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कानून ने किया सहजीवन के जोड़ों का जीवन सहज!

सहजीवन में रहने वाले सोचते हैं कि लड़की से शादी तो हुई नहीं, अत: वे शादी के पश्चात् की जिम्मेदारियों से मुक्त हैं। जबकि घरेलू हिंसा प्रतिरोध कानून (डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट) के अनुसार भी कोई अपनी पार्टनर के साथ शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, यौन हिंसा, आर्थिक उत्पीडऩ, गाली-गलौज, अपमानित करना, ताने कसना, उसकी संपत्ति को बेचना, उड़ा देना, उसे सुविधाएं न देना, भरण-पोषण से इंकार करना, उसे पढऩे-लिखने या नौकरी न करने देना आदि नहीं कर सकता।

लिव-इन-रिलेशनशिप (सहजीवन) की अवधारणा विश्व के किसी भी देश के लिए नई नहीं है। हालांकि समाज का एक वर्ग मानता है कि भारत में कभी ऐसे रिश्ते नहीं थे और भारत में इसका पदार्पण पश्चिमी देशों से हुआ है। वैसे वास्तिवकता यह है कि यदि स्त्री-पुरूष विवाहित नहीं हैं और वे अपनी जरूरतों के तहत एक-दूसरे के साथ रहने के लिए मजबूर हो जाते हैं, तो सहजीवन की शुरूआत हो जाती है। विवाह के बगैर स्त्री-पुरूष की साथ रहने की मजबूरी आर्थिक, भावनात्मक या शारीरिक अथवा कुछ भी हो सकती है। भारतीय साहित्य तथा कानूनी फैसले बताते हैं कि भारत में यह संबंध हमेशा से रहा है। 1800 ईस्वी के उत्तराद्र्ध में प्रीवी काउन्सिल के फैसलों में इस प्रकार के संबंधों का उल्लेख है और कानून ने भी इस प्रकार के संबंधों को अपनी सहमति प्रदान की है। बाद में अकेले रह जाने वाले साथी को पति या पत्नी का कानूनी दर्जा दिया गया है। कई वर्ष तक साथ-साथ रह कर सम्मानजनक ढंग से जीवन बिताने वाले महिला-पुरूष के जोड़ों को विवाहित ही समझा गया है। प्राचीन काल के साहित्य, सामाजिक किस्सों, कहानियों में इस प्रकार का जिक्र मिलता है। पहले अकेला वृद्ध और अकेली वृद्धा साथ-साथ रहकर मृत्युपर्यन्त जीवन व्यतीत कर लेते थे। कितने ही परित्यक्त-परित्यक्ता व्यक्ति एक साथ रह कर ऐसे ही जिंदगी की गाड़ी चला लेते थे।

ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं जिनमें पढऩे अथवा नौकरी करने के लिए बड़े शहरों या महानगरों में रहने वाले युवा लड़के-लड़किया रूम शेयर कर कम पैसे में गृहस्थी जमा कर अपनी शिक्षा या नौकरी जारी रखते हैं। यदि वे ऐसा न करें तो बड़े शहरों या महानगरों में उनका रहना लगभग मुश्किल हो जाए। साथ रहने से उनका खर्च बंट जाता है। भावनात्मक रिश्ते से उनका जीना भी आसान हो जाता है। रिश्तों में खटास आ जाने पर या कुछ और अच्छी परिस्थितियों के आने पर बिना कोर्ट-कचहरी के झंझट के वे अलग हो गए। ऐसे मामले भी प्रकाश में आए हैं, जहां साथ रहने पर परस्पर प्रेम हो गया और अपने उस रिश्ते को नाम देने के लिए उन्होंने विवाह भी कर लिया। कभी-कभी ‘पजेसिवनेस’ की भावना इनती प्रबल हो जाती है कि उनमें एक-दूसरे का खून करने की नौबत आ जाती है। हाल में ही एक ऐसे ही रिश्ते का अंत स्त्री की हत्या से हुआ। लिव-इन-रिलेशनशिप में वह मां नहीं बनना चाहती थी, पर पुरुष जरूर जन्मदाता बनना चाहता था।

वृद्धों या अधेड़ों में बनने वाले इस प्रकार के रिश्तों पर आमतौर पर समाज चुप रहता है। कारण ऐसे मामलों में युवा लड़कों से जुड़े हुए भविष्य के लाभ की आशा नहीं होती या लड़कियों से जुड़ी इज्जत की भावना नहीं होती। युवाओं के सहजीवन के मामलों में समाज के कड़े विरोध का कारण यही है।

