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धनतेरस पर दक्षिण दिशा में लगाते हैं तेल का दीपक

धनतेरस को यमदीपदान भी कहा जाता है। मृत्यु और दु:खों को दूर रखने के लिए यम देवता की प्रार्थना की जाती है जिसके लिए दीपों को सारी रात जलने दिया जाता है। धन तेरस मनाने के पीछे एक बहुत ही लोकरूचि कहानी भी है, जो राजा हिमा के 16 वर्षीय बेटे से जुड़ी है। राजा हिमा के 16 वर्षीय बेटे की जन्म कुंडली के अनुसार उसकी मृत्यु उसके विवाह से चौथे दिन एक सांप के काटने से होनी थी।

उसके विवाह के बाद जब चौथा दिन आया तो उसकी पत्नी ने उसे सारी रात सोने नहीं दिया। उसकी पत्नी ने अपने पति के आलीशान कमरे के प्रवेश द्वार पर अपने सभी गहनों और बहुत सारे सोने-चादी के सिक्कों का ढेर लगा दिया। इसके साथ ही उसने अनगिनत दीप जला कर पूरे महल को रोशन कर दिया। उसके बाद वह अपने पति को कहानियां और गीत सुनाती रही, जिससे उसका पति सो न सके। मृत्यु के देवता यम जब वहां सर्प के रूप में आए तो शानदार रोशनी से उनकी आंखें चुंधिया गईं जिससे वह राजकुमार के कक्ष में नहीं घुस पाए। इस प्रकार राजकुमार की नवविवाहित पत्नी ने अपने पति को मृत्यु के शिकंजे से बचा लिया। तब से धनतेरस को ”यमदीपदान’’ भी कहा जाता है और इस दिन मृत्यु के देवता ”यम’’ की प्रार्थना के लिए सारी रात दीप जला कर घरों को रोशन रखा जाता है। गेहूं के आटे के बने 13 दीपों में तेल-बत्ती डाल कर उन्हें जला कर घर की प्रवेश द्वार पर रखा जाता है। ”यम’’ का स्थान दक्षिण में होने के कारण इन दीपों का मुंह दक्षिण दिशा में होता है। यह दीप प्रज्ज्वलन सूर्य छिपने के बाद शाम को किया जाता है और सारी रात दीप जलते रहते हैं तथा प्रवेश द्वार को रोशन रखते हैं। यह ध्यान रखना भी जरूरी है कि ”धनतेरस’’ के दिन को छोड़ कर कभी अन्य दिवस पर जलते हुए दीप को दक्षिण दिशा में नहीं रखना चाहिए।

एक अन्य दंत कथा के अनुसार, दुर्वासा ऋषि ने देवताओं के राजा इन्द्र को एक बार शाप दिया था कि देवी लक्ष्मी उसे छोड़ कर चली जाएंगी। राक्षसों ने जब स्वर्ग पर एक बार आक्रमण कर राजा इन्द्र को हरा दिया तो, देवताओं के गुरू बृहस्पति ने इस समस्या का हल निकाला। उन्होंने बताया कि यदि क्षीर सागर को मथा जाए तो उसमें से अमृत निकलेगा जिसे पीने से देवता अमर हो जाएंगे। समुद्र मंथन से देवी लक्ष्मी भी वापस आ जाएंगी। गुरू बृहस्पति के सुझाव पर मंदराचल पर्वत की मथनी बनाई गई और मथनी को घुमाने के लिए सर्पों के राजा वासुकी को रस्सी बनाया गया। तब भगवान विष्णु ने कछुए का रूप धारण कर अपनी कमर पर मंदराचल पर्वत को रखा। समुद्र मंथन में देवी लक्ष्मी क्षीर सागर से निकलीं। वह एक पूरे खिले हुए कमल के फूल पर खड़ी हुईं। उनके गले में कमल के फूलों की माला थी। देवता उनकी प्रशंसा में स्त्रोत और भजन गाने लगे। गंधर्व गाने लगे और अप्सराएं नृत्य करने लगीं। उनकी दोनों ओर खड़े गज उन पर पवित्र गंगाजल छिड़क कर उन्हें पवित्र जल से स्नान कराने लगे। इससे उनका नामकरण ”गजलक्ष्मी’’ भी हो गया।

