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अफलातूनी राहुल का रियलटी शो

नेहरू.गांधी खानदान के श्शहजादेष् को युवाओं में आकर्षण का केंद्र बनाने के लिए प्रेस कॉन्फ्रेंस और फिर अध्यादेश वापस लेने की पटकथा करीने से तैयार की गई थी। उन्हें पुरानी व्यवस्था के खिलाफ दो.टुक राय रखने वाले नायक के रूप में पेश करने के लिए यह दो कौड़ी की नौटंकी भर थी। लेकिन ऐसी अफलातूनी हरकतें कांग्रेस को भारी ही पड़ सकती हैं।
प्रशंसकों और चीयर लीडरों के लिए कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी का दागी सांसदों.विधायकों पर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश को पलटने के लिए लाए गए अध्यादेश को बकवास बताना उनका मास्टर स्ट्रोक था। लेकिन असलियत यह है कि राहुल का विवेक अचानक नहीं जाग उठाए बल्कि उसकी पटकथा करीने से तैयार की गई थी। इसका मकसद सरकार की गंभीर नाकामियों से आम आदमी का ध्यान बंटाना था। अब यह राज खुल गया है कि कैसे गद्दी के इस उत्तराधिकारी को सिर्फ यूपीए सरकार की उपलब्धियों का श्रेय दिलाना है। लिहाजाए राहुल गांधी को पुरानी व्यवस्था के खिलाफ दो.टुक राय रखने वाले नायक के रूप में युवाओं के आगे पेश किया गया। लेकिन यह राजनीति नहींए दो कौड़ी की नौटंकी भर है। राहुल की ऐसी अफलातूनी हरकतें कांग्रेस के लिए भारी ही पड़ सकती हैं। उनकी इन हरकतों पर कई लोगों की भौंहे भी तन गई हैं।
राहुल की एंग्री यंगमैन की छवि बनाने के लिए कांग्रेस के रणनीतिकारों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की वह सारी नौटंकी तैयार की थी, ताकि उन्हें युवाओं में आकर्षण का केंद्र बनाया जा सके। सरकार और पार्टी की छवि में कुछ सुधार के लिए योजना ऐसे बनाई गई ताकि विपक्ष के राजनीतिक नौटंकी के आरोप चस्पां न हो पाएं। दरअसल यह अध्यादेश के खिलाफ देश भर में जनाक्रोश को शांत करने और लोगों का भरोसा जीतने की कोशिश में खेली गई नौटंकी ही थी। यह मानना मुश्किल है कि ऐसे गंभीर मसले पर सरकार और पार्टी के उच्च स्तर पर चल रहे विचार से कांग्रेस उपाध्यक्ष अनभिज्ञ रहे होंगे। राहुल यह जानते थे कि अध्यादेश का मकसद दागी सांसदों और विधायकों को बचाना था। वह इस पर पार्टी और सरकार में जारी विचार के शुरुआती चरण में ही अपना विरोध जाहिर कर सकते थे या वे लोकसभा में विधेयक पर चर्चा के दौरान अपनी भावनाएं व्यक्त कर सकते थे। फिर, भाजपा और वामपंथी दलों के विरोध के बाद राष्ट्रपति द्वारा मांगे गए स्पष्टीकरण के बाद ही उन्होंने क्यों अपना गुस्सा सार्वजनिक करना चाहा? सरकार जब इस पर विचार कर रही थी तो उनके पास कई मौके थे, लेकिन तब उन्होंने मुंह बंद रखना ही सही समझा। अगर सत्ता के गलियारों में भ्रष्टाचार से वे इतने ही विचलित होते तो उन्हें अण्णा हजारे के लोकपाल की स्थापना के आंदोलन का समर्थन करना चाहिए था। इसलिए यह संभव है कि मीडिया में और जनता के बीच अध्यादेश की तीखी आलोचना और राष्ट्रपति की आपत्तियों के बाद कांग्रेस ने यह रणनीति अपनाई हो। तो, यह राहुल को नैतिकता के पहरुए के रूप में स्थापित करने की सोची-समझी पटकथा ही थी।
