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जाग उठी नारी शक्ति

”शादी में ससुराल वालों ने मेरे परिवार वालों से एक बड़ी रकम देने की मांग रखी, जिसे मेरे परिजनों ने हर संभव पूरी करने की कोशिश की। ससुराल पहुंचने पर वहां दहेज न लाने के लिए तरह-तरह से तंग किया जाने लगा। एक दिन मेरे पति ने मुझे दूसरे व्यक्ति को बेचने की कोशिश की। ……………’’ सपना का यह दर्द सिर्फ एक झलक है, भारत में महिलाओं के प्रति हिंसा का। तमाम सामाजिक और आर्थिक विवशताएं और जागरूकता का अभाव होने से महिलाएं हिंसा और दुष्कर्म की शिकार होती हैं और देह-व्यापार जैसा घृणित कार्य करने के लिए मजबूर हो जाती हैं।

महिलाओं के दर्दनाक और अंतहीन कष्टों को किरण बेदी ने अपनी पुस्तक ‘जाग उठी नारी शक्ति’ के माध्यम से समाज के सामने लाने का सराहनीय प्रयास किया है। पुस्तक में बेदी ने ‘शादी कहूं या कोई भयानक सपना’, ‘चुप्पी और छिपाव ने बिगाड़ा जीवन’, ‘प्यार, शादी और उसके बाद’, ‘पति बना दलाल’ आदि जीवन-वृतों के माध्यम से महिलाओं की स्थिति को उजागर करने का प्रयास किया है।

महिलाओं को नर्क की आग में कैसे धकेला जाता है, इसे अफसाना अपने साथ घटी घटना में इस तरह बयां करती है – ”मैं हिंदू परिवार में जन्मी और दिल्ली में पदस्थापित एक बड़े खुफिया अधिकारी की एक बेटी हूं। मैं 12वीं कक्षा में पढ़ती थी। मैं अपने पापा से मिलने के लिए अकेली दिल्ली आ गई। दिल्ली मेरे लिए बिल्कुल नया शहर था। बस स्टॉप पर उतरते ही एक ऑटो वाले ने मुझे मेरे पिता के घर पहुंचाने की बात कही। मैं उस ऑटो में सवार हो गई। ऑटो वाला मेरे पिता के घर ले जाने की बजाय मुझे अपने घर ले गया और मेरे साथ बलात्कार किया। मजबूरन मुझे धर्मांतरित हो कर उस ऑटो चालक रियाज से शादी करनी पड़ी। आज मैं एक बच्चे की मां हूं। रियाज रोज शराब पीकर आता है। न मेरी फिक्र करता है और न बच्चे की।’’

ऐसी अनेक दास्तानें हैं, जहां धोखे और मजबूरी में महिलाओं को वह स्वीकार करना पड़ता है, जो उन्हें जलालत की जिंदगी और समाज की हिकारत के सिवाय और कुछ नहीं देता है। ‘पति बना दलाल’ में एक ऐसी महिला का जीवन चित्र है, जिसे नाजायज संबंधों के कारण देह व्यापार की दलदल में धकेल दिया गया है।

आईपीएस अधिकारी के रूप में किरण बेदी ने महिलाओं के खिलाफ हो रही हिंसा को बहुत करीब से देखा है। अपनी इस किताब में उन्होंने अलग-अलग महिलाओं की आप बीती सुनाई है जिन्हें पुलिस, मां, बाप, भाई, बहन, पति, प्रेमी और पड़ोसी ने नरक में ढकेल दिया है। जिन महिलाओं की इस किताब में बीती लिखी गई है, उन्होंने स्वेच्छा से अपनी जीवन को लेखिका के समक्ष खोला है। इन लोगों ने हिम्मत जुटाकर लेखिका को बताया कि उनके जीवन में क्या-क्या गलत हुआ और कैसे वे अपनी इस दुर्दशा के लिए स्वयं को और परिस्थितियों को उत्तरदायी मानती हैं। ऐसे लोगों में घरेलू हिंसा और पुलिस अत्याचार के मारे लोग, ड्रग्स लेने के आदी, अपराधी, बाल अपराधी शामिल हैं।

तिहाड़ जेल में महानिरीक्षक रहने के दौरान किरण बेदी ने सजा पूरी होने के बाद कैदियों के भविष्य के बारे में सोचा और उनके पुनर्वास के लिए 1994 में ‘इंडिया विजन फाउंडेशन’ की स्थापना की। इस संस्था का मुख्य उद्देश्य कैदियों के पुनर्वास के साथ ही उनकी कैद के दौरान उनके बच्चों की देखभाल करना और शिक्षा दिलाना भी शामिल है। नशे की लत और समाज के सताए लोगों की मदद की लिए 1988 में किरण बेदी ने ‘नवज्योति’ की स्थापना की थी।

भारत की पहली महिला आई. पी. एस. किरण बेदी साल 1972 में भारतीय पुलिस सेवा में शामिल हुईं। उन्हें जेल विभाग में रचनात्मक सुधार के लिए भी जाना जाता है। सामाजिक सेवाओं के लिए उन्हें ‘रेमन मैग्सेसे’ पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है। किरण बेदी की लिखी ‘इट्स ऑलवेज पॉसिबल’, ‘वॉट वेंट रॉन्ग’, ‘ऐज आई सी’, ‘अपराईजिंग 2011’ जैसी कई किताबें लिख चुकी हैं।

 सुधीर गहलोत

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