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मोदी और राहुल

राहुल गांधी अपने भाषणों में अभी अपनी जमीन तलाशते हुए ही दिखाई दे रहे हैं। मोदी जहां लय में आ कर राजनीतिक पहलवान की तरह ताल ठोंक रहें हैं, वहीं लगता है कि राहुल अब भी अपने सुर और ताल को मिलाने की कोशिश में ही लगे हैं।

नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी अब खुलकर आमने सामने हैं। मोदी जहां प्रधानमंत्री पद के बीजेपी के घोषित उम्मीदवार हैं वहीं राहुल गांधी ने अघोषित तौर पर ही सही, कांग्रेस के प्रचार की कमान संभाल ली है। उनका व्यवहार भी संभावित प्रधानमंत्री जैसा ही दिखाई देता है। भारतीय लोकतंत्र के लिए यह अच्छा है कि दोनों राष्ट्र्रीय पार्टियों के शीर्ष नेताओं के बीच सीधी और खुली बहस हो। यह बहस अभी प्रकारांतर से टीवी चैनलों और मीडिया में ही चल रही है और दोनों ओर के प्रवक्ता और अन्य नेता इसे आगे बढ़ा रहे है। यह बात सही है कि इस बहस ने अब तक पूर्ण राजनीतिक-वैचारिक बहस का रूप नहीं लिया है और नीतियों, सिद्धान्तों और कार्यक्रमों से ज्यादा अभी यह शैली और भाषा आदि में ही अटकी हुई है, परन्तु आम चुनाव से कोई आठ महीने पहले दोनों सेनापति अगर सीधे आमने सामने हैं, तो तय है कि 2014 का चुनाव दिलचस्प होने वाला है।

सबसे पहले तो यह इसलिए अच्छा है कि दोनों पार्टियों ने कमोबेश यह झगड़ा सुलटा लिया है कि आगे की कमान कौन संभालेगा। कांग्रेस में इस पर जहां कोई सवाल ही नहीं था, वहीं बीजेपी में मोदी की ताजपोशी के लिए खासी खींचतान हुई थी। मगर लोकतान्त्रिक तरीके से पार्टी में इसका समाधान होना ठीक ही है और अब तो पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी भी मोदी को सार्वजनिक तौर पर स्वीकार कर रहे हैं। इससे हमें मान लेना चाहिए कि अब राजनीतिक उत्तराधिकार का मामला दोनों ही पार्टियों में पूरी तरह से सुलझ गया है।

जिस देश में 31 प्रतिशत से ज्यादा आबादी 18 से 35 साल के बीच की हो, वहां का नेतृत्व भी अपेक्षाकृत युवा ही होना चाहिए। मगर अब तक दोनों पार्टियों की कमान ऐसे लोगों के हाथ में थी, जो 80 साल से उपर हैं। एक और आंकड़े पर गौर करें तो अगले आम चुनाव में नए मतदाताओं की संख्या 15 करोड़ होगी। यानि युवाओं का यह बड़ा समूह ही तय करेगा कि दिल्ली कि गद्दी किसे मिलेगी। इसलिए यह संभव ही नहीं था कि बीजेपी और कांग्रेस में पीढ़ी परिवर्तन ना हो। राहुल और मोदी का सामने आना देश की नई पीढ़ी का सामने आना है। यह स्वाभाविक और स्वागत योग्य है।

15 करोड़ का यह समूह जो डिजिटल युग का प्रतिनिधित्व करता है, न सिर्फ उसकी आकांक्षाओं, सपनों और चाहतों का ध्यान रखना जरूरी है बल्कि उसे सही दिशा देना भी नेतृत्व का कर्तव्य है। रविवार को नरेन्द्र मोदी का पटना के गांधी मैदान का पूरा भाषण अगर आप सुनें तो वह भाषण पूरी तरह से राजनीतिक था। जहां उन्होंने नीतीश कुमार पर लोहियावाद से दूर जाने और राजनीतिक विश्वासघात करने का आरोप लगाया, वहीं लालू यादव की तारीफ कर, उनके समर्थकों को अपनी तरफ खींचने का प्रयास किया। राहुल गांधी को शहजादा कहने के विवाद को उन्होंने कांग्रेस के परिवारवाद से जोड़ा, लेकिन अंत में उन्होंने सब का साथ और सबके विकास की बात की।

राहुल गांधी का रविवार का दिल्ली भाषण विकास और गरीबी उन्मूलन पर केंद्रित था, नहीं तो उससे पहले वह पूरी चर्चा को किसी और ही दिशा में ले जाते हुए दिखाई दे रहे थे। राजस्थान और मध्यप्रदेश में उनके पिछले दो भाषणों पर गौर कीजिए। कहीं वह अपनी दादी और पिता की हत्या का हवाला देकर अपनी हत्या की आशंका जता कर भय पैदा कर रहे थे तो कभी मुज्जफरनगर के मुसलमान युवकों को आईएसआई के संपर्क की चर्चा कर चुनावी चर्चा को सांप्रदायिक रंग दे रहे थे। ऐसा लगा कि वह नई पीढ़ी के मतदाताओं को आशंका, भय और साम्प्रदायिक सोच के भंवर में ले जाना चाहते हैं।

राहुल गांधी अपने भाषणों में अभी अपनी जमीन तलाशते हुए ही दिखाई दे रहे हैं। मोदी जहां लय में आ कर राजनीतिक पहलवान की तरह ताल ठोंक रहें हैं, वहीं लगता है कि राहुल अब भी अपने सुर और ताल को मिलाने की कोशिश में ही लगे हैं। देश का युवा इन दोनों की तरफ बेहद आशा भरी निगाह से देख रहा है, क्योंकि एक तरफ उसे रोजगार और विकास चाहिए तो दूसरी ओर उसे महंगाई और भ्रष्टाचार से मुक्तिभी चाहिए।

 

उमेश उपाध्याय

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