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सरदार वल्लभ भाई पटेल : बपौती पर ओछी राजनीति

सरदार भाई पटेल आज जीवित होते तो अपने उच्च मानवीय मूल्यों तथा राष्ट्र के कल्याण के लिए उद्दात संस्कारों को इस प्रकार से गर्त में जाते देखकर काफी दुखी होते और उनकी आत्मा इस बात पर अवश्य रोती कि जिस हिंदुस्तान को अखंड तथा एकीकृत करने के लिए उन्होंने महती कोशिश की, वही राष्ट्र आज फिरकापरस्ती, पारिवारिक जागीरदारी तथा सियासी निजी मिल्कियत के रूप में बड़ी बेदर्दी से बांटी जा रही है।
गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा राज्य के आदिवासी बहुल नर्मदा जिले में ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ के शिलान्यास के साथ जिस कदर कांग्रेस पार्टी साम्प्रदायिकता एवं धर्म की आग पर राजनीतिक रोटियां सेंकने की कोशिश कर रही है, उससे भारत सरीखे लोकतान्त्रिक एवं धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की गौरवशाली परम्परा अपने एक नए रिकार्ड के साथ गर्त में जा रही है। राजनीति, धर्म, संप्रदाय तथा राष्ट्रवाद की क्षिप्रता से बदलते मानकों के इस आधुनिक संक्रमण काल में एक अहम प्रश्न यह खड़ा होता है कि आखिर स्वतंत्र भारत के प्रथम गृहमंत्री तथा आदर्श एकीकृत भारत के कद्दावर किसान प्रणेता सरदार वल्लभ भाई पटेल किसकी बपौती हैं। किसी विशेष राजनीतिक दल की या फिर सम्पूर्ण भारतवर्ष के सवा सौ करोड़ अवाम की। प्रखर राष्ट्रवादी नेता सरदार वल्लभ भाई पटेल को तथाकथित हिन्दू राष्ट्रवादी नेता नरेंद्र मोदी द्वारा अपने वैचारिक आदर्श के रूप में प्रतिस्थापित करने तथा उनके आदर्शों, दर्शनों एवं दिशाओं के अनुरूप एक श्रेष्ठ भारत बनाने की महत्वाकांक्षी कोशिश पर जिस तरह की घिनौनी राजनीति के ड्रामे का मंचन किया जा रहा है, वह भारतीय राजनीति के कर्णधार के रूप में हमारे राजनेताओं की चाल, चरित्र एवं चेहरे पर आत्म मीमांसा के कई प्रश्नों को अनायास ही जन्म दे देता है।

सवाल यह है कि सरदार पटेल सरीखे राष्ट्रीय नेता एवं एकीकृत हिंदुस्तान के वास्तविक नायक क्या किसी सियासी परिचय के मोहताज हैं। आदर्श महापुरुषों के जीवन के उसूल तथा फलसफे को क्या सियासी दलों की सत्तासुख की महत्वाकांक्षा के घृणित सांप-सीढ़ी के खेल के आधार पर तकसीम किया जा सकता है। कांग्रेस की इस अति संकुचित अवधारणा के पक्ष में इस दलील का बाजार बहुत गर्म है कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या के उत्तरकाल में सरदार पटेल ने गृहमंत्री के अख्तियार से राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की तथाकथित संदेहास्पद भूमिका के लिए प्रतिबंधित कर दिया था तथा इसे अपना लिखित संविधान निर्मित करने का निर्देश दिया गया था। इसके साथ ही यह भी हिदायत दी गयी थी कि राष्ट्रीय स्वंय सेवक अपनी गतिविधियां केवल एक सांस्कृतिक संगठन के रूप में ही सीमित रखे। फिर यह कैसे संभव है कि उसी सांस्कृतिक संगठन की विचारधारा से तथाकथित रूप से अपना वैचारिक पोषण प्राप्त करने वाले नरेन्द्र मोदी सरीखे राजनीतिक शख्स सरदार वल्लभ भाई पटेल के दर्शन को जब आधुनिक एकीकृत हिंदुस्तान के विकास का आधार बनाकर पैरोकारी कर रहे हैं, तो कांग्रेसी नेता राष्ट्रवाद के इस नए संस्करण को इतनी आसानी से पचा लेंगे?

