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बॉम्बे टॉकीज: एक महान सपने का अन्त

1947 में भारत विभाजन के बाद शीराज अली ने पाकिस्तान जाने का फैसला कर लिया। बॉम्बे टॉकीज एक बार फिर नए मालिक के पास चला गया। इस बार इसे एक मारवाड़ी व्यवसायी गोबिंदराम सैकिया ने खरीदा। सन् 1950 तक बॉम्बे टॉकीज के शेयरधारक और प्रबंधक बदल गए थे, लेकिन स्टूडियो जीवित था। उनके मैनेजर हितेन चौधरी अशोक कुमार और सेवक वाचा को कंपनी में वापस लाने में सफल हो गए।

अशोक कुमार और शशिधर मुखर्जी के जाने से कंपनी एक बार फिर संकट में घिर गई थी। 1944 में देविका रानी ने दो फिल्में बनाईं। इनमें से एक ‘चार आंखें’ थी, जिसमें पी. जयराज और लीला चिटनिस मुख्य भूमिकाओं में थे, फिल्म का निर्देशन सुशील मुखर्जी ने किया था।

दूसरी फिल्म ‘ज्वार भाटा’ का निर्देशन अमिय चक्रबर्ती ने किया था। इसमें दिलीप कुमार नाम के एक युवक की सहायक भूमिका में मौका दिया गया था। उस युवक का असली नाम युसुफ खान था, लेकिन देविका रानी को लगा कि दिलीप कुमार नाम ज्यादा पसंद किया जाएगा। मुख्य भूमिकाओं में आगा, शमीम बानो और मृदुला रानी थे। एक परिवार में दो बेटियां हैं, रमा (शमीम) और रेणु (मृदुला)। दोनों की उम्र शादी करने लायक है। रमा की शादी एक करोड़पति युवक नरेंद्र (आगा) से तय हो जाती है। शादी से पहले अपनी होने वाली पत्नी से मिलने के चक्कर में वेश बदलकर गया नरेंद्र, रेणु को रमा समझ बैठता है। रेणु को इस बात की आशंका तक नहीं है कि वह उसकी बहन का मंगेतर है। दोनों को एक दूसरे से प्यार हो जाता है। शादी हो चुकने के बाद जब गलती का पता चलता है तो रेणु भगवान से शिकायत करती है। परिवार वालों को जब इस बात का पता चलता है तो बदनामी के डर से वे रेणु को घर से निकाल देते हैं। उसकी मुलाकात एक गायक जगदीश (दिलीप कुमार) से होती है। बाद में घर लौटने पर उसे पता चलता है कि उसकी बहन गर्भवती है और बहुत बीमार है। उनके सामने सवाल है कि मां और बच्चे में से एक को ही बचाया जा सकता है। और फिल्म का अंत नाटकीय ढंग से एक चमत्कार के रूप में होता है।

1945 में बॉम्बे टॉकीज ने एक और फिल्म बनाई ‘प्रतिमा’। इसमें दिलीप कुमार और स्वर्णलता प्रमुख भूमिकाओं में थे। निर्देशन का भार पी. जयराज को सौंपा गया था। इन तीनों फिल्मों की असफलता ने देविका रानी को तोड़ दिया और उन्होंने बॉम्बे टॉकीज से अलग होना बेहतर समझा। बॉम्बे टॉकीज मे उनके शेयर शीराज अली हकीम ने खरीद लिए थे।

शीराज अली हकीम मुम्बई के फेमस स्टूडियो के मालिक थे। उनका इरादा धीरे-धीरे बॉम्बे टॉकीज को खत्म करके जगह का व्यावसायिक इस्तेमाल करने का था। लेकिन सन् 1947 में भारत विभाजन के बाद शीराज अली ने पाकिस्तान जाने का फैसला कर लिया। बॉम्बे टॉकीज एक बार फिर नए मालिक के पास चला गया। इस बार इसे एक मारवाड़ी व्यवसायी गोबिंदराम सैकिया ने खरीदा। सन् 1950 तक बॉम्बे टॉकीज के शेयरधारक और प्रबंधक बदल गए थे, लेकिन स्टूडियो जीवित था। उनके मैनेजर हितेन चौधरी अशोक कुमार और सेवक वाचा को कंपनी में वापस लाने में सफल हो गए। विश्व युद्ध खत्म हो जाने के बाद जर्मन सिनेमेटोग्राफर जोसेफ वर्सिंग को जेल से रिहा कर दिया गया था। वे भी बॉम्बे टॉकीज में लौट आए थे।

