ब्रेकिंग न्यूज़ 

रिश्तों की अजीबपहेली!

पश्चिम की तरह हमारे आधुनिक समाज में भी लिव-इन-रिलेशनशिप के मामले बढ़ रहे हैं लेकिन इससे कई तरह की समस्याएं भी पैदा हो रही हैं। अक्सर शारीरिक जरूरतों के आधार पर बनाए गए इन रिश्तों के टूटने का सबसे अधिक खामियाजा महिलाओं को भुगतना पड़ता है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले और नए कानून में इसे इसी वजह से कुछ वैधानिक मान्यता देने की बात की गई है लेकिन ऐसे रिश्तों में सामाजिक उत्तरदायित्वता का न होना सबसे बड़ी कमी है, जो कई तरह के अवसाद का कारण बनती है।

गुडग़ांव के एक निजी बैंक में कार्यरत एक महिला, पिछले तीन साल से एक युवक के साथ लिव-इन-रिलेशनशिप में रहती है। दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान हुई दोस्ती प्यार में बदल गई। गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने से पहले, अपने भावी जीवनसाथी के साथ तालमेल बिठाने के नाम पर उन्होंने लिव-इन-रिलेशनशिप में रहने का निर्णय लिया। युवक का कहना है कि हम शादी से पहले एक दूसरे को समझने की कोशिश कर रहे है। बस कानूनी मान्यता बाकी रह गई है। युवती कहती है, शादी के बाद आपसी तालमेल बनाए रखना, सबसे बड़ी समस्या होती है। ऐसे में एक-दूसरे की पसंद-नापसंद, नजरिया, शौक और स्वभाव को समझने के लिए साथ रहते हैं।

लेकिन लिव-इन-रिलेशनशिप का दूसरा पहलू पूर्व फ्लाइंग अफसर अंजली गुप्ता और आईआईएम की प्रथम वर्ष की छात्रा मालिनी मुर्मू का मामला है। अंजली गुप्ता को एक शादीशुदा व्यक्ति से प्यार हो गया और दोनों लिव-इन-रिलेशनशिप में रहने लगे थे। प्रेमी द्वारा रिश्ता खत्म करने की घोषणा, फेसबुक पर सार्वजनिक स्टेटस के रूप में करने के बाद अंजली गुप्ता ने आत्महत्या कर ली थी।

दिल्ली के सफदरजंग एन्क्लेव में रह रही एक मॉडल अपना रिश्ता टूटने पर कहती है, ”लिव-इन-रिलेशनशिप में पुरुषों के पास खोने को कुछ नहीं होता, जबकि महिलाओं के पास बचाने को कुछ नहीं होता। लिव-इन-रिलेशनशिप सिर्फ रिश्ते के नाम पर ऐयाशी है।’’ वह पिछले 5 साल से वह एडवरटाइजिंग कंपनी में काम करने वाले अपने प्रेमी के साथ लिव-इन-रिलेशन में रह रही थीं। दोनों के बीच एक-दूसरे के लिए समय न देने के आरोपों के कारण कई बार स्थितियां भयानक हो चुकी थीं। युवक का कहना है, ”हम ऐसे प्रोफेशन में हैं, जहां आपसी मुलाकात कभी-कभी हफ्तों तक नहीं होती है। कभी कोई नाईट में काम कर रहा होता है, तो दूसरा दिन में। ऐसे में सप्ताहांत में भी एक-दूसरे को समय और रिश्तों में गर्माहट न दे सकें तो रिश्ता खत्म कर लेना ही बेहतर है।’’

लिव-इन-रिलेशनशिप टूटने का सबसे ज्यादा आघात महिलाओं को लगता है। महिलाएं भावनात्मक रूप से रिश्तों के प्रति ज्यादा सजग होती हैं।

