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सबकी आंखें राहुल के बढ़ते कदम पर

अचानक 27 सितंबर और 2 अक्टूबर के बीच घटनाचक्र कुछ ऐसे घूमा कि राहुल गांधी की छवि प्रधानमंत्री, समूचे केंद्रीय मंत्रिमंडल, अपनी मां सोनिया गांधी और यूपीए के सहयोगी दलों तक से पुश्त भर ऊंची हो गई। इसका साधन बना दागी सांसदों को बचाने के लिए लाया गया अध्यादेश। सोनिया गांधी भले आज भी पार्टी अध्यक्ष हैं, पर बागडोर राहुल के हाथ आ चुकी है। दिलचस्प यह है कि राहुल ने खुद ही यह वीटो हासिल कर लिया है। लेकिन सवाल है कि क्या वे इस फिजा को उस बुलंदी तक ले जा पाएंगे, जैसा कि उन्हें चुनौती देने वाले नरेंद्र मोदी कर रहे हैं?
इसी साल मई में दिल्ली कांग्रेस की एक बैठक में राहुल गांधी ने अपनी दादी इंदिरा गांधी की तस्वीर की ओर इशारा कर कहा था, ‘दादी मेरी आदर्श हैं और मैं उन्हीं की तरह कठोर हूं।’ तब उन्होंने एक तरह से रहस्योद्घाटन किया था कि वह अपनी मां को ‘नरम’ मानते हैं और ‘कांग्रेस अध्यक्ष (सोनिया गांधी) की तरह नरमदिल नहीं हैं।’ उस समय उन्हें बहुतों ने गंभीरता से नहीं लिया था। तब तक वह संगठनकर्ता या चुनावी फिजा पैदा करने वाले नेता के रूप में नाकाम ही साबित हुए थे। लेकिन, अचानक 27 सितंबर और 2 अक्टूबर के बीच घटनाचक्र कुछ ऐसे घूमा कि वह अपनी दो-टुक राय जाहिर करके प्रधानमंत्री, समूचे केंद्रीय मंत्रिमंडल, अपनी मां सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाले कोर ग्रुप, कांग्रेस पार्टी और यूपीए के सहयोगी दल सब पर भारी पड़े।

राहुल ने अचानक पार्टी महासचिव अजय माकन के प्रेस कॉन्फ्रेंस में पहुंचकर उनकी बातें झुठला कर सबको चौंका दिया। माकन दागी नेताओं पर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के खिलाफ सरकारी अध्यादेश को सही ठहरा रहे थे। लेकिन राहुल अचानक आए और अपनी सरकार की इस मसले पर समझदारी को भरोसे लायक न बताकर अध्यादेश को ‘पूरी तरह बकवास’ और ‘फाड़ कर फेंक देने’ योग्य बताकर चलते बने। उन्होंने प्रधानमंत्री की अहमियत को ही नहीं नकार दिया, बल्कि इस बुनियादी मर्यादा का भी ध्यान नहीं रखा कि वे विदेश में हों तो उन पर आक्षेप नहीं करते। लेकिन वह शायद यह भी जानते थे कि मनमोहन सिंह इस अपमान का भी बुरा नहीं मानेंगे और सामान्य बने रहेंगे। वह सही साबित हुए, क्योंकि प्रधानमंत्री ने अमेरिका से लौटते हुए विशेष विमान में पत्रकारों से कहा कि वे इस्तीफा नहीं दे रहे हैं। हालांकि उनके पूर्व मीडिया सलाहकार संजय बारू ने उन्हें फौरन इस्तीफा देने की सलाह दे डाली थी। मगर मनमोहन का तर्क था, ‘इसमें इस्तीफे का सवाल कहां उठता है।’ फिर थोड़ा ठहर कर वे बोले, ‘मैं बहुत ऊंच-नीच देख चुका हूं और इससे मैं जल्दी विचलित नहीं होता।’