सरदार पटेल की विश्व में सबसे ऊंचे कद की प्रतिमा के शिलान्यास के पीछे नरेन्द्र मोदी की जो भी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष राजनीतिक मंशा एवं मनोकामनाएं रही हों, उससे इतर आज इस बात पर शिद्दत से चिंतन का प्रश्न है कि सरदार पटेल के उसूलों को उन्होंने अपनी खुद की पार्टी के विशुद्ध सियासी एजेंडे से बिलकुल अलग होकर बड़े भक्तिभाव से राष्ट्र के मंच पर आम जनता के दिलों में लाने की कोशिश की है, जिसमें विकृत गूढ़ार्थ को पढऩे के अपराध से बचने की जरुरत है।

महाभारत के एक प्रसंग में प्राय: एक प्रश्न पूछा जाता है कि कुरुक्षेत्र के युद्ध क्षेत्र में महान धनुर्धर अर्जुन की दुविधा के क्या कारण थे। कहते हैं कि युद्ध का क्षेत्र उसका वर्तमान था, जो कि बढ़ते-बढ़ते अतीत के रूप में उसका मोह बन चुका था और अंत में वह भविष्य की चिंता से ग्रसित हो गया था। कांग्रेस पार्टी आज लोकसभा चुनावों के मद्देनजर सियासी महाभारत के जिस संग्राम क्षेत्र में खड़ी है, वह अर्जुन की उस दुविधा की स्थिति से रत्ती भर भी भिन्न नहीं है, जहां से वह बीते हुए कल के सत्ता सुख के मोह से ग्रसित होकर भविष्य के दुष्परिणामों से परेशान हो उठा है। किसी राष्ट्र के महान व्यक्तित्व के कृतित्व किसी राजनीतिक दल की पहचान से बंध कर नहीं रह सकता है। इस देश में करोड़ों दलित तथा समाज के सर्वहारा वर्ग अपने जीवन के आदर्श के रूप में बाबा साहेब भीमराव अम्बेदकर से प्रेरणा ग्रहण करते हैं, वहां पर अम्बेदकर की पहचान किसी खास जाति, समुदाय तथा सियासी दल की प्रतिबद्धता से चिपक कर नहीं रह जाती। संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में प्रतिस्थापित होने के परिणामस्वरूप हिंदुस्तान का संविधान समाज के किसी विशेष वर्ग की निजी संपत्ति के रूप में कभी शुमार नहीं होता।

सरदार सरोवर बांध के ठीक सामने बनने वाले 182 मीटर ऊंचे दुनिया की इस सबसे ऊंची ‘स्टेच्यू ऑफ यूनिटी’ की प्रतिमा के निर्माण के बारे में कहा जा रहा है कि यह देश भर के किसानों द्वारा प्रयुक्त लोहे के कृषि उपकरणों से निर्मित की जाएगी, क्योंकि सरदार पटेल मूलत: एक कृषक पुत्र और एक कृषक नेता थे। किन्तु राजनीति करने वाले अब यह कहने लगे हैं कि यह प्रतिमा यूनिटी का नहीं बल्कि डिसयूनिटी की है। क्योंकि इस प्रतिमा के निर्माण के कारण लाखों किसानों को अपने खेत-खलिहान तथा जंगलों से हटना पड़ेगा। सच पूछिए तो अप्रत्यक्ष रूप से देश भर के किसानों के सम्मान के रूप में जिस लौह पुरुष सरदार पटेल की प्रतिमा की स्थापना की जा रही है, उसमें राष्ट्रीय सद्भाव बढ़ाने की बजाय, हम राष्ट्रीय दुर्भाव को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे हमें सावधान रहने की जरूरत है। यह दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा है जो संयुक्तराज्य अमेरिका की स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी से भी दोगुनी ऊंचाई की है। इस के निर्माण पर लगभग 2500 करोड़ रूपए खर्च होने का अनुमान है। इस प्रतिमा के निर्माण संबंधी आलोचना का आधार यह जरूर बनाया जा सकता है कि इतनी बड़ी धनराशि से देश में विकास कार्यों में गति लाई जा सकती थी तथा करोड़ों निर्धनों की तरक्की के लिए योजनाएं बनाई जा सकती थीं। किन्तु यहां पर इस सच को भी हम नकार नहीं सकते कि महापुरुष हमारी वह विरासत हैं, जिनके जीवन मूल्यों तथा आदर्श हमारे लिए रहनुमाई का कार्य करते हैं। प्रतिमा स्थापना का कार्य उन विरासतों की स्मृति को फिर से पुनर्जीवित करने सरीखा पवित्र कार्य होता है।