1946 के बाद से कई निर्देशकों के साथ काम किया गया। इस नई व्यवस्था के अंतर्गत पहली फिल्म बनी ‘मिलन’। रवींद्रनाथ ठाकुर की कहानी ‘नौका डूबी’ पर आधारित इस फिल्म का निर्देशन नितिन बोस ने किया था। दिलीप कुमार, रंजना, माया मिश्रा, मोनी चटर्जी और पहाड़ी सान्याल ने इसमें मुख्य भूमिकाएं निभाई थीं। इसमें दो शादीशुदा जोड़े शादी के बाद नाव से लौट रहे होते हैं। तूफान के कारण नाव उलट जाती हैं और दुल्हनें आपस में बदल जाती हैं। दिलीप कुमार ने अपनी पत्नी को पहले देखा ही नहीं था, इसलिए वह जान नहीं पाते कि जो दुल्हन उनके साथ है, वह उसकी पत्नी नहीं है। उधर पहाड़ी सान्याल की पत्नी जान जाती है कि वह गलत जगह पर आ गई है। अपने पति की तलाश में वह घर छोड़ देती है। अंत में एक नाटकीय घटनाक्रम के बाद सब ठीक हो जाता है।

1947 में नजम नकवी के निर्देशन में ‘नतीजा’ बनी। इसमें जिल्लो प्रमुख भूमिका में थी। 1948 में दो फिल्में बनीं। पहली नजीर अजमेरी के निर्देशन में ‘मजबूर’ थी, जिसमें श्याम और मुनव्वर सुल्ताना मुख्य भूमिकाओं में थे। दूसरी फिल्म ‘जिद्दी’ थी, जिसका निर्देशन शाहिद लतीफ ने किया था। कहानी उनकी पत्नी इस्मत चुगताई ने लिखी थी। देव आनंद, कामिनी कौशल, प्राण, प्रतिमा देवी और मुराद मुख्य भूमिकाओं में थे। हालांकि देव आनंद इससे पहले भी तीन फिल्में कर चुके थे, लेकिन सही अर्थों में उन्हें पहचान इसी फिल्म से मिली थी। इस फिल्म में संगीत खेमचंद प्रकाश ने दिया था और सिनेमेटोग्राफर जोसेफ वर्शिंग थे। अशोक कुमार के छोटे भाई, किशोर कुमार ने देव आनंद पर फिल्माया गया एक गाना ‘मरने की दुआएं क्यों मांगू’ गाया था। पहली बार किशोर को फिल्म में एक पूरा गाना गाने का मौका मिला था। लता मंगेशकर का गाया और कामिनी कौशल पर फिल्माया गया गाना ‘चंदा रे जा रे जा रे, पिया से संदेसा मोरा कहियो जाए’ काफी पसंद किया गया था।

सन् 1950 में बनी ‘महल’ बॉम्बे टॉकीज की एक और महत्वपूर्ण फिल्म है। इस फिल्म में अशोक कुमार और मधुबाला ने प्रमुख भूमिकाएं कीं। कथा, पटकथा, संवाद और निर्देशन कमाल अमरोही के थे। कमाल अमरोही का जन्म सन् 1918 में हुआ था। उन्होंने ओरियंटल कॉलेज लाहौर से ग्रेजुएशन किया था। लाहौर में रहने के दौरान ही उन्होंने उर्दू में कहानियां लिखना शुरू कर दिया था। सन् 1938 में अलीगढ़ से पढ़कर आए ख्वाजा अहमद अब्बास ने कमाल अमरोही की एक उर्दू कहानी का अंगेजी अनुवाद करके हिमांशु राय को दिखाया। यह अनुवाद पढ़कर हिमांशु राय बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने कमाल अमरोही को मुंबई आने का निमंत्रण दे दिया। मुंबई पहुंचकर कमाल अमरोही ने ‘आहों का मंदिर’ नाम से फिल्म की कथा, पटकथा लिखी। लेकिन हिमांशु राय के असामयिक निधन के कारण इस पटकथा पर फिल्म नहीं बन सकी। सन् 1938 में कमाल अमरोही ने सोहराब मोदी के निर्देशन में बनने वाली फिल्म ‘जेलर’ की कथा-पटकथा लिखी।
सन् 1941 में उन्होंने सोहराब मोदी के लिए उनकी फिल्म ‘पुकार’ लिखी। ‘महल’ कमाल अमरोही के निर्देशन में बननेवाली पहली फिल्म थी।

