढ़ लीजिए।

यह वही भाषण है जिसे सुनकर जयपुर में कांग्रेस के तमाम पुरोधा तालियां बजा रहे थे। उपाध्यक्ष को गले लगा रहे थे। उन्हें भविष्य की उम्मीद अपने इस युवा नेता में दिखने लगी थी। खुद प्रधानमंत्री भी, जो आज आहत हैं, उस वक्त भाव विभोर नजर आ रहे थे। किन-किन लोगों के आंखों में कितने आंसू छलके थे यह बता पाना मुश्किल था। इसी जगह पर राहुल गांधी ने सत्ता को जहर भी बताया था।

भावुकता के समावेश के साथ कई सख्त संदेश राहुल गांधी के भाषण में थे। पार्टी की कमान संभालने का खुला ऐलान करते हुए राहुल गांधी ने जो कुछ कहा, वह सब पार्टी की तमाम स्थापित परंपराओं के विरुद्ध बागी सुर था। उन्होंने कहा था कि इस पार्टी में कोई नियम नहीं है। पता नहीं कैसे चुनाव जीत जाते हैं। यहां चीजें अपने आप तय हो जाती हैं। लोगों की आवाज सुननी है, यह संदेश उन्होंने दिया था। पार्टी के संविधान की उन्होंने एक तरह से खिल्ली उड़ाई थी। बड़े से बड़े नेताओं को चेताने वाले कई संदेश उनके भाषण में छिपे थे। उन्होंने यह संकेत भी दिया था कि लोगों को बदलाव के लिए तैयार रहना है।

पार्टी के तमाम सीनियर नेता उस भावुक क्षण में अपना संदेह, मन की ऊहापोह नहीं जाहिर कर पाए थे। लेकिन अब उनका डर धीरे-धीरे सामने आने लगा है। जब अखिल भारतीय स्तर पर नए पदाधिकारियों की टीम राहुल गांधी की देख-रेख में तैयार हुई तो पार्टी में अरसे से जमे पुराने नेताओं का डर सही मायने में जग गया। 44 सचिवों की टीम में कई ऐसे चेहरे थे, जिन्हें वह लोग भी नहीं जानते थे, जो बीते कई दशक से पार्टी संगठन का काम देखते रहे हैं।

उपाध्यक्ष बनने के बाद चंद महीनों में ही राहुल ने पार्टी के तमाम स्थापित मानदंड बदल दिए हैं। पार्टी को वह अपने ढर्ऱे पर ढाल रहे हैं। वह अब संगठन के सभी पदाधिकारियों की रिपोर्ट सीधे लेते हैं। उन्होंने सचिवों को उनके सीनियर्स की तरह ही भारी-भरकम काम दे दिया है। वह नेताओं की परफॉर्मेंस रिपोर्ट कारपोरेट अंदाज में ले रहे हैं। नेताओं को अपना मिशन, विजन और उसे हासिल करने के लिए किए जा रहे प्रयास, तरीके और परिणाम सबकुछ लिखकर बताना होता है। कितना भी बड़ा कद क्यों न हो, अगर कोई नेता किसी के लिए चुनावी टिकट की सिफारिश करता है, तो उसे उसकी जिम्मेदारी भी लेनी होगी। पार्टी का घोषणा-पत्र तैयार करने में आम लोगों का फीडबैक अहम होगा, यह भी उन्होंने तय कर दिया है। पंचायत, पार्षद यानी स्थानीय लीडरशिप को पार्टी में खास अहमियत देने का एजेंडा राहुल गांधी ने तैयार किया है। इसके लिए उन्हें भरोसा अपनी ही बनाई हुई टीम पर है। यानी हर जगह पीपुल्स वाइस फस्र्ट का संदेश। राहुल गांधी बिना अध्यक्ष का पद हासिल किए हुए अपनी मां की जगह ले चुके हैं। संगठन की ओर से पिछले दिनों एक पत्र जारी हुआ, इसमें सचिवों से कहा गया कि वह अपने महासचिवों को रिपोर्ट देने के साथ इसकी एक कॅापी सीधे राहुल गांधी को भेज दें। पत्र में कांग्रेस अध्यक्ष का जिक्र नहीं किया गया, जबकि अमूमन संगठन की हर रिपोर्ट कांग्रेस अध्यक्ष को जरूर भेजी जाती है। यह इस बात का भी संकेत है कि कांग्रेस अध्यक्ष ने खुद को नेपथ्य में डालकर बेटे के हाथ में कमान सौंप दी है। बहुत कुछ नजर आ रहा है जो नहीं दिख रहा है, वह वर्ष 2014 का चुनाव आते आते और स्पष्ट दिखने लगेगा।