प्रधानमंत्री के इस बयान का कोई यह नतीजा निकाल सकता है कि जैसा उन्हें माना जाता है, उनकी चमड़ी उससे अधिक मोटी है। और इस मामले में तो उन्हें सबसे अपमानजनक घाव उसी शख्स ने दिया था, जिसके बारे में वह उसी विशेष विमान में कह रहे थे कि वह उनके (राहुल) साथ काम करने को सहर्ष तैयार हैं और यह भी कि अगर इस मसले पर उनसे (प्रधानमंत्री से) गलती हुई है तो कांग्रेस अध्यक्ष से भी चूक हुई है। यह फैसला राहुल की मां की अगुआई वाले कोर ग्रुप में हुआ था और फिर कैबिनेट में आया था। कोर ग्रुप के राजनीतिक फैसले के बाद ही अध्यादेश का मजमून कानून मंत्रालय ने तैयार किया था और कैबिनेट ने उस पर मुहर लगाई थी। उन्होंने राहुल को यह भी याद दिलाया कि कैबिनेट ने इस पर एक नहीं, दो बार विचार किया था, पहली बार विधेयक के सिलसिले में और फिर अध्यादेश पर। मनमोहन ने अपने प्रवास के दौरान कहा, ‘मैं यह समझने की कोशिश कर रहा हूं कि लोग इससे क्यों विचलित हैं। मैं लौटकर इस मामले में राहुल गांधी से बात करूंगा। उन्होंने इस बारे में मुझसे मुलाकात का समय मांगा है और मैं अपने कैबिनेट सहयोगियों को भी भरोसे में लूंगा। हम देखेंगे कि हवा का रुख किधर है। हां, इस्तीफा देने का कोई सवाल नहीं है। मैं इस मामले को कैबिनेट के समक्ष रखूंगा। इन सभी मुद्दों पर कांग्रेस पार्टी की सर्वोच्च इकाई कोर ग्रुप में विचार हुआ था। कैबिनेट ने भी इस पर एक नहीं, दो बार विचार किया था। लेकिन यह हमेशा संभव है कि विचार बदल जाएं। मैं अपने कैबिनेट सहयोगियों से इन सभी मामलों में सलाह करूंगा।’ और कैबिनेट ने अगली बैठक में मनमोहन सिंह की ही अध्यक्षता में महज 10 मिनटों में अपने दो मौकों के फैसले को पूरी तरह बदल दिया। दो साल से अधिक सजा होने पर सांसदों की सदस्यता स्वत: खत्म होने से बचाने के लिए लाया गया अध्यादेश और विधेयक दोनों निरस्त कर दिया गया।
इस तरह राहुल उस कांग्रेस के लिए तारणहार साबित हुए, जो हमेशा अपने अस्तित्व की रक्षा एवं सफलता के लिए खानदान की ओर टकटकी लगाए रहती है। उनकी मां, सोनिया गांधी भले आज भी पार्टी अध्यक्ष हैं, पर बागडोर राहुल के हाथ आ चुकी है। अब वह सर्वोच्च नेता हैं, चाहे वह कांग्रेस उपाध्यक्ष ही क्यों न हों या कोर ग्रुप के सदस्य भी न हों, उनके पास कोई संवैधानिक पद भी नहीं, वह सरकार में नहीं, न ही वह यूपीए सरकार के गठजोड़ के सर्वोच्च निर्णायक मंडली के सदस्य हैं। इस तरह राहुल ने खुद ही वीटो हासिल कर लिया है।
अपने पार्टीजनों के लिए राहुल ने सरकार के ‘पहरुए’ के रूप में सोनिया की जगह ले ली है। कांग्रेस के नेताओं को यह भी उम्मीद है कि अपने ‘बकवास’ बयान से उन्होंने खुद को यूपीए सरकार की बुराइयों से अलग कर लिया है और युवा वोटरों में मोदी के आकर्षण को खत्म करने के लिए हवा के ताजा झोंके की तरह आ गए हैं। यह मां सोनिया और बेटे राहुल की आपसी समझदारी का भी नतीजा हो सकता है। पार्टी में कोई भी इसे मां-बेटे के टकराव के रूप में नहीं देख रहा है, बल्कि कांग्रेस की खानदानशाही में दोनों एक-दूसरे के पूरक की तरह हैं-नरम मां और कठोर बेटा। राहुल या उनके रणनीतिकारों को यह श्रेय जाता है कि वे सही मुद्दे ही उठाते हैं, जिसको लेकर जनाक्रोश तगड़ा था और राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी कानूनी रूप से कमजोर अध्यादेश पर मंजूरी देने में हिचक रहे थे।

