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चकाचौंध करती सोने की चमक

सोने से जुड़ी हर खबर भारतीय जन-मानस को झकझोर देती है। खबर चाहे सोने के भाव में उतार-चढ़ाव से उपजी हो या छिपा खजाना मिलने से। पिछले दिनों जब सोने के भाव में भारी गिरावट आई, तब सुनारों की दुकानों के सामने ग्राहकों की लंबी लाइन लग गई थीं। उन्नाव जिले में सोने की खोज का काम शुरू हुआ तो वहां मेला लग गया।

सुनने में अजीब लगेगा, लेकिन है यह सच। देश में सोने के सबसे बड़े झावेरी बाजार (मुंबई) में इन दिनों मायूसी छाई हुई है। जो मार्केट दीपावली और शादियों के मौसम से गुलजार रहता था, वहां इन दिनों जौहरी और सोने के डीलर खाली बैठे हैं। आधे शोकेस खाली पड़े हैं। मुंह मांगी कीमत देने पर भी ग्राहकों को सोने के सिक्के और छड़ नहीं मिल रहीं। भारत के बुलियन किंग ऋद्धी-सिद्धी के कर्मचारी माल की मांग करने वालों के फोन सुनने से कतरा रहे हैं। सरकार ने आयात नियम इतने सख्त कर दिए हैं कि बाहर से सोना मंगाना बहुत कठिन हो गया है। सोने के दीवानों को लगता है मानों इस दीपावली पर लक्ष्मीजी उनसे रूठ गई हैं। प्याज भले ही सौ रूपए किलो के लकवामारू भाव पर बिक रही हो, लेकिन सोने के प्रति लोगों की दीवानगी ज्यों की त्यों बनी हुई है।

सरकार की लाख कोशिशों के बावजूद देश में सोने की मांग कम होने का नाम नहीं ले रही है। इसका ठोस कारण सोने का हमारी संस्कृति का मुख्य हिस्सा बनना है और उसे अर्थशास्त्र के नियमों के अनुसार हांका नही जा सकता। पश्चिमी देशों में जहां इस पीली धातु को डेड इन्वेस्टमेंट माना जाता है, वहीं भारत में इसे पवित्रता और आर्थिक सुरक्षा की गारंटी माना जाता है। भारतीयों के लिए सोना लक्ष्मी का प्रतीक और संपन्नता का सूचक है। इसीलिए थोड़ा-सा पैसा जमा होते ही हर भारतीय सोना खरीदना चाहता है। इस मामले में शिक्षित-अशिक्षित तथा संपन्न-निर्धन के सोच में कोई फर्क नहीं है।

हिंदुओं में अक्षय तृतीया और धनतेरस जैसे पर्व तो सीधे-सीधे स्वर्ण खरीद से जुड़े हैं। मंदिरों में भगवान के चरण में सोना अर्पित करने की परंपरा सदियों पुरानी है। इसी कारण कई बड़े मंदिरों के पास अकूत स्वर्ण भंडार हैं। दो बरस पहले पद्मनाभन मंदिर के तहखाने से मिले खजाने की चकाचौंध से अब तक लोगों की आंखें चुंधियाई हुई हैं। एक अनुमान के अनुसार तिरूपति के बालाजी मंदिर के पास लगभग एक हजार टन सोना है, जो देश का एक साल का आयात बिल भरने को पर्याप्त है। हिंदू ही नहीं अनेक सिख, ईसाई, मुस्लिम, जैन और बौद्ध धार्मिक स्थल भी अपनी स्वर्ण नक्काशी और भंडार के लिए विख्यात हैं। इस क्रम में अमृतसर के स्वर्ण मंदिर, आगरा की मस्जिद, कर्नाटक के बौद्ध मठ और अजमेर के जैन मंदिर का नाम आसानी से लिया जा सकता है। भारत में हर धर्म और जाति के लोग सोने के मोहपाश में बंधे हैं। अर्थशास्त्र के जो प्रोफेसर अपनी कक्षा में छात्रों को सोने के बजाय शेयर बाजार में पैसा लगाने का पाठ पढ़ाते हैं, घर लौटकर पहली फुर्सत में वे अपनी बचत के बड़े हिस्से से बीबी, बेटियों और बहुओं के लिए गहने खरीदते हैं। महिलाओं के लिए तो सोना उनके आड़े वक्त का बीमा है। कानूनन भी जेवर-गहने स्त्री धन की श्रेणी में आते हैं और उन पर विवाहिता का एकाधिकार होता है।