‘महल’ पुनर्जन्म के फर्मूले को जन्म देनेवाली और सशक्त ढंग से प्रस्तुत की गई फिल्म थी। एक पुराने महल, संगम भवन के माली की बेटी आशा, स्वयं को पिछले जीवन की कामिनी मानती है और दिलचस्प बात यह है कि संगम भवन के नए मालिक का बेटा शंकर बाद में खुद को कामिनी का पति मानने लगता है। जिस राजा ने यह महल बनवाया था, वह शादी की रात को ही मर जाता है और उम्र भर अपने पति का इंतजार करने के बाद रानी कामिनी का भी देहांत हो जाता है। यह कथा जब महल का माली अपने नए छोटे मालिक शंकर को सुनाता है तो शंकर रोज रात को महल में घूमने लगता है। शंकर के माता-पिता उसका विवाह रंजना से कर देते हैं। लेकिन शंकर का रोज महल में जाकर वहां गीत गाती आशा के पीछे भटकना नहीं छूटता। रंजना आत्महत्या कर लेती है और शंकर को गिरफ्तार कर लिया जाता है। शंकर का दोस्त श्रीकांत उसे बचाने की पूरी कोशिश करता है। अंत में जन्म-जन्मांतर के साथी शंकर और आशा मरने के बाद एक हो जाते हैं। फिल्म में संगीत खेमचंद प्रकाश ने दिया था। फिल्म के गाने बहुत लोकप्रिय हुए थे। लता मंगेशकर की आवाज में ‘आएगा आने वाला’ तो आज भी लोगों को पसंद आता है।

अशोक कुमार और सेवक वाचा ने 1950 में एक बार फिर बॉम्बे टॉकीज को छोड़ दिया। लेखक ललित जोशी लिखते हैं : ”स्टूडियो का प्रबंधन कर्मचारियों की एक को-ऑपरेटिव बनाकर उन्हें सौंप दिया गया था। उन्होंने काफी दिक्कतों के बाद किसी तरह तीन फिल्में ‘मशाल’ (1950), ‘मां’ (1952) और ‘तमाशा’ (1952) बनाईं, लेकिन इनमें से कोई भी नहीं चली।’’ ‘मशाल’ का निर्देशन नितिन बोस ने किया था, अशोक कुमार और सुमित्रा देवी मुख्य भूमिकाओं में थे। ‘मां’ में भारत भूषण और लीला चिटनिस की जोड़ी थी। ‘तमाशा’ में पहली बार मीना कुमारी बॉम्बे टॉकीज में काम कर रही थी। उनके साथ देव आनंद और अशोक कुमार भी थे।

कंपनी एक बार फिर कर्जे में घिर गई। इसे बचाने के लिए अशोक कुमार, देव आनंद, मीना कुमारी और कई अन्य लोग आगे आए और इसकी फिल्मों में बिना पैसा लिए काम करने का वचन दिया। 1954 में बनी ‘बादबान’ बॉम्बे टॉकीज की आखिरी फिल्म साबित हुई। इसमें देव आनंद, मीना कुमारी, अशोक कुमार और उषा किरण मुख्य भूमिकाओं में थे। एक छोटी सी भूमिका महमूद की भी थी, जिनके पिता मुमताज अली लंबे समय तक बॉम्बे टॉकीज से जुड़े रहे थे। इसका निर्देशन फणी मजूमदार ने किया था। पटकथा लिखने में नब्येंदु घोष और शक्ति सामंत ने मजूमदार का साथ दिया था। संगीत तिमिर बरन और एस.के. पाल का था। सिनेमेटोग्राफर रोक एम. लिटन थे।

इसके बाद बॉम्बे टॉकीज को एक पूंजीपति तोलाराम जालान ने खरीद लिया। जालान ने ही 1953 में फिल्मिस्तान को भी खरीदा था। बॉम्बे टॉकीज को खरीदने के बाद जालान ने पहला काम यह किया कि दरवाजे पर एक ताला लगा दिया। उनका इरादा इस जगह को एक व्यावसायिक केंद्र के रूप में विकसित करने का था। कई कानूनी लड़ाइयों के बाद आखिरकार हिमांशु राय और देविका रानी का महत्वाकांक्षी सपना एक अनाम अंत को प्राप्त हुआ।

 

सुरेश उनियाल

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