ऐसे रिश्तों की तरफ आकर्षण के पीछे फिल्मों और विज्ञापनों का बहुत बड़ा योगदान है। इसका असर अब छोटे शहरों तक दिखने लगा है। वर्तमान पीढ़ी को लिव-इन-रिलेशनशिप जैसे संबंध इसलिए आकर्षित करने लगे हैं, क्योंकि विवाह की परंपरा उन्हें दकियानूसी बंधन लगने लगी है। पाश्चात्य संस्कृति में रमा एक बड़ा तबका मानता है कि बिना शादी किए, महिला-पुरुष साथ रहकर जीवन व्यतीत कर सकते हैं। इन सोचों के बावजूद भारत में लिव-इन-रिलेशनशिप में रहने वाले लोगों को समाज पति-पत्नी का दर्जा देने को तैयार नहीं है। भारतीय समाज शादी से पहले यौन संबंध बनाने को नैतिक पतन मानता है।

लेकिन खुद को आधुनिक, प्रगतिशील और उन्मुक्त विचार के व्यक्ति लोग लिव-इन-रिलेशनशिप को व्यक्तिगत आजादी, नारी मुक्ति और महिला सशक्तीकरण का नाम देते हैं। उनका दावा होता है कि लिव-इन में रहने के निर्णय के पीछे आपसी विश्वास बहाली, भविष्य की परिकल्पनाएं और जीवन को नई राह देने का स्वप्न होता है। इसे युवा वर्ग शादी-पूर्व अपने जीवन साथी को अच्छे से समझना मानता है।

एक तरफ पश्चिमी देशों में शादी से पहले शारीरिक संबंध बनाने पर रोक लगाने की मांग उठ रही है, तो दूसरी तरफ पश्चिम से प्रभावित भारत में लिव-इन-रिलेशनशिप का प्रचलन तेजी से बढ़ रहा है। तमाम विरोधों के बावजूद, सरकारी स्तर पर इसे संरक्षण भी मिल रहा है। 8 अक्टूबर 2012 को जब महाराष्ट्र सरकार ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के स्पष्टीकरण में ‘पत्नी’ शब्द में लिव-इन-रिलेशनशिप में रहने वाली महिला को भी सम्मिलित करने का प्रस्ताव लाने की बात कही थी, तब महाराष्ट्र सरकार पर लिव-इन-रिलेशनशिप को मान्यता देने का आरोप लगा था। मध्यप्रदेश की महिला नीति – 2013-17 के मसौदे में महिला एवं बाल विकास विभाग और प्रशासन अकादमी द्वारा तैयार, 39 पेज के मसौदे में लिव-इन-रिलेशनशिप को मंजूरी देने का प्रस्ताव है। जिसकी चौतरफा निंदा हो रही है। लिव-इन-रिलेशनशिप जिन समाजों में मान्य है, वहां उन्मुक्त सामाजिक व्यवस्था है, एकल परिवार की परिकल्पना है। वहां रिश्ते बदलना और टूटना कोई खास मायने नहीं रखता। लेकिन भारत जैसे सामाजिक दायित्व के बंधन में बंधे समाज में आज भी इस रिश्ते पर असमंजस की स्थिति है। कमोबेश यही रुख न्यायालय का भी है। एक तरफ सुप्रीम कोर्ट लिव-इन-रिलेशन को दो बालिगों का निजी फैसला मानता है, तो दूसरी तरफ दिल्ली की एक निचली अदालत ऐसे रिश्तों को पश्चिमी देशों का उत्पाद बताकर, उसकी भत्र्सना करती है।

सन् 2010 में खुशबू बनाम कन्नीअम्माल प्रकरण में, सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश के.जी. बालकृष्णन, दीपक वर्मा और वी.एस. चौहान की तीन सदस्यों वाली बेंच ने अपने निर्णय में कहा था कि ‘हमारे देश में ऐसा कोई कानून नहीं है, जो लिव-इन-रिलेशनशिप या शादी पूर्व यौन संबंध को रोक सके।’ सुप्रीम कोर्ट ने शादी पूर्व यौन संबंधों और लिव-इन-रिलेशनशिप को जायज ठहराते हुए कहा कि अगर दो बालिग बिना शादी किए, अपनी इच्छा से पति-पत्नी की तरह रहते हैं तो उसमें कोई हर्ज नहीं है। यह मानसिक रूप से परिपक्व दो लोगों का फैसला है। दक्षिण की अभिनेत्री खुशबू द्वारा शादी से पहले यौन संबंधों को जायज ठहराने पर खुशबू के खिलाफ दर्ज 22 मामलों पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई कर रहा था।