सहजीवन को अदालतों की स्वीकृति प्रीवि काउन्सिल के फैसलों के जमाने से मिलती रही है। आज भी मिल रही है। अब तो बाकायदा देश के कानून ‘प्रोटेक्शन ऑफ वीमन फ्रॉम डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट, 2005’ में इसका जिक्र किया गया है। यह उल्लेख इस तरह आया है-

”धारा 2- परिभाषा (ए)- ”पीडि़त व्यक्ति का अर्थ है कोई भी स्त्री जो एक घरेलू संबंध में है या रह चुकी है और जिसके साथ विपक्षी द्वारा किसी प्रकार का घरेलू अत्याचार हुआ है।’’

इस परिभाषा में सहजीवन में रहने वाली स्त्री भी शामिल है। भारतीय कानून में ऐसा पहली बार हुआ है। इसके पहले बिना शादी के साथ रहने वाली स्त्री के लिए सामाजिक एवं कानूनी स्वीकार्यता तो थी, पर वह सामाजिक आलोचना तथा हिचक के साथ थी।

सहजीवन की अवधारणा के साथ आज भी समाज में कुछ भ्रम हैं। वे समझते हैं कि कोई भी शादीशुदा या अविवाहित स्त्री और पुरूष साथ रह रहे हैं, तो यही सहजीवन है। कानूनन यह सच नहीं है। डी. वैलूसामी बनाम डी. पच्चामलई के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने हाल के अपने एक निर्णय के में सहजीवन की परिभाषा स्पष्ट करते हुए कहा है कि सहजीवन वह है जिसमें (1) सहजीवन बिताने वाले पुरुष एवं स्त्री ‘अकेले’ यानी वे कुंवारे, विधवा/विधुर या तलाकशुदा हैं, (2) वे लंबे समय तक एक साथ रहें तथा (3) उनके रहने का तौर-तरीका, व्यवहार ऐसा हो जिससे बाहर के लोगों को लगे जैसे वे पति-पत्नी हैं।

सहजीवन बिताने वाले दोनों अथवा दोनों में से एक भी यदि अविवाहित या तलाकशुदा न अथवा विधवा या विधुर नहीं है, और यदि दोनों में एक भी यदि शादीशुदा है और दूसरा अविवाहित हो तो शादीशुदा व्यक्ति का सहजीवन विवाहेत्तर संबंध (एक्सट्रा मेरिटल अफेयर) कहलाएगा, न कि वह सहजीवन की परिभाषा में आएगा।

दूसरे देशों, जैसे ब्रिटेन में युवाओं में सहजीवन की प्रथा काफी समय से है और इस रिश्ते के अन्र्तगत आ रहीं कई परेशानियां भी अदालतों में वहां सुलझाई जाती हैं। इन में संपत्ति संबंधी समस्याएं, बच्चों की कस्टडी, बच्चों के पालन-पोषण से जुड़ी समस्याएं, परस्पर मार-पीट, लड़ाई-झगड़ों के मुकदमे अदालत पहुंचे। अब वहां ऐसे संबंध बनाने के पहले एक प्रकार की संविदा बनाने का रिवाज है। जिसमें ऐसी सारी समस्याएं पहले ही सुलझा ली जाती हैं। जैसे दोनों या अकेले की कमाई का बंटवारा अलग होने की स्थिति में कैसे किया जाएगा, बच्चे होंगे तो उनका पालन-पोषण कौन, कैसे और कितना-कितना करेगा, बच्चों को उनकी संपत्ति पर कितना हक होगा, वे एक-दूसरे पर कोई मुकदमा नहीं करेंगे, आदि-आदि। कुछ अच्छे फैसलों में उनके अधिकारों और कर्तव्यों की व्याख्या की गई है। अत: इस संबंध के कुपरिणाम वहां काफी कम हैं।

भारत में ऐसा नहीं है। यहां लोग आनन-फानन में बिना विचार किए, बिना कानूनी पहलुओं पर ध्यान दिए तथा दूरगामी प्रभावों को अनदेखा कर तत्काल लाभ को देखते हुए साथ रहने लगते हैं। फिर ऐसी परेशानियां शुरू हो जाती हैं, जो उनका जीवन ही दूभर कर देती हैं। ऐसे रिश्तों में ‘डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट’ में मुकदमे तो होते ही हैं- खून, चोरी आदि के बड़े अपराध भी हो जाते हैं।

