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भारत का मंगल अभियान

आगामी 5 नवंबर को भारत का मंगलयान श्रीहरिकोटा से ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (पीएसएलवी) के जरिए मंगल यात्रा पर रवाना हो जाएगा। भारत के इस महत्वाकांक्षी मिशन पर पूरे देश और दुनिया की नजरें हैं। यह पहला अवसर है जब भारत का यान किसी दूसरे ग्रह के अन्वेषण के लिए जा रहा है। पांच साल पहले भारत ने पृथ्वी के उपग्रह, चंद्रमा के अध्ययन के लिए चंद्रयान -1 मिशन भेजा था, जो बेहद सफल रहा था।

सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो मंगलयान 40 करोड़ किलोमीटर की यात्रा पूरी करने के बाद 21 सितंबर 2014 को मंगल की कक्षा में प्रवेश करेगा। मंगल पर पहुंचने के बाद मंगलयान 363 किलोमीटर से 80 हजार किलोमीटर की कक्षा में काम करेगा। इसका अर्थ यह हुआ कि मंगल की सतह से उसकी न्यूनतम दूरी 363 किलोमीटर और अधिकतम दूरी 80हजार किलोमीटर होगी। मंगलयान का सक्रिय जीवन छह महीने का होगा।

बंगलुरू के निकट ब्यालालु में भारतीय गहन अंतरिक्ष नेटवर्क कीटीम के लिए यह एक बहुत बड़ा इम्तिहान होगा, क्योंकिअधिकांश मंगल मिशन इस चरण पर विफल हो चुकेहैं। दुनिया में मंगल मिशनों की सफलता की दर सिर्फ 33 प्रतिशत है। भारतीय वैज्ञानिक यदि मंगलयान को मंगल की कक्षा में स्थापित करने में कामयाब हो जाते हैं तो यह भारत के पचास वर्ष पुराने अंतरिक्ष क्रार्यक्रम के लिए एक बहुत बड़ी छलांग होगी। इसरो के पूर्व अध्यक्ष कृष्णास्वामी कस्तूरीरंगन ने मंगल मिशन को भारत की ग्रह अन्वेषण रणनीति का हिस्सा बताया है। उनके मुताबिक इस मिशन से अंतरराष्ट्रीय सहयोग का रास्ता तैयार हो सकता है।

यदि किसी कारणवश इस यान को अगले साल नवम्बर में रवाना नहीं किया जा सका तो हमें मंगलयान की यात्रा के लिए अनुकूल दूरी का इन्तजार करना पड़ेगा। दूसरा अवसर 2016 में ही मिल पाएगा। मंगलयान परियोजना का बजट करीब 450 करोड़ रूपए है। यदि हम दुनिया के दूसरे देशों के मिशनों को देखें तो भारतीय मिशन की लागत बहुत कम है। यान के साथ 24 किलो का पेलोड भेजा जाएगा। इनमें कैमरे और सेंसर जैसे उपकरण शामिल हैं जो मंगल के वायुमंडल और उसकी दूसरी विशिष्टताओं का अध्ययन करेंगे। मंगल की कक्षा में स्थापित होने के बाद यान मंगल के बारे में महत्वपूर्ण जानकारियां भेजेगा। मंगलयान का मुख्य फोकस संभावित जीवन, ग्रह की उत्पत्ति, भौगोलिक संरचनाओं और जलवायु आदि पर रहेगा। यान यह पता लगाने की भी कोशिश करेगा कि क्या लाल ग्रह के मौजूदा वातावरण में जीवन पनप सकता है।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसन्धान केन्द्र (इसरो) के पूर्व अध्यक्ष प्रो.यू. आर. राव मंगलयान परियोजना के साथ सक्रिय रूप से जुड़े हैं। उनके नेतृत्व में गठित समिति ने मंगलयान द्वारा किए जाने वाले प्रयोगों का चयन किया है। प्रो. राव के अनुसार उनकी टीम ने मंगल के लिए कुछ नायाब किस्म के प्रयोग चुने हैं। एक प्रयोग के जरिए मंगलयान लाल ग्रह के मीथेन रहस्य को सुलझाने की कोशिश करेगा। मंगल पर जीवन की खोज में मीथेन का खास महत्व है। पृथ्वी पर मीथेन गैस ज्यादातर जीव-जंतुओं द्वारा उत्पन्न की जाती है। गायों और अन्य जानवरों के पेट में सक्रिय बैक्टीरिया मीथेन गैस उत्पन्न करते हैं।

इस समय मंगल के गेल केटर में सक्रिय नासा की क्यूरिऑसिटी रोवर को वहां मीथेन गैस के कोई संकेत नहीं मिले हैं। क्यूरिऑसिटी रोवर की विपरीत रिपोर्ट के बावजूद कुछ वैज्ञानिकों को मंगल पर मीथेन की मौजूदगी के बारे में पूरा भरोसा है। मीथेन की तलाश के मंगलयान क्यूरिऑसिटी रोवर के मुकाबले ज्यादा बेहतर स्थिति में होगा। यदि मंगलयान को इस बारे में कोई सकारात्मक संकेत मिलता है तो मंगल पर मीथेन की खोज में वैज्ञानिकों की दिलचस्पी बढ़ जाएगी।

इसरो के वैज्ञानिक इन प्रयोगों को लेकर काफी आशान्वित हैं। उनका कहना है की जब हमने चंद्रयान-1 छोड़ा था, तब किसी को यह उम्मीद नहीं थी कि हम चांद पर पानी की मौजूदगी के संकेत खोज लेंगे। इस दौड़ में देर से शामिल होने के बावजूद हमने वहां पानी की खोज करकेपूरी दुनिया को चौंका दिया था। इसी तरह मंगलयान मिशन से भी हमें कुछ चौंकाने वाली जानकारियां मिल सकती हैं।

मंगल आज भले ही एक बेजान ग्रह नजर आता है, लेकिन उसकेबारे में कई सवालों के जवाब अभी मिलने बाकी हैं। मंगल के बारे में हम अभी बहुतकम जानते हैं। पृथ्वीवासियों के लिए मंगल अन्वेषण का विशेष महत्व है। हमारे संसाधन तेजी से खत्म हो रहे हैं। संसाधनों के वैकल्पिक स्रोतों के लिए हमें अन्तरिक्ष में नए ठिकाने खोजने होंगे। अगले 500 साल के अन्दर मंगल पृथ्वी के लिए संसाधनों का स्रोत बन सकता है। अनेक वैज्ञानिकों का ख्याल है कि मंगल को रहने लायकबनाया जा सकता है लेकिन इसकेलिए बहुत ज्यादा प्रयास करने होंगे।

 

मुकुल व्यास

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