उनका जन्म क्षीर सागर से हुआ था, इसलिए उन्हें ”समुद्रतन्या’’ भी कहा जाता है। समुद्रों के राजा अपने प्राकृतिक रूप में प्रकट हुए और उन्होंने देवी लक्ष्मी का अपनी पुत्री के तौर पर स्वागत किया।

देवता और असुर अमृत के लिए समुद्र मंथन करते रहे। अन्तत: ”हाथों में अमृत का कलश लेकर’’ क्षीर सागर से धन्वन्तरी प्रकट हुए। दोनों-देवता और असुर अमर होने के लिए अमृतपान करना चाहते थे, लेकिन भगवान विष्णु ने देवताओं को अमृतपान कराने में सफल रहे और असुर पराजित हो गए। समुद्र मंथन ने देवताओं को अमर कर दिया और इस प्रकार मां लक्ष्मी का उदय हुआ।

शुभ स्नान से दूर करें ग्रहों के अशुभ प्रभाव को

ग्रहों के अशुभ प्रभाव को शान्त करने के लिए वैदिक ज्योतिष के ग्रंथों में विभिन्न प्रकार के उपाय बताए गए हैं। चिकित्सकीय जल में स्नान करना भी उनमें प्रमुख रूप से एक है। कहा जाता है कि इस प्रकार के उपाय ग्रहों के अशुभ गोचर से पैदा होने वाली सभी प्रकार की रूकावटों और उनके अशुभ परिणामों को दूर कर देते हैं।

यह बताना भी अप्रासंगिक नहीं होगा कि ग्रहों के अशुभ प्रभावों को दूर करने के लिए किए जाने वाले उपाय शुभ मुहुर्त में ही किए जाने से ही ये उपाय अपना पूर्ण सकारात्मक प्रभाव दिखा सकते हैं। इसलिए ये उपाय केवल शुभ मुहुर्त में ही किए जाने चाहिए।

किन ग्रहों के अशुभ गोचर के प्रभावों को दूर करने के लिए किस प्रकार के चिकित्सकीय जल में स्नान किया जाए और स्नान किए जाने वाले जल में क्या वस्तुएं डाली जाएं, इनका विवरण नीचे दिया गया है:

सूर्य : सूर्य के गोचर के अशुभ प्रभाव को दूर करने के लिए स्नान किए जाने वाले जल में इलायची, शहद, खस-खस, केसर, कमल, रोली, दालचीनी, काली मिर्च, सूखी अदरख और इलायची डालनी चाहिए।

चन्द्रमा : चन्द्रमा के गोचर के अशुभ प्रभाव को दूर करने के लिए स्नान किए जाने वाले जल में कमल, कौंच, शंख या सीपी, बेलपत्र, स्फेटिक, पंचगव्या डालनी चाहिए।

मंगल : मंगल के गोचर के अशुभ प्रभाव को दूर करने के लिए स्नान किए जाने वाले जल में लाल फूल, चाईना गुलाब के पत्ते, नाग केसर और हल्दी डालनी चाहिए।

बुध : बुध के गोचर के अशुभ प्रभाव को दूर करने के लिए स्नान किए जाने वाले जल में शहद, नाग केसर, पंचगव्या, पुदीना और भ्रिंगरा डालना चाहिए।

बृहस्पति या गुरू : बृहस्पति या गुरू के गोचर के अशुभ प्रभाव को दूर करने के लिए स्नान किए जाने वाले जल में शहद, पीली सरसों के बीज, मालती के फूल, जूही, चमेली, केतकी, अश्वगंधा, बादाम, अखरोट और काजू डालने चाहिएं।

शुक्र : शुक्र के गोचर के अशुभ प्रभाव को दूर करने के लिए स्नान किए जाने वाले जल में केसर, सफेद कमल, गुलाब, चमेली डालनी चाहिए।

शनि : शनि के गोचर के अशुभ प्रभाव को दूर करने के लिए स्नान किए जाने वाले जल में काले तिल, सौंफ, शिलाजीत, त्रिफला और अश्वगंधा डालना चाहिए।

राहू : राहू के गोचर के अशुभ प्रभाव को दूर करने के लिए स्नान किए जाने वाले जल में दूरवा, बिलाव पत्तर, कपूर डालना चाहिए।

केतू : केतू के गोचर के अशुभ प्रभाव को दूर करने के लिए स्नान किए जाने वाले जल में अनार ओर लाल चन्दन डालना चाहिए।

email: info@saiastro.com

 आर. एस. पंवार

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