सोच कर देखिए राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के जिस त्याग तथा बलिदान से देश को स्वतंत्रता हासिल हुई और जिनके सत्य तथा अहिंसा के विचारों पर आज भी यूरोपीय राष्ट्रों में अनुसन्धान चल रहा है, वे किसी विशेष वर्ग या पार्टी में आइकॉन के मोहताज नहीं रहे। हिंदुस्तान में ही नहीं, बल्कि समूची दुनिया के मुल्कों में उनके सत्य और अहिंसा के दर्शनों का आदर होता रहा है और इस प्रकार के सर्वकालिक तथा सर्वविदित सत्य को किसी भाषा, धर्म अथवा समुदाय का नाम एवं पहचान देने की कोशिश हमारी बौद्धिक दिवालियापन से अधिक कुछ भी नहीं होगी। यही कारण है कि आज भी महात्मा गांधी के व्यक्तित्व की उत्कृष्टता के बारे में यदि प्रशंसा की बातें होती हैं तो महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइन्स्टीन के उन शब्दों को हम बड़ी मुश्किल से भुला पाते हैं, जिसमें उन्होंने कहा था कि आने वाली पीढिय़ां बड़ी मुश्किल से विश्वास कर पाएंगी कि हाड़-मांस का यह पुतला कभी इस धरती पर अवतरित भी हुआ था। सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर से लेकर क्रिकेट जगत में भगवान के रूप में पूजे जाने वाले सचिन रमेश तेंदुलकर, भारत में हरित क्रांति के जनक डॉ एम. एस. स्वामीनाथन, मिसाईल मैन के नाम से प्रसिद्ध देश के पूर्व राष्ट्रपति ऐ.पी.जे. अब्दुल कलाम से लेकर अपनी विधाओं में पारंगत बेशुमार हस्तियों की अस्मिता कभी भी उनके अपने व्यक्तिगत शौक, पेशे तथा शगल के कायल नहीं रहे। ये सभी महापुरुष राष्ट्र कीऐसी विरासत हैं, जो कि अपनी ऐतिहासिक एवं युगांतकारी उपलब्धियों से कालजयी हो चुके हैं तथा अपने आप में एक ऐसी संस्था हैं जिनकी कृतित्व की पूरी समझ के लिए एक जीवन पर्याप्त नहीं है।

सरदार वल्लभभाई पटेल का सम्पूर्ण जीवन त्याग, तपस्या एवं राष्ट्र के प्रति अगाध प्रतिबद्धता का जीवन रहा है। आजादी के तुरंत बाद जिस कर्मठता एवं राजनीतिक सूझ-बुझ से उन्होंने देश के पांच सौ पैंसठ देशी राज्यों का भारतीय संघ में विलय कर एकीकृत किया, वह आने वाली पीढिय़ों के लिए अभूतपूर्व घटना है। इसके सामाजिक, पारिवारिक एवं राष्ट्रीय परिणामों ने विश्व परिदृश्य में हमारे राष्ट्र की स्थिति एवं विश्वसनीयता को काफी मजबूत किया है। उनके आदर्शों एवं दर्शनों को इस प्रकार किसी विशेष राजनीतिक दल की पहचान से जोड़कर देखने और सरे बाजार नीलाम करने का कुकृत्य एक अपराध से कम नहीं है। इसके लिए पश्चाताप की आवश्यकता है। यदि संयोग से सरदार वल्लभ भाई पटेल आज जीवित होते तो अपने उच्च मानवीय मूल्यों तथा राष्ट्र के कल्याण के लिए उद्दात संस्कारों को इस प्रकार से गर्त में जाते देखकर काफी दुखी होते और उनकी आत्मा इस बात पर अवश्य रोती कि जिस हिंदुस्तान को अखंड तथा एकीकृत करने के लिए उन्होंने महती कोशिश की, वही राष्ट्र आज फिरकापरस्ती, पारिवारिक जागीरदारी तथा सियासी निजी मिल्कियत के रूप में बड़ी बेदर्दी से बांटी जा रही है। यह कितना बड़ा सौभाग्य है कि अपने त्याग एवं तपस्या एवं उद्दात्त देशभक्ति की भावना से ओत-प्रोत जीवन के सिद्धांतों को इस प्रकार से राजनीतिक स्वार्थ एवं सत्ता सुख की आंच में झोंकते हुए देखने के लिए सरदार वल्लभ भाई पटेल आज हमारे बीच नहीं हैं!

 

श्रीप्रकाश शर्मा

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