ब्रेकिंग न्यूज़ 

अंधेरे से ‘प्रकाश की ओर’ जाने का पर्व है दीपावली!

दीपावली प्रकाश का यह पर्व समाज से अंधकार को समाप्त कर उल्लास, भाईचारे व प्रेम का संदेश फैलाने की प्रेरणा देता है, न कि खतरनाक पटाखों को जलाकर प्रदूषण फैलाने का। दीपावली के त्यौहार का मतलब पटाखे जलाना नहीं होता है। दीपावली वाले दिन पटाखों के कारण दमे के कितने ही मरीज खांसते-खांसते परेशान हो जाते हैं? कितने ही घरों में आग लग जाती है और कितने लोगों की मृत्यु पटाखों के कारण हो जाती है।

दीपावली शब्द ‘दीप’ एवं ‘आवली’ की संधि से बना है। ‘आवली’ का शाब्दिक अर्थ है ‘पंक्ति’। इस प्रकार ‘दीपावली’ का शाब्दिक अर्थ है ‘दीपों की पंक्ति’। भारतवर्ष में मनाए जाने वाले सभी त्यौहारों में दीपावली का सामाजिक और धार्मिक, दोनों दृष्टि से अत्यधिक महत्त्व है। अंधकार पर प्रकाश की विजय का यह पर्व सभी धर्म के लोगों द्वारा मनाया जाता है। हिन्दू मान्यता के अनुसार, दीपावली के दिन भगवान श्री रामचंद्र 14 वर्ष के वनवास के पश्चात् अयोध्या लौटे थे।। अपने परम प्रिय राजा के स्वागत में अयोध्यावासियों ने घी के दीए जलाए थे। तब से लेकर आज तक यह प्रकाश-पर्व भारतवर्ष में बड़े ही हर्ष व उल्लास के साथ मनाया जाता है। भारतीयों का विश्वास है कि सत्य की सदा जीत होती है। दीपावली यही चरितार्थ करती है – ”असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय।’’

इस प्रकार दीपावली अंधेरे से प्रकाश की ओर जाने का पर्व है। इस प्रकार आज भी प्रत्येक वर्ष दीपावली के दिन एक दीपक से दूसरा दीपक जलाया जाता है और इन दीपों से निकलने वाली यह लौ (प्रकाश) सदियों से सारे संसार को शांति व भाइचारे का संदेश देती आ रही है।

बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व

कृष्ण भक्तिधारा के लोगों का मत है कि इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने अत्याचारी राजा नरकासुर का वध किया था। इस नृशंस राक्षस के वध से जनता में अपार हर्ष फैल गया और प्रसन्नता से भरे लोगों ने घी के दीए जलाए थे। एक पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान विष्णु ने नरसिंह रुप धारण कर हिरण्यकश्यप का वध किया था। माना जाता है कि इसी दिन समुद्र मंथन के पश्चात लक्ष्मी व धन्वंतरि प्रकट हुए थे। जैन मतावलंबियों के अनुसार, 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी का निर्वाण दिवस भी दीपावली को ही है। 1577 ई. में इसी दिन अमृतसर के स्वर्ण मन्दिर का शिलान्यास हुआ था और 1619 ई. में दीवाली के दिन सिक्खों के छठे गुरु हरगोबिन्द सिंह जी को जेल से रिहा किया गया था। इसलिए सिक्ख भी इस दिन को बहुत ही उत्साह और खुशी से मनाते हैं।

ज्ञान, विवेक एवं मित्रता की लौ जलाने का पर्व है दीपावली

दक्षिण में दीवाली उत्सव के संबंध में एक और कथा प्रचलित है। हिंदू पुराणों के अनुसार, राजा बलि एक दयालु और दानवीर दैत्यराज था। वह इतना शक्तिशाली था कि स्वर्ग के देवताओं व उनके राज्य के लिए खतरा बन गया। बलि की ताकत को खत्म करने के लिए भगवान विष्णु ने एक बौने ब्राह्मण भिक्षुक का रूप धरा और राजा बलि के पास जा कर चतुराई से तीन पग के बराबर भूमि मांगी। राजा बलि ने खुशी के साथ यह बौने भिक्षुक के रूप में आए भगवान विष्णु को उनका मांगा दान दे दिया। राजा बलि को कपट से फंसाने के बाद, भगवान विष्णु ने स्वयं को प्रभु के स्वरूप में पूर्ण वैभव के साथ प्रकट कर दिया। उन्होंने अपने पहले पग (पैर) से ‘स्वर्ग’ व दूसरे पग से ‘पृथ्वी’ को नाप लिया, तब राजा बलि को वास्तविकता का ज्ञान हुआ और उन्होंने अपना शीश अर्पित करते हुए भगवान विष्णु को अपना तीसरा पग उस पर रखने के लिए आमंत्रित किया। भगवान विष्णु ने अपने अगले पग से उसे अधोलोक में धकेल दिया। राजा बलि की दानवीरता से प्रसन्न हो कर बदले में समाज से अंधकार दूर करने के लिए उसे ज्ञान का दीपक प्रदान किया। उन्होंने उसे यह आशीर्वाद भी दिया कि वर्ष में एक बार अपने एक दीपक से लाखों दीपक जलाने के लिए वह जनता के पास आएगा। ताकि दीपावली की अंधेरी रात में दीपक की रोशनी से अज्ञान, लोभ, ईष्र्या, कामना, क्रोध, अहंकार और आलस्य के अंधकार को दूर करते हुए सभी में ज्ञान, विवेक और मित्रता की लौ जलाई जा सके।