दरअसल राहुल गांधी के नौ साल के सियासी सफर पर नजर डालिए तो उन्हें जहां जो जिम्मेदारी मिली या उन्होंने खुद ली, वहां उन्होंने बदलाव के लिए प्रयोग किए। प्रयोग की सफलता संदिग्ध हो सकती है, लेकिन वह डिगे नहीं। युवक कांग्रेस में पदाधिकारी चुनाव के जरिए निर्वाचित हों, इसके लिए बाकायदा पार्टी में चुनाव आयोग बनाया गया। चुनाव हुए, पदाधिकारी जीतकर आए और अब यह सिलसिला काफी आगे बढ़ चुका है। हालांकि इस बदलाव का फायदा भी उन्होंने ही उठाया, जो बाहुबल और धनबल में यकीन करते थे। चुनाव में ज्यादातर वे ही युवा नेता जीते जिनके पास समृद्ध राजनीतिक विरासत थी, पैसा था, मसल पावर थी। लेकिन अब मुख्य संगठन में भी राहुल गांधी नए-नए प्रयोगों पर आमादा हैं। इसे भी कोई शायद ही रोक पाए। क्योंकि उनका सियासी अंदाज ही ऐसा है। जो इसे नहीं मानता राहुल गांधी उसे भी नहीं मानते हैं, वो कितना भी बड़ा क्यों न हो।

अध्यादेश के ताजा विवाद से यह भी साफ है कि अब राहुल गांधी ने स्पष्ट संदेश दिया है कि सरकार का कोई भी फैसला बिना उनकी राय के नहीं हो सकता।अगर होगा तो ऐसी ही जलालत के लिए तैयार रहना होगा। इस बार राहुल गांधी ने खुद ही शुरुआत करके अपने वफादारों को भी रास्ता दिखा दिया है। अब यह भी रिपोर्ट है कि उन्होंने मंत्रियों को सीधे तलब करना शुरू कर दिया है। मंत्रियों को अपना एजेंडा उन्हें बताना होता है। शायद प्रधानमंत्री इस सच को नहीं समझ पाए थे।

वर्ष 2004 में राहुल गांधी जब लोकसभा का चुनाव अमेठी से जीतकर आए तो उन्होंने भाजपा के लिए कहा था कि मुझे इन पर दया आती है। वह कम बोलते थे। वर्ष 2007 में पार्टी के महासचिव बने तो उन्होंने यूथ कांग्रेस अैर एनएसयूआई का प्रभार संभाला। धीरे-धीरे वह मुखर होने लगे। पार्टी में यह दोनों आनुषंगिक संगठन राहुल की वजह से बेहद ताकतवर हो गए। इसके बाद के सियासी सफर में वह लगातार अपनी एक अलग लकीर बनाने के प्रयास में ही जुटे रहे। संसद में वह यदा कदा ही बोले। लोकसभा में कलावती का उदाहरण देकर दिया गया उनका भाषण भले ही विपक्ष के लिए मजाक का विषय बना हो लेकिन यह राहुल गांधी की सियासत का अपना अंदाज है। वह ज्यादा से ज्यादा घूमते हैं, लोगों से संवाद करते हैं। घूमते-फिरते मिलने वाले लोगों में ही वह अपना राजनीतिक दर्शन तलाशने का प्रयास करते हैं।

कांग्रेस में नेताओं की मजबूरी यह है कि वह राहुल गांधी से सहमत हो सकते हैं या असहमत हो सकते हैं, लेकिन उनसे अलग अपनी कोई लाईन नहीं तय कर सकते। दागियों पर अध्यादेश का बचाव कर रहे तमाम मंत्री, पार्टी के नेता उस वक्त कैसे दुबक गए जब राहुल गांधी ने इसे बकवास बताया, यह पूरा देश देख चुका है। दरअसल कांग्रेस में कोई ऐसा बड़ा नेता नहीं जो गांधी परिवार को टक्कर दे सके। यूपी और बिहार में राहुल गांधी ने कांग्रेस महासचिव के रूप में विधानसभा चुनाव के लिए सघन प्रचार किया।

यूपी में एंग्री यंगमैन के अंदाज में सपा का मैनीफेस्टो मंच से फाड़ा तो भी खूब चर्चा हुई। उन्हें जीत नहीं मिली, लेकिन पार्टी में उनका कद बढ़ता रहा। पार्टी जहां हारी वहां सामूहिक जिम्मेदारी और जहां जीती वहां राहुल गांधी का गुणगान। यूपी में लोकसभा की ज्यादा सीटें हासिल करना और वर्ष 2009 की चुनावी जीत के बाद पहली बार राहुल को पीएम बनाने की मांग तेज हुई। दरअसल राहुल गांधी की ताकत बढऩी ही है, चाहे अंदाज उनका कैसा भी हो, क्योंकि पार्टी गांधी परिवार से हटकर शायद ही कुछ सोचने की सामथ्र्य रखती हो। कोई लीडरशिप परिवार के बिना डेवलप नहीं हो पाई। यही वजह है कि कांग्रेस के सवा सौ साल से भी ज्यादा के सफर में गांधी परिवार को हटा दें तो उसकी कहानी बहुत दिलचस्प या सुहानी नहीं लगती। राहुल गांधी को भी यह पता है। लिहाजा उन्होंने सही मायने में अब अपनी लीडरशिप सामने रखना शुरू कर दिया है। अब शायद कांग्रेस की सियासत उनके इर्दगिर्द ही घूमनी है और अगर कोई बदलाव की पटकथा लिखी भी जानी है तो कम से कम वर्ष 2014 के चुनाव नतीजों का इंतजार कीजिए। जहां कांग्रेस के ना-नुकुर के बावजूद राहुल बनाम मोदी के बीच का मुकाबला होना है।

उदय इंडिया ब्यूरो

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