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शारीरिक अस्तित्व से पृथक नारी

शारीरिक अस्तित्व से पृथक नारी

By सुधीर गहलोत

भारतीय समाज में नारी के अस्तित्व की कई संरचानएं हैं। दैहिक अस्तित्व से लेकर सामाजिक अस्तित्व की अलग-अलग व्यख्याएं हैं। समाज ने नारी के लिए एक अलग दृष्टिशास्त्र रच दिया है, जहां पुरूष प्रधानता की सोच नारी के स्व-अस्तित्व पर हमेशा भारी रहती है। उसकी यौनिकता, सामाजिक बंधन, सांस्कारिक अभिव्यक्ति सब कुछ एक दायरे के अंतर्गत आता है। उसे शिक्षा, विचार और ङ्क्षचतन से दूर रखकर पारिवारिक संस्था ने नारी को सांस्कारिक सुख-साधन व्यवस्था का प्रतीक बना दिया है।

स्त्री चरित्र को समझने के लिए लेखक कृष्ण कुमार की पुस्तक ‘चूड़ी बाजार में लड़की’ को खंगालना आवश्यक है। लेखक ने तर्क और तथ्यों को आमने-सामने रखकर सहजता, सतर्कता और सघनता से इस पुस्तक के जरिए भारतीय स्त्री की सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक व्यवस्था को स्पष्ट किया है। कृष्ण कुमार ने भारतीय मिथकों, प्रतीकों और परंपराओं के बीच से मानवीय अधिकारों से वंचित स्त्री के चक्रव्यूह में फंसे होने की दास्तां लिखी है। भारतीय समाज में पति-पत्नी, पुत्र-पुत्री, भाई-बहन के आंतरिक और सामाजिक संबंधों को लेकर लेखक द्वारा अन्वेषणीय संयोजन प्रस्तुत किया गया है।

मैडोना का चूड़ी पहनकर नाचना चूड़ी के वैश्वीकरण का संकेत भले हो, वह ऐसा कोई तर्क देने में सक्षम नहीं है कि चूड़ी अब केवल सुंदरता का साधन रह जाएगी। भारत की स्त्री के जीवन में चूड़ी जिस गहरी जकड़ का प्रतीक है, वह ढीली पड़ जाएगी। पश्चिम के प्रभाव से ऐसा होना संभव होता तो औपनिवेशिक युग के दौरान भारतीय स्त्री की नियति में परिवत्र्तन की गति इतनी धीमी और बदलाव की मात्रा इतनी सीमित न रही होती।

लेखक ने चौथे अध्याय ‘ताज की कक्षा’ में लिखा है, हिंदू समाज की सवर्ण जातियों में परंपरावादी विचारों और व्यवहार का सिलसिला कभी रूका नहीं था। खासकर लड़कियों के लालन-पालन और स्त्री की हैसियत के संदर्भ में सवर्ण हिंदू समाज के मध्यमवर्गीय तबके में पुनर्विचार अथवा उदारीकरण के लक्षण ढ़ूढऩे पर भी मुश्किल से ही मिलेंगे। पिछली सदी के अंतिम दशक से प्रारंभ हुआ भारतीय अर्थव्यवस्था का उदारीकरण हिंदू समाज के अभिजनों की स्त्री-विषयक संकीर्णता में तीव्र वृद्धि लाया है।

यह भूमिका स्त्री की शुचिता की अवधारणा पर टिकी हुई है। यह वह अवधारणा है जो अलग-अलग संदर्भों में उन तमाम रीति-रिवाजों और धार्मिक विश्वासों को अर्थ और गति देती है जो लड़कियों को एक स्वीकृत औरत बनाने में परिवार की मदद करते हैं। पितृसत्ता के तहत जमीन-जायदाद को पीढ़ी दर पीढ़ी निर्धारित वंशक्रम में बनाए रखने की रीति के संचालन में लड़की के समाजीकरण की महत्वपूर्ण भूमिका है।

पांचवें अध्याय ‘अभिमन्यु की शिक्षा’ में लेखक ने  स्त्रियों की शिक्षा के पैमाने को बहुत ही गहराई से समझने का प्रयास किया है। स्कूल या कॉलेज में कदम रखती लड़की उस लड़की को घर पर नहीं छोड़ आई होती है जो सभ्यता द्वारा निर्धारित निर्भरता और यौन-दृष्टि के चौखट में सिमटकर जीती है। यहां भी आकर वह विवाह और मातृत्व की केन्द्रीयता का पाठ लगातार सीख रही होती है। लड़की के इन दो अस्तित्वों का फासला हर बच्ची के सामने एक असंभव-सी चुनौती पेश करता है। चुनौती का जवाब बहुतों के लिए किशोरी होने तक निर्धारित हो चुका होता है। तब तक वे सीख चुकी होती हैं कि शिक्षा के बावजूद वे घर में भाई से अलग और नीचे बनी रहेंगी और यही स्थिति शादी के बाद पति के लिए भी होगी।

लेखक कृष्ण कुमार दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं और राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद् के निदेशक रह चुके हैं। उन्हें लंदन विश्वविद्यालय के इंस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशन ने डी.लिट. की उपाधि प्रदान की है। शिक्षा के क्षेत्र में उनके अमूल्य योगदान के लिए 2011 में पद्मश्री प्रदान किया गया।

यह पुस्तक लड़कियों के मानस पर डाली जाने वाली सामाजिक छाप की जांच करती है। परंपराओं के आधार पर लड़की को समाज द्वारा स्वीकृत औरत के सांचे में ढाला जाता है। दूसरी तरफ शिक्षा के बावजूद भी इन्हें सीमित दृष्टिकोण और संकोची इरादे के भीतर रहकर एक लड़की को शिक्षित नागरिक बनाया जाता है। लेखक ने स्त्री के यौनिकता को केन्द्र में रखकर उसके लिए बुने गए सामाजिक बंधनों को समझने का प्रयास किया है।

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