खतरनाक पटाखों को जलाकर प्रदूषण फैलाने का पर्व नहीं है दीपावली

मुगल बादशाह भी बड़े उत्साह के साथ दीपावली मनाया करते थे। दीन-ए-इलाही के प्रवर्तक मुगल सम्राट अकबर के शासन काल में दीपावली के दिन उसके दौलतखाने के सामने 40 गज ऊंचे बंास पर एक बड़ा आकाशदीप लटकाया जाता था। बादशाह जहांगीर भी दीपावली धूम-धाम से मनाते थे। मुगल वंश के अंतिम सम्राट बहादुर शाह जफर दीपावली को त्यौहार के रूप में मनाते थे और इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रमों में भी भाग लेते थे। शाह आलम द्वितीय के समय में समूचे शाही महल को दीपों से सजाया जाता था और लाल किले में आयोजित कार्यक्रमों में हिन्दू-मुसलमान, दोनों मिलकर भाग लेते थे। इस प्रकार दीपावली प्रकाश का यह पर्व समाज से अंधकार को समाप्त कर उल्लास, भाईचारे व प्रेम का संदेश फैलाने की प्रेरणा देता है, न कि खतरनाक पटाखों को जलाकर प्रदूषण फैलाने का। दीपावली के त्यौहार का मतलब पटाखे जलाना नहीं होता है। दीपावली वाले दिन पटाखों के कारण दमे के कितने ही मरीज खांसते-खांसते परेशान हो जाते हैं? कितने ही घरों में आग लग जाती है और कितने लोगों की मृत्यु पटाखों के कारण हो जाती है।

अपने जीवन को आध्यात्मिक प्रकाश से प्रकाशित करने का पर्व है दीपावली

अपने जीवन को आध्यात्मिक प्रकाश से प्रकाशित करने का पर्व है दीपावली। दीपावली परिवार, समाज, देश एवं विश्व में शांति एवं एकता का त्यौहार है। दीपावली में मिट्टी के दीयों को जलाने की परंपरा रही है। हमारा यह शरीर भी मिट्टी के दीये का ही प्रतीक है। इस शरीर रूपी मिट्टी के दीये में परमात्मा की दी हुई लौ (आत्मा) बाती के रूप में जल रही है। हमारा मानना है कि जिस प्रकार एक जलता हुआ दीया, अनेक बुझे हुए दीयों को प्रज्ज्वलित कर सकता है, ठीक उसी प्रकार ईश्वरीय प्रकाश से प्रकाशित किसी भी मनुष्य की आत्मा, दूसरी आत्माओं को भी आध्यात्मिक प्रकाश से प्रज्ज्वलित कर एक सभ्य एवं समृद्ध समाज का निर्माण कर सकती है। इस प्रकार दीपावली तो सारे समाज में व्याप्त ईष्र्या, विद्वेष, अशांति, आपसी मनमुटाव व अनेकता जैसे अधंकार को आध्यात्मिक प्रकाश से समाप्त करते हुए, अंधेरे से प्रकाश की ओर जाने का पावन पर्व है। दीपावली के इस पावन पर्व पर अपने जीवन को अंधेरे से प्रकाश की ओर ले चलने का संकल्प लेना चाहिए।

दीपावली जरूर मनाना, पर पटाखे
नहीं जलाना।
प्रदूषण नहीं फैलाना,
सभी को यही बताना।।
पटाखे नहीं जलाना, किसी को नहीं सताना।
सभी को यही सिखाना, प्रदूषण नहीं फैलाना।।
पटाखे नहीं जलाना।।
-जय जगत-

 

डॉ. जगदीश गांधी

canon 6020 ценалобановский обыск

Leave a Reply

Your email address will not be published.