मौजूदा लिव-इन-रिलेशनशिप के स्वरूप को सिर्फ शारीरिक जरूरतों की पूर्ति के लिए बनाए गए रिश्ते का नाम दिया जा सकता है। यह एक ऐसा दोस्ताना संबंध है, जिसमें शारीरिक जरूरतों की पूर्ति तो की जाती है, लेकिन सामाजिक उत्तरदायित्वों के प्रति काई जिम्मेदारी नहीं होती। विवाह के पश्चात पति-पत्नी पर कई तरह की पारिवारिक, सामाजिक और धार्मिक जिम्मेदारियां होती हैं, जबकि लिव-इन-रिलेशनशिप अल्पकालिक और जरूरतों पर आधारित होती है। स्वार्थपूर्ति के लिए ऐसे रिश्तों का बन जाना और टूट जाना आम बात है। जरूरत खत्म होते ही आपसी प्यार भी खत्म हो जाता है और लिव-इन-रिलेशनशिप का मायाजाल भी। 14 मई 2013 को एक सम्मेलन में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश एस.एन. श्रीवास्तव ने कहा कि लिव-इन-रिलेशन में व्यक्ति जब तक चाहे अपने साथी के साथ रहने के लिए स्वतंत्र होता है। इसमें न ही किसी तरह की बाध्यता होती है और न ही जिम्मेदारियां। इसलिए एक दूसरे से अलग होने में आसानी होती है। जस्टिस फखरुद्दीन ने भी इसे अस्थायी संबंध बताया।

लिव-इन-रिलेशनशिप में रहने वाले लोगों के लिए भारत में अलग से कोई कानून नहीं है। समय-समय पर न्यायालय के फैसलों द्वारा इन्हें संरक्षण दिया जाता रहा है। 1978 में पहली बार इस तरह का मामला सामने आया था। बद्री प्रसाद पिछले 50 साल से अपनी महिला मित्र के साथ लिव-इन-रिलेशनशिप में रहते आ रहे थे। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में उन्हें विधिक रूप से पति-पत्नी माना था। 4 मार्च 2002 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक मामले में फैसला सुनाते हुए कहा था कि ‘कोई भी स्त्री और पुरुष अपनी मर्जी से, बिना शादी किए एक दूसरे के साथ रहने के लिए स्वतंत्र है।’ 15 जनवरी 2008 को सुप्रीम कोर्ट ने 30 साल से बिना शादी किए एक-दूसरे के साथ रह रहे प्रेमी युगल के मामले में फैसला सुनाते हुए कहा था कि ‘दोनों बालिगों का साथ रहना कानूनी रूप से अवैध नहीं है।’

भारतीय समाज एक पुरुष प्रधान समाज है, जिसमें विवाह के बाद, पति का पत्नी के प्रति प्रेम के कई पहलू होते है। एक विवाहित पुरुष के लिए उसकी पत्नी, उसके बच्चे की मां होती है, मुश्किलों में साथ खड़ी रहने वाली एक मित्र होती है तो पति की अनुपस्थिति में उसके बुजुर्ग मां-बाप के लिए पत्नी एक सहारा होती है। पत्नी के मां-बाप के प्रति भी पति का दायित्व निर्धारित होता है। इस तरह विवाहित जोड़ा एक संयमित जीवन जीता है, जिसमें पारिवार और समाज के उत्तरदायित्व समाहित होते हैं। परिवार और समाज को महत्वहीन समझने वाला लिव-इन-रिलेशनशिप इस तरह के दायित्वों से मुक्त होता है। मनोचिकित्सकों के अनुसार, विवाहित जोड़े ज्यादा खुश और लंबा जीवन जीते हैं, उनमें रोग प्रतिरोधक क्षमता और विपरीत परिस्थितियों से लडऩे का जूझारुपन, लिव-इन-रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़ों की अपेक्षा कई गुना ज्यादा होती है। अविवाहित जोड़ों का ज्यादा वक्त इस मानसिक परेशानी में गुजरता है कि कहीं रिश्ता टूट न जाये। रिश्ते को बनाए रखने के लिए वे हर प्रकार के समझौते करने लगते हैं। जिसका परिणाम मानसिक और शारीरिक बीमारी के रूप में सामने आने लगता है। आपस में हल्का मनमुटाव का भी आत्महत्या या साथी की हत्या तक पहुंच जाता है। इसकी सबसे ज्यादा भुक्तभोगी महिलाएं होती हैं। महिलाओं पर पुरुषों की अपेक्षा ज्यादा सामाजिक दबाव होता है। समाज उनसे ज्यादा संयम की उम्मीद करता है।