राहुल के इस नए अवतार पर एक और राजनीतिक प्रतीक का मुलम्मा चढ़ाया गया। महात्मा गांधी के 144वें जन्मदिन पर जब सारा देश छुट्टी मना रहा था, कांग्रेस की सर्वोच्च निर्णायक

इकाई कोर ग्रुप और केंद्रीय मंत्रिमंडल अध्यादेश को कचरे के हवाले करके उसके सम्मान में जुटे थे, जिसे नरेंद्र मोदी ‘शहजादे की इच्छा’ कहते हैं।

इस तरह सुर्खियों में नरेंद्र मोदी की जगह राहुल गांधी छा गए।

2 अक्टूबर को पूरे दिन मनमोहन सिंह जिस तरह विधेयक और अध्यादेश को वापस लेने की संवैधानिक प्रक्रियाओं को पूरा करने और उसे गरिमामय बनाने में जुटे रहे, उससे पता चलता है कि कांग्रेस और सरकार में स्थापित पुरानी व्यवस्था अब किसी काम की नहीं रह गई। राहुल और उनकी टोली ही अब नई व्यवस्था है। इस नई व्यवस्था का सबूत माकन ने अपने उसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह कह कर दे दिया था कि ‘राहुल जी के शब्द ही अब कांग्रेस के विचार हैं।’

प्रेस क्लब में राहुल की गुस्सैल टिप्पणी के बाद प्रधानमंत्री को भेजी गई चिट्ठी के जरा शब्दों पर गौर कीजिए, ‘मुझे एहसास है कि अध्यादेश के बारे में मेरी भावना कैबिनेट के फैसले और कोर ग्रुप के नजरिए से मेल नहीं खाती। मैं यह भी जानता हूं कि हमारे राजनीतिक विरोधी इसका बेजा इस्तेमाल करेंगे’….और अंत में लिखा गया, ‘मुझे उम्मीद है कि आप इस मुद्दे पर मेरी भावना की गहराई को समझेंगे।’ यह अलग बात है कि अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने इस चिट्ठी को इस इरादे से जारी कर दिया कि दुनिया देखे कि राहुल के मन में ‘आप (मनमोहन सिंह) जिन कठिन परिस्थितियों में नेतृत्व प्रदान कर रहे हैं, उसके प्रति अपार श्रद्धा के अलावा कुछ नहीं है।’

पिछले नौ साल से सोनिया पार्टी और सार्वजनिक मंचों पर

मनमोहन सिंह की ढाल बनी रही हैं। राहुल ने ठीक इसके उलट किया, सार्वजनिक रूप से मनमोहन सरकार की समझदारी पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया। मनमोहन सिंह इधर लंबे समय से कांग्रेस के लिए बोझ साबित हो रहे हैं, जैसा कि विभिन्न सर्वेक्षणों और पार्टी कार्यकर्ताओं तथा अन्य स्रोतों से मिल रही जानकारी से संकेत मिलता है। सो, अब उनके भाग्य का कैसे फैसला किया जाता है, यह देखना दिलचस्प होगा। कांग्रेसजनों के लिए तो चिंता नेहरू-गांधी परिवार के आलोक में पार्टी की दशा ही है।

राहुल निश्चित रूप से यह जानते हैं कि कोर ग्रुप की अगुआई उनकी मां सोनिया गांधी के हाथ में ही है और उसे दस साल पहले सरकार और पार्टी के बीच बेहतर तालमेल के लिए स्थापित किया गया था। उसका ढांचा भी उसी के अनुरूप बनाया गया। इसमें सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह, पी. चिदंबरम, सुशील कुमार शिंदे, ए.के. एंटनी और अहमद पटेल हैं। यह सर्वोच्च समिति अक्सर हर शुक्रवार को बैठती है और राजनीतिक स्थितियों तथा महत्वपूर्ण मसलों पर विचार करती है। राहुल इसका हिस्सा कभी नहीं बने।

