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अब भी अबूझ पहेली हैं राहुल

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के पिता स्व. राजीव गांधी ने देश की सत्ता संभालने के थोड़े समय बाद ही 1985 में ‘सत्ता के दलालों’ को ‘लोकतंत्र को सामंतशाही’ में बदलने का दोषी ठहराया था लेकिन कांग्रेसियों की यह संस्कृति बदलने के लिए वह कोई ठोस कदम नहीं उठा पाए थे। सोनिया गांधी ने भी पार्टी के ढांचे की समीक्षा और सुधार के लिए कई समितियां गठित कीं। सभी ने पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र के गंभीर अभाव के प्रति सचेत किया। लेकिन राहुल गांधी को यह श्रेय जाता है कि उन्होंने पार्टी की खामियां दूर करने के लिए कुछ ठोस कदम उठाए। खांटी राजनीतिक संदर्भ में कहें तो उनकी कोशिशों का मकसद उन्हें ऐसे नेता के रूप में पेश करना रहा है जो भारतीय राजनीति में क्रांतिकारी बदलाव लाने का इरादा रखता है। लेकिन उनकी ताजा पहल कांग्रेस को अंदर तक अस्थिर करती लगती है।

कांग्रेस, अधिसंख्य राजनीतिक पार्टियों की तरह ही, पूरी तरह एक नियंत्रित पार्टी है। उसका आंतरिक ढांचा परंपरागत रूप से नेहरू-गांधी खानदान के प्रति वफादारियों की श्रृंखला की बुनियाद पर टिका है। 2004 के आम चुनावों से राजनीति में कदम रखने के साथ राहुल गांधी ने पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र के जो प्रयोग किए, उससे पार्टी के कई दिग्गज सतर्क हो गए। उन्हें आशंका सताने लगी कि इससे पार्टी में ऊपर से नीचे तक वफादारियों की बुनियाद पर खड़ा ढांचा कहीं चरमरा न जाए। राहुल ने शुरू से ही सबको शामिल करने पर जोर दिया जिससे पार्टी में सबके लिए समान अवसर पैदा हो। पार्टी संगठन में परिवर्तन की दीर्घकालीन योजना के तहत उन्होंने पहले अखिल भारतीय युवक कांग्रेस और एनएसयूआई में आंतरिक लोकतंत्र की स्थापना के लिए ऐसे प्रयोग किए, जो अब से पहले कभी नहीं हुए थे और अतीत में पार्टी के संचालन के तरीके से एकदम अलग थे।

बेशक, पार्टी का एक संविधान भी है मगर वह दस्तावेज की ही शोभा बढ़ाता है, जमीन पर नहीं उतरता। कई कांग्रेस नेता यह दावा करेंगे कि पार्टी में चुनाव के सिद्धांतों का भले ही हमेशा कड़ाई से पालन न होता हो पर पार्टी लोकतांत्रिक ढंग से ही चलती है। पार्टी के नेता आम सदस्यों की राय जान-समझ कर ही फैसले लेते हैं। अधिसंख्य मामलों में चयन की दोतरफा प्रक्रिया का पालन किया जाता है या ऐसा किया जाता दिखाई देता है। हर नेता जानता है कि पार्टी में उसका अस्तित्व ऊपर के आशीर्वाद पर निर्भर है। लेकिन चुनाव के सिद्धांत के तहत यह उलट जाता है, चुनाव में ऊपर के समर्थन से कम महत्वपूर्ण जमीनी समर्थन नहीं होता।

अब तक राहुल की बातों और क्रियाकलापों से यह संकेत मिलता रहा है कि वह पार्टी में विभिन्न स्तरों पर व्यापक प्रतिनिधित्व और हर तरह के अभिमत को जगह देना चाहते हैं। लेकिन वह शायद पार्टी के आंतरिक ढांचे में वफादारी के उस मूल तत्व को समझ पाने में नाकाम रहे हैं, जो अकेले कांग्रेस में ही प्रभावी नहीं है। इससे एक नए राहुल का प्रादुर्भाव हुआ है जो आदर्शवादी कम, व्यावहारिक अधिक है। हालांकि इससे उनकी राजनीति के केंद्रीय तत्व का ही लोप होता दिख रहा है। लेकिन कांग्रेस पार्टी उनसे कोई सवाल नहीं करेगी। जिस दिन वह वेटिंग रूम से बाहर निकलने का फैसला कर लेंगे, उन्हें प्रधानमंत्री पद के लिए स्वीकार कर लिया जाएगा। नेहरू-गांधी खानदान के वारिस के पास सत्ता स्वाभाविक रूप से आ जाती है। यह उनके डीएनए में है। इसके लिए किसी चुनावी प्रक्रिया की दरकार नहीं है।

इतिहास गवाह है कि पंडित नेहरू के बाद कांग्रेस के एक भी प्रधानमंत्री को चुनावी मैदान में विजय पताका फहराने की जरूरत नहीं पड़ी है। पंडित नेहरू को तो 1937 के चुनावों में अधूरी विजय और 1946 में कड़ी टक्कर में जीत मिली थी। लेकिन लालबहादुर शास्त्री को जून 1964 में जब सत्ता मिली तो उनकी ऐसी कोई पृष्ठभूमि नहीं थी। उनकी जगह जनवरी 1966 में इंदिरा गांधी आईं लेकिन वह अपनी पहली ही चुनावी परीक्षा में बुरी तरह नाकाम साबित हुईं। 1967 में कांग्रेस पंजाब से लेकर पश्चिम बंगाल तक हर राज्य में हार गई। राजीव गांधी भी जब 1984 में प्रधानमंत्री बने तो उनका कोई पिछला रिकॉर्ड नहीं था। दो महीने बाद कांग्रेस की ऐतिहासिक चुनावी विजय में उनकी मां इंदिरा गांधी की शहादत का ही असर था। उनके बाद आए पीवी नरसिंह राव तो न 1991 में जीते, न 1996 में। 1991 में तो उन्होंने चुनाव ही नहीं लड़ा था और 1996 में लड़े तो बुरे फंस गए। डॉ. मनमोहन सिंह तो सही मायने में प्रधानमंत्री ही नहीं हैं क्योंकि उनकी वाक्कला लोगों को बेचैन ही ज्यादा करती है, वह तो महज कठपुतली हैं।

2014 में जब देश को ‘पीएम इन वेटिंग’ राहुल गांधी के मूल्यांकन का मौका मिलेगा तो यह इस आधार पर नहीं होगा कि कितने वोट मिले। इसके बदले यह देखा जाएगा कि मौजूदा अव्यवस्था और अराजकता का प्रबंधन वह कैसे कर पाएंगे। और 2014 तक अनेक अव्यवस्थाएं उनके सामने होंगी। सो, राहुल की हाल की कार्रवाई में उनके सफल होने और अपने को साबित करने की बेचैनी ही झलकती है। वह राजनीतिक वर्ग को यह भी बताना चाहते हैं कि उन्हें अब अपने पिता की यादों या मां के साए की दरकार नहीं है।

इसलिए राहुल मोटे तौर पर अभी रहस्य बने हुए हैं। वह अपनी लोकप्रियता के बल पर पार्टी का राजनीतिक आधार व्यापक बनाना चाहते हैं। इससे शायद कांग्रेस को बहुमत मिल भी जाए मगर उन्होंने अभी भी इस पर रोशनी नहीं डाली है कि अगर जनादेश मिल भी जाता है तो वे क्या करेंगे।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

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