हमारा समाज आज भी ऐसी महिला को सम्मान देने को राजी नहीं है, जो विवाह पूर्व किसी पुरुष के साथ पत्नी के रूप में रह चुकी हो। ऐसे में जब संबंध टूटता है, तो एक महिला का सब कुछ लुट चुका होता है। उसकी आंखों के आगे अंधेरा और पछतावा के सिवा और कुछ नहीं होता। कोई भी युवती विवाह के बाद पारिवारिक स्थितियों और जिम्मेदारी वाले माहौल से कुछ समय के लिए मुक्ति महसूस तो करती है, लेकिन ऐसे रिश्तों में थोड़ा-सी खिंचाव, ज्यादा घुटन भरी और भयावह हो जाती है।

समस्या तब खड़ी होती है जब ऐसे रिश्ते टूट जाते हैं। भरण-पोषण, बलात्कार सहित घरेलू हिंसा जैसे कई गंभीर आरोप लगने लगते हैं। 22 अक्टूबर 2010 को लिव-इन-रिलेशनशिप के एक मामले में गुजारा भत्ते को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा कि ‘यदि पुरुष कोई रखैल रखता है, जिसका वो खर्चा उठाता है और उसका इस्तेमाल मुख्य रूप से सेक्स संबंधों के लिए करता है या फिर उसे नौकर के तौर पर रखता है तो ऐसे संबंधों को शादी नहीं माना जा सकता।’ कोर्ट ने ‘वीकेंड’ या ‘वन-नाइट स्टैंड’ को लिव-इन-रिलेशनशिप से अलग मानते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ‘लिव-इन-रिलेशनशिप में रह रही महिला अगर अपने साथी से अलग होती है, तो वो भत्ते की हकदार नहीं मानी जाएगी।’ एक स्कूल टीचर के मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला सुनाते हुए निचली अदालत और मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को पूरी तरह पलट दिया था। इस फैसले के तहत यदि कोई पुरुष अविवाहित या तलाकशुदा होने का झूठी बात बोल कर किसी महिला के साथ लिव-इन-रिलेशनशिप में रहता है तो धोखे की शिकार महिला को किसी भी तरह का आर्थिक लाभ नहीं मिल पाएगा। इसी तरह यदि कोई अविवाहित पुरुष दो महिलाओं के साथ दो अलग-अलग शहरों में लिव-इन में रहता है और बाद में वह इनमें से किसी एक के साथ शादी कर लेता है, तो उसकी दूसरी महिला पार्टनर किसी भी तरह के आर्थिक संरक्षण की पात्र नहीं होगी।
लिव-इन-रिलेशनशिप के दौरान हत्या के कुछ मामले, जो सुर्खियां बनीं …
• 06 नवंबर 2012 को मुंबई के वर्सोवा इलाके में एक नवोदित अभिनेता को उसकी महिला मित्र द्वारा बलात्कार का आरोप लगाने के बाद पुलिस ने गिरफ्तार किया था। दोनों पिछले एक साल से लिव-इन-रिलेशनशिप में रह रहे थे। उस अभिनेता ने अपनी महिला मित्र पर शादी का बनाना शुरू कर दिया था, जिसके लिए तैयार नहीं थी।
• 19 जून 2012 को दिल्ली के रोहिणी में अपने एक प्रेमी ने अपनी लिव-इन-पार्टनर महिल मित्र की हत्या कर, टुकड़ों में बंटी लाश को जला दिया था।
• 2008 में एक नाइजीरियाई प्रेमिका ने लिव-इन-रिलेशनशिप में रह रहे अपने प्रेमी की चाकूओं से गोदकर हत्या कर दी थी। दिल्ली यूनिवर्सिटी के पास रह रही 28 साल की जारजोलियानी, विक्टर ओकोन की इसलिए हत्या कर दी, क्योंकि मृतक अपनी प्रेमिका के खाते से बिना उसे बताए तकरीबन 48,000 रुपये निकाल लिए था।
• 01 मार्च 2011 को नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर बैग में एक लड़की लाश मिली थी। जिसकी पहचान पश्चिमी दिल्ली के मटियाला की रहने वाली नीतू सोलंकी के रूप मे हुई थी। नीतू सोलंकी की हत्या का आरोप उसके लिव-इन-पार्टनर राजू के उपर लगा था।
• 08 फरवरी 2011 को गुजरात के राजकोट में हिरल गोहिल की हत्या, उसके घर में लिव-इन-रिलेशनशिप में रहने वाले उसके प्रेमी गौरव ने कर दी थी। हिरल की लाश ओकहार्ड अस्पताल में मिली थी।
शादी के बराबर दर्जा
लिव-इन-रिलेशनशिप के संबंध में कानूनी पक्ष व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक ताने-बाने के बीच उलझा हुआ महसूस करता है। ऐसे संबंधों को दिल्ली हाईकोर्ट ने ‘वॉक-इन, वॉक-आउट’ रिलेशनशिप की संज्ञा दी थी। दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट ने लंबे समय तक चलने वाले इस रिश्ते को शादी के बराबर दर्जा दिया और कहा कि इन संबंधों से उत्पन्न संतान भी अपने पिता के जायज वारिस होंगे। 28 मई 2010 के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति बी.एस. चौहान और न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार की खंडपीठ ने हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 16 का हवाला देते हुए कहा कि ‘प्रेमी-युगल के संतानों को मां-बाप द्वारा अर्जित संपत्ति में हिस्सा पाने के अधिकार सहित सभी व्यावहारिक उद्देश्यों के लिए वैध संतान के रुप में मान्य हैं।’ दूसरी तरफ 17 जनवरी 2012 को दिल्ली की एक अदालत ने लिव-इन-रिलेशनशिप के बारे कहा कि ‘कानूनी मान्यता मिलने के बावजूद यह अनैतिक है। लिव-इन-रिलेशनशिप एक सनक है, जो सिर्फ शहरी इलाकों में ही देखी जाती है।’ अदालत ने लिव-इन-रिलेशनशिप को पश्चिम का एक अलोकप्रिय सांस्कृतिक उत्पाद बताया था। जज ने यह टिप्पणी मिजोरम की एक लड़की द्वारा हत्या के मामले में फैसला सुनाते हुए की थी। कुछ साल पहले दिल्ली में मिजोरम की रहने वाली इस लड़की ने अपने लिव-इन पार्टनर की हत्या कर दी थी।