सहजीवन में रहने वाले सोचते हैं कि लड़की से शादी तो हुई नहीं, अत: वे शादी के पश्चात् की जिम्मेदारियों से मुक्त हैं। जबकि घरेलू हिंसा प्रतिरोध कानून (डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट) के अनुसार भी कोई अपनी पार्टनर के साथ शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, यौन हिंसा, आर्थिक उत्पीडऩ, गाली-गलौज, अपमानित करना, ताने कसना, उसकी संपत्ति को बेचना, उड़ा देना, उसे सुविधाएं न देना, भरण-पोषण से इंकार करना, उसे पढऩे-लिखने या नौकरी न करने देना आदि नहीं कर सकता। एक पुरुष पार्टनर के अधिकार ऐसे रिश्तों में भले ही कम हों, पर उनके प्रति कर्तव्य वही हैं, जो एक विवाहित स्त्री के लिए होते हैं। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पहले कहा गया था कि सहजीवन से उत्पन्न बच्चे पैतृक संपत्ति नहीं पा सकते, पर अब कानून द्वारा इसकी भरपाई करने की कोशिश की जा रही है।

इस विषय का एक दिलचस्प पहलू यह है कि निम्न वर्ग में इस प्रथा का प्रचलन ज्यादा है। वहां रुपए-पैसे की कमी और सामाजिक उदारता ऐसी है कि एक को छोड़, दूसरे के साथ बैठ जाना या बिना विवाह किए साथ-साथ रहने लगना कोई असाधारण बात नहीं है। महानगरों में काम करने के लिए आए लोग इस तरह के स्थायी तथा अस्थायी संबंध बना लेते हैं। बच्चे पैदा करते हैं। कभी-कभी स्त्रियां उच्च न्यायालयों तक में अपने साथ की गई ज्यादतियों की शिकायत करती पाई जाती हैं। वहां तलाक लेने की आवश्यकता भी नहीं होती। आपसी बातचीत-पंचायत ही ऐसा फैसला ले सकती है। एक को छोड़, दूसरे के साथ जीवन बिताना वहां इज्जत या कानूनी मसला नहीं, बल्कि व्यक्तिगत पसंद-नापसंद, फैसला या सुविधा है। उद्देश्य है अपना जीवन आसानी और खुशी से बिताना। मजदूरी कर दो जून रोटी का इंतजाम करना, तमाम कानूनी और सामाजिक पेचीदगियों को अलविदा कह देता है। पर मध्यम वर्ग में सहजीवन न तो उन जोड़ों को खुशी और आनंद से भर पाता है, जो इसमें हैं और न ही उनके परिवार और समाज को ही संतुष्टि दे पाता है। वे अपनी खुशी, जरूरत, कानूनी पेचिदगियों, सामाजिक बंधन आदि के जाल में इस कदर फंस जाते हैं, जिससे कुछ ही खुशनसीब जीवन भर के लिए बाहर निकल पाते हैं, वरना ज्यादातर जोड़े सहजीवन के बुने जाल में रह कर घुटते हैं, दूसरे की आजादी को पजेसिवनेस के आइने से देखते हैं। साल-दो-साल बाद कोई एक साथ छोड़ देता है, तो दूसरा कोई-न-कोई अपराध कर बैठता है। हत्या या आत्महत्या या मनोरोगी हो बैठता है।

वास्तव में यह रिश्ता उन लोगों में फल-फूल सकता है जो सामाजिक बंधनों, परिवार के दबाव से मुक्त हैं, जो बुद्धिजीवी हैं। अपने अपने पांव पर सुदृढ़ता से खड़े हैं। वरना अवधारणा अक्सर सफल नहीं होती।

वैसे भी अब जरूरत है कि सरकार इस विषय पर स्पष्ट कानून बनाए कि सहजीवन में एक-दूसरे के क्या अधिकार तथा कर्तव्य हैं, वरना दिशाहीन युवा कई स्तरों पर गलतियां करने पर मजबूर हैं, जिसका खामियाजा उन्हें तथा उनके परिवारों को चुकाना होता है।

कानून का नजरिया दो बालिग एकल, (अविवाहित, तलाकशुदा, विधवा अथवा विधुर) स्त्री-पुरुष के शारीरिक संबंध अपराध नहीं है, भले ही नैतिक दृष्टिकोण से यह ठीक न हो (ए.आई.आर.2006 सु. को. 2522)। अत: सहजीवन जीना कोई अपराध तो नहीं है।

कमलेश जैन
(लेखिका उच्चतम न्यायालय में अधिवक्ता हैं।)

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