राहुल के अध्यादेश को फाड़ कर फेंकने वाले बयान और लालू प्रसाद को चारा घोटाले में सजा होने के बाद, कांग्रेस और राजद दोनों ही किसी तरह के तालमेल से इनकार कर रहे हैं, पर पार्टी सूत्र बताते हैं कि कोर ग्रुप ने लालू प्रसाद से सोनिया गांधी की मुलाकात के बाद ही अध्यादेश लाने का मन बनाया था। लालू ने कांग्रेस अध्यक्ष को सेकुलर गठजोड़ की जरूरत के प्रति ध्यान दिलाया था और कहा था कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले से उनकी चुनावी संभावनाएं काफी प्रभावित हो सकती हैं। लालू ने ही सबसे पहले कहा था कि अगला चुनाव सेकुलर-कम्युनल लाइन पर लड़ा जाएगा और कांग्रेस नेतृत्व को यह यकीन दिलाया था कि वे ही (न कि नीतीश) बिहार में मोदी की हवा को रोक सकते हैं। यह बेवजह नहीं है कि राजद नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी ने पटना में कहा कि ‘लगता है, पूरा यूपीए ही राहुल गांधी के आगे दुम हिलाने लगा है।’

राहुल युग के आगमन से कांग्रेस-राजद रिश्ते की इतिश्री भी हो गई है। जदयू शायद इसी क्षण का इंतजार कर रहा था। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अहम मुद्दे पर राहुल के साहस की प्रशंसा की। उनके पार्टी प्रवक्ता राजीव रंजन सिंह ने ऐलान किया कि कांग्रेस के साथ गठजोड़ की संभावनाएं खुली हुई हैं।

बेशक, राहुल ने कांग्रेस में नई ऊर्जा भर दी है। कांग्रेसजन कब से उनकी ओर देख रहे थे। अब उन्होंने संतुष्ट कर दिया है। लेकिन सवाल है कि क्या वे इस फिजा को उस बुलंदी तक ले जा पाएंगे, जैसा कि उन्हें चुनौती देने वाले नरेंद्र मोदी कर रहे हैं? कांग्रेस के कार्यकर्ता तो उनसे खुलकर मोर्चा संभालने की उम्मीद लगाए बैठे हैं। हालांकि ये दलीलें भी हंै कि राहुल उस काम का श्रेय ले रहे हैं जिसके वास्तविक नायक राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी हैं। भाजपा के विरोध प्रदर्शन के बाद यह खतरा बढ़ गया था कि राष्ट्रपति अध्यादेश को पुनर्विचार के लिए कैबिनेट को लौटा देंगे। प्रणब दा बेहद समझदार राजनीतिज्ञ रहे हैं और उन्होंने कानूनी सलाह हासिल की थी कि इसे सुप्रीम कोर्ट नकार देगा। इसी वजह से उन्होंने तीन वरिष्ठ केंद्रीय मंत्रियों को बुलाकर संकेत दिया था कि वह बिना जांचे-परखे इस पर दस्तखत को तैयार नहीं हैं। अगर राष्ट्रपति अध्यादेश को लौटा देते तो कांग्रेस और बुरी स्थिति में फंस जाती। राष्ट्रपति से सरकार के टकराव की स्थिति बनने पर भाजपा प्रधानमंत्री से इस्तीफा मांग सकती थी। तब कांग्रेस की राजनीतिक और नैतिक दोनों ही मामलों में भद पिटती।

अध्यादेश को वापस लेने के लिए तैयार किए गए कैबिनेट नोट में भी राष्ट्रपति द्वारा वापसी की आशंका का जिक्र है। ऐसे में कहा यह जा रहा है कि राहुल गांधी ने अपनी कथित गुस्सैल टिप्पणी से कांग्रेस की नैया को डूबने से बचा लिया और राष्ट्रपति भवन तथा साउथ ब्लॉक के संभावित टकराव को भी टाल दिया। राहुल के समर्थकों का कहना है कि अगले चुनावों में मोदी के विरुद्ध राहुल का यह ‘निर्णायक और दो-टुक नजरिए’ वाला रवैया कारगर साबित होगा।

 

दीपक कुमार रथ

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