न्यायालय ने लिव-इन-रिलेशनशिप की न्यनूतम समय सीमा को रेखांकित नहीं किया है, फिर भी इसे ‘वन-नाइट स्टैंड’ और ‘वीकएंड स्टैंड’ से अलग माना है। एक स्कूल टीचर के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने गुजारा भत्ता पाने के लिए रिलेशनशिप के बारे में कुछ शर्तें बताईं हैं। पहली शर्त के तहत लिव-इन-रिलेशनशिप में रहने वाले युगल को समाज के सामने, पति-पत्नी के तौर पर आना चाहिए। दूसरी शर्त, दोनों शादी की कानूनन उम्र को पूरा कर चुके हों। तीसरी शर्त, दोनों के बीच के रिश्ते कानूनी रूप से शादी करने के लिए वर्जित न हो। चौथी शर्त, वे दोनों स्वेच्छा से लंबे वक्त तक पति-पत्नी के तौर पर रहे हों। फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने समाज को लिव-इन-रिलेशनशिप के मायने समझाने की कोशिश की है। संसद ने लिव-इन-रिलेशन को घरेलू हिंसा कानून के दायरे में लाकर महिलाओं को राहत तो दे दिया, लेकिन संबंधों के टूटने के साथ ही टूटे सपनों को जोडऩे का कोई उपाय सुझाने में असमर्थ रहा है।

रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाओं का उनके परिवार से अक्सर नाता टूट जाता है। इसके बाद उनके साथ क्या हुआ, इसकी जानकारी परिजनों को भी नहीं होती। रिलेशनशिप के दौरान, भावनात्मक पलों को फोटो अथवा वीडियो में कैद कर अपना मकसद साधने वाले अपराधियों द्वारा इस्तेमाल किए जाने से भी इंकार नहीं किया जा सकता। वेश्यावृत्ति, मादक पदार्थों एवं हथियारों की तस्करी और आतंकवादी गतिविधियों में इस्तेमाल करने से लेकर अधिकारियों के सामने परोसने के भी मामले उठते रहते हैं। आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त तत्वों और लव-जिहाद के मोहरों पर ऐसे संबंधों के माध्यम से महिलाओं को शिकार बनाने के आरोप लगते रहे हैं। अभी हाल ही में भोपाल में एक पत्रकार की बीवी को नक्सिलयों को हथियार सप्लाई करने के आरोप में गिरफ्तार किया है। इसके पहले उसका पत्रकार पति इसी आरोप में जेल चुका है। लिव-इन-रिलेशनशिप में रहने के बाद, महिला ने धर्म-परिवर्तन कर पत्रकार से निकाह किया था।

महिलाओं द्वारा लिव-इन रिश्ते बनाकर ब्लैकमेल करने के मामले भी आते हैं। कहा जाने लगा है कि इस पूंजीवादी युग में जल्दी धनवान बनने के लिए महिलाएं भी रिश्तों की मर्यादा तार-तार करने से गुरेज नहीं करतीं। मकसद से बनाए गए इस रिश्तें में महिलाओं के प्रति हिंसा के विरुद्ध बनाए गए कानूनों का डर दिखाकर वे पुरुष मित्र से मोटी रकम की मांग करती हैं। ऐसे अपराधों को रोकने में सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला महत्वपूर्ण माना जा सकता है। 20 मई 2013 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा कि ‘दो बालिगों द्वारा मर्जी से संबंध बनाने पर बलात्कार का आरोप नहीं लगाया जा सकता है, बशर्ते कि महिला को शादी का झांसा नहीं दिया गया हो।’ कोर्ट ने फैसले में कहा कि ‘कभी-कभी परिस्थितियां ऐसी बन जाती हैं कि शादी नहीं होती हैं। ऐसे में बलात्कार का मुकदमा नहीं बनता है।’ एक मामले में शादी का वादा कर लंबे समय तक यौन संबंध बनाए जाने के बावजूद, मजबूरी वश लड़का शादी करने में असमर्थ रहा था। इससे नाराज लड़की ने प्रेमी के खिलाफ बलात्कार का आरोप लगाया था।

ऐसे संबंध आत्मिक आकर्षण के बजाय शारीरिक आकर्षण पर ज्यादा टिके होते हैं और जब यह आकर्षण समाप्त होने लगता है, तो यही प्रेम बोझ लगने लगता है। वासना से सने ऐसे रिश्तों में ज्यादातर वे युवा होते हैं, जो मन में उठने वाली भावनाओं पर नियंत्रण रखने में असमर्थ और सामाजिक बंधनों को धत्ता बताने में रोमांच महसूस करते हैं या फिर अपने षडयंत्र को सफल बनाने की चाहत रखते हैं।

लिव-इन-रिलेशनशिप की समस्याएं
प्रोटेक्शन ऑफ वुमन फ्रॉम डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट, 2005 के तहत लिव-इन-रिलेशनशिप को घरेलू रिश्तों के दायरे में रखने के बावजूद, कई तरह की समस्याएं खड़ी रहेंगी। खासकर तब, जब रिश्तों के दरम्यान जन्मे बच्चे विवाद का कारण बन जाएं। ऐसे में बच्चे के नाम पर एक-दूसरे का भावनात्मक शोषण, बच्चे की कस्टडी को लेकर विवाद, मां-बाप दोनों द्वारा ही बच्चे की परवरिश से इंकार, दो अलग-अलग संप्रदाय होने के कारण बच्चे के पालन-पोषण और सामाजिक तौर-तरीकों पर विवाद जैसी कई समस्याएं पैदा हो सकती हैं, जिनका उपाय शायद कानून निकाल पाए।

 

सुधीर गहलोत

polish to english translation audioкухня детская

Leave a Reply

Your email address will not be published.