सरकार के सपने में सोना
विज्ञान में अनुमान का कोई स्थान नहीं होता। उन्नाव के किले में की जा रही खुदाई तो अनुमान नहीं, कोरे अंधविश्वास के आधार पर चल रही है। एक साधु के सपने का सत्य जानने के लिए भारत सरकार ने भू-गर्भ सर्वेक्षण विभाग को खुदाई के काम में लगा दिया। भले ही इससे तमाशबीनों का वहां जमावड़ा जुट गया हो तथा टीआरपी बढ़ाने के लिए टीवी चैनलों में होड़ मच गई हो, लेकिन कटु सत्य यही है कि इस एक घटना से दुनिया भर में भारत का मजाक बना है। एक हजार टन सोना जमीन में गड़े होने के साधु शोभन सरकार के दावे से केन्द्र सरकार का मानसिक संतुलन गड़बड़ा गया है। उसने अपने वैज्ञानिकों को एक बाबा के सपने का सच जानने के लिए खुदाई में लगा दिया है। सोना सनसनी फैलाता है, यह तो पता था, लेकिन इसका गुमान नहीं था कि इससे सरकार के होशो-हवास भी उड़ जाते हैं।
केन्द्र सरकार के इस कदम से पुरातत्व महत्व के महलों और मंदिरों की शामत आ गई है। उत्तर प्रदेश के फतेहपुर में गंगा घाट पर बने एक प्राचीन मंदिर का चबूतरा कुछ लालची लोगों ने खोद डाला। इस जिले में दो दर्जन वीरान खंडहरों की गैर कानूनी खुदाई की खबर तक मिल चुकी है। बहराइच जिले के एक किले में भी गहरे गड्ढे खोदे जाने का समाचार है। शोभन सरकार के सपने से लालची लोगों की कल्पनाओं को पंख लग गए हैं। हर पुराने महल, हवेली और मंदिर में उन्हें गड़ा सोना नजर आने लगा है। इसके लिए उन्हें दोष नहीं दिया जा सकता। सरकार को अपनी गरीब जनता की आह और कराह सुनाई न देकर, एक साधु के सपने पर विश्वास हो, वहां तो फिर भगवान ही मालिक होता है। जब सरकार ही अपने लालच पर नियंत्रण नहीं रख पाई, तो जनता से इसकी अपेक्षा कैसे की जा सकती है।
आज दुनिया का एक-चौथाई सोना अकेले हिंदुस्तानी खरीदते हैं। चालू खाते के घाटे पर अंकुश लगाने के लिए केंद्र सरकार ने सोने के आयात को नियंत्रित करने का प्रयास किया, लेकिन अब तक उसे अपेक्षित सफलता नही मिल पाई है। वित्त मंत्री ने स्वर्ण आयात शुल्क चार से बढ़ाकर दस फीसदी कर दिया है, फिर भी इसकी मांग कम नहीं हुई है। दुनिया और भारत के स्वर्ण बाजार भाव में आज खासा अंतर है, फिर भी शादी-ब्याह का सीजन शुरू होते ही लोग धड़ाधड़ गहने खरीदने लगते हैं। हमारे यहां विवाह में गहने देने का रिवाज सदियों पुराना है। माना जाता है कि किसी शादी का तीस से पचास प्रतिशत खर्च अकेले जेवरों पर होता है। गरीब या अमीर सभी अपनी हैसियत के हिसाब से बेटी-बहू को आभूषण देते हैं। इसी कारण कहा जाता है कि हर लड़की की शादी पहले गहनों से होती है, बाद में लड़के से।

देश का मौजूदा स्वर्ण भंडार बीस से चालीस हजार टन के बीच आंका जाता है और इसका सत्तर फीसदी हिस्सा गांवों-शहरों में रहने वाले करोड़ों लोगों के पास है। भारतीय रिजर्व बैंक के पास तो मात्र 557.7 टन सोना है जो हमारी मुद्रा (रुपए) की स्थिरता के लिए आवश्यक है। जनता की सोने की भूख के कारण ही सन् 2001-02 से 2011-12 के बीच देश को 6326 टन सोना आयात करना पड़ा। पिछले पांच बरस में चालू खाते का घाटा बढ़कर पांच गुना हो जाने का एक प्रमुख कारण सोने का भारी आयात भी है। हमारे देश में सोना खरीदना और उसे पीढ़ी दर पीढ़ी सुरक्षित रखना जनता का शौक नहीं, जुनून है। इस जुनून को समझने के लिए सदियों पीछे जाना जरूरी है।