फिर भी राहुल के तरीकों से कांग्रेस को कुछ झेंप उठानी पड़ी। अगर वे सचमुच अध्यादेश के विरोधी थे तो प्रेस कॉन्फ्रेंस में नाटकीय मुद्रा अपनाने के बदले कुछ और कर सकते थे। वे पृष्ठभूमि में रहकर भी बहुत कुछ कर सकते थे। पार्टी में कोई भी उनकी इच्छा के विरुद्ध नहीं जाता। इस नौटंकी की दरकार कतई नहीं थी। क्या राहुल लोगों को यह यकीन दिलवाना चाहते हैं कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की सहमति के बिना वे अपनी सरकार की छीछालेदर कर आएघ् कांग्रेस उपाध्यक्ष ने जरूर यह सोचा होगा कि इस तरह वह सरकार की नाकामियों से दूरी बना लेंगे और जनभावना के साथ खड़े हो जाएंगे।
राहुल के इरादे नेक भी हों तो जैसे उन्होंने यह किया और जिस समय कियाए वह वाकई चौंकाऊ है। अध्यादेश पर उनकी बात से कोई इनकार नहीं कर सकता लेकिन जब प्रधानमंत्री विदेश दौरे पर राष्ट्राध्यक्षों से मिल रहे हों तो ऐसे कठोर शब्दों में आलोचना का क्या औचित्य था? निश्चित रूप से कांग्रेस के लिए इस पर झेंप मिटा पाना आसान नहीं होगा। हालांकि बाद में कांग्रेस उपाध्यक्ष ने कहा कि उनके शब्दों का चयन कुछ गलत हो सकता है, पर उनकी भावना गलत नहीं थी। उन्होंने अपने शब्दों के चयन से सिर्फ प्रधानमंत्री की अहमियत ही नहीं घटाई, बल्कि यह संदेश देने की भी कोशिश की कि वे वह बुलंदी हासिल कर चुके हैं कि प्रधानमंत्री तक को सरेआम झिड़क सकते हैं। साथ खड़े हो जाएंगे।
राहुल की इस हरकत से कई सवाल उभरते हैं। अगर अध्यादेश बकवास था तो क्या प्रधानमंत्री और केंद्रीय कबीना किसी काम की नहीं हैघ् क्या कांग्रेस उपाध्यक्ष यह कहना चाहते हैं कि उनकी सरकार के कबीना मंत्री इतने बेवकूफ हैं कि गंभीर मसलों पर भी बकवास कर सकते हैं? उन्होंने विपक्ष को प्रधानमंत्री और सरकार पर वार करने का हथियार मुहैया करा दिया है। हालांकि विपक्षी पार्टियों ने प्रधानमंत्री का इस्तीफा मांगने के बदले राहुल की शैली पर ही सवाल उठाए हैं।
राहुल के कई समर्थक कह सकते हैं कि वह जनता की धड़कन भांप कर उसे आवाज दे रहे हैं। इसका अर्थ यह होता है कि कांग्रेस के बाकी नेता जनभावना को पढ़ पाने में अक्षम हैं। यह बात तो पुरानी हो चुकी है कि यूपीए सरकार और कांग्रेस आलाकमान के बीच कोई तालमेल नहीं है। यह खाई रोज-ब-रोज चौड़ी होती जा रही है। राहुल की टिप्पणी से यह भी साबित हुआ है कि पार्टी और सरकार के बीच गहरा अविश्वास है। यह भी सही है कि किसी और नेता की बात से राहुल का वजन काफी अधिक है, क्योंकि वे अपनी मां की प्रभाव से भी रोशन हैं। उन्हें पार्टी का भविष्य घोषित किया जा चुका है। अनौपचारिक रूप से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार भी बताया जा चुका है। फिर भी वे बागडोर संभालने से हिचक रहे हैं। सो, अपने अफलातूनी मिजाज के कारण वह आगे भी मौजूदा व्यवस्था बनाए रख सकते हैं, ताकि पार्टी सुप्रीमो बिना किसी जवाबदेही के सर्वोच्च बना रहे।

हालांकि इस बार गांधी जयंती को नेहरू-गांधी के इस उत्तराधिकारी का एक नया अवतार हुआ है। सो, अब देखना यह है कि क्या दूसरे मुद्दों पर भी इसी तरह अपनी दो-टुक राय जाहिर कर पाते हैं? क्या वह पार्टी का नेतृत्व संभाल कर प्रधानमंत्री पद का औपचारिक उम्मीदवार बनते हैं?

(लेखिका दिल्ली स्थित वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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