हिंदुस्तान की जनता के पास जमा सोना उसकी सैकड़ों बरस की मेहनत और हुनर का परिणाम है, जबकि अमेरिका और यूरोपीय देशों का स्वर्ण भंडार उनके साम्राज्यवादी शासन और लूट की निशानी है। राजीव व विवेक दहेजा ने अमेरिकी जर्नल में प्रकाशित अपने शोधपत्र में लिखा है कि मौर्य वंश (325-185 ई.पू.) के शासन काल में यूरोपीय व अन्य देशों को अपना माल निर्यात कर भारत में अकूत स्वर्ण भंडार जमा कर लिया था। इस दौरान रोमन सीनेट के सदस्य शिकायत करते पाए जाते थे कि उनका सारा सोना भारत चला जाता है। एंगुस मेडीसन ने अपने शोधपत्र (2001) में दावा किया कि सोलहवीं सदी तक भारत का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) दुनिया में सर्वाधिक था, जो दो सदी तक चीन के बाद दूसरे नंबर पर रहा। यह वही दौर था जब हिंदुस्तान को सोने की चिडिय़ा कहा जाता था। दो सौ साल की ब्रिटिश गुलामी के दौरान सोने की इस चिडिय़ा के सारे पंख बेदर्दी से नोंच लिए गए। फिर भी भारत की जनता का सोने से लगाव बरकरार है।

अमेरिकी सरकार के पास आज बीस हजार टन स्वर्ण भंडार है, जिसके बल पर वह दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक व सैन्य शक्ति बना हुआ है। उसकी ”मुद्रा डॉलर’’ को दुनिया की रिजर्व करेंसी का सम्मान प्राप्त है। पिछली सदी के तीसवें दशक में मंदी ने जब पूरी दुनिया को अपनी चपेट में लिया हुआ था, तब अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रेंकलिन रूजवेल्ट ने सोने का राष्ट्रीयकरण कर दिया। जनता को सोना रखने का अधिकार नही रहा। सन् 1976 में जनता को सोना खरीदने और अपने पास रखने की फिर छूट दी गई, लेकिन तब तक अमेरीकियों को शेयर बाजार में पैसा लगाने और कमाने की लत पड़ चुकी थी। आज वहां दो-तिहाई लोगों की बचत का पैसा स्टॉक मार्केट में लगा हुआ है। दूसरी तरफ भारत है, जहां महज तीन फीसदी लोग शेयर बाजार में पैसा लगाते हैं। सेन्ट्रल स्टेस्टिकल आर्गनाइजेशन (सीएसओ) के अनुसार देश की जनता अपनी बचत का दो-तिहाई धन सोना और जमीन-जायदाद खरीदने में लगाती है। पश्चिमी देशों में सोना खरीदने पर लोग अपनी बचत का केवल तीन प्रतिशत धन खर्च करते हैं, जबकि हिंदुस्तान में यह आंकड़ा तेतीस फीसदी है। भारतीय सांस्कृतिक मूल्य बचत करना और बचत का पैसा सुरक्षित मद में लगाना सिखाते हैं। प्राचीन धार्मिक, आर्थिक और सामाजिक शिक्षा के अनुसार निवेश का सर्वाधिक सुरक्षित माध्यम सोना है। भारतीय समाज पर यह धारणा आज भी हावी है। इसका लाभ भी मिला है। पिछले पांच साल के दौरान सोने में निवेश करने वालों को बीस प्रतिशत रिटर्न मिला, जो स्टॉक मार्केट से ज्यादा है।

सोने से जुड़ी हर खबर भारतीय जनमानस को झकझोर देती है। खबर चाहे सोने के भाव में उतार-चढ़ाव से उपजी हो या छिपा खजाना मिलने से। पिछले दिनों जब सोने के भाव में भारी गिरावट आई, तब सुनारों की दुकानों के सामने ग्राहकों की लंबी लाइन लग गई थीं। उन्नाव जिले में सोने की खोज का काम शुरू हुआ, तो वहां मेला लग गया। भारत में सोने को आर्थिक सिद्धांतों की तराजू में तोला नहीं जा सकता। इसीलिए कहा जा सकता है कि अर्थशास्त्र के नियम लोगों का जीवन नहीं बदल सकते, नियमों को जनता के जीवन के अनुरूप ढ़लना पड़ता है। भारत में तो यह बात शत-प्रतिशत लागू होती है।

 

धर्मेंद्